मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

कविता / Poesy .


सूखी पपडाई धरती पर छन् से आ गिरती मोटी मोटी बारिश की बूँदें और उस से उठती सौंधी माटी की सुगंध है कविता . अल सुबह पत्तों से झर कर ओस भीगी घास को चूमती प्रथम सूर्य किरण है कविता . प्रकृति से , सौंदर्य से , समाज से , ईश्वर से ...और स्वयं से मनुष्य का साक्षात्कार है कविता .
       ये वह सोपान है जो एक ओर तो मनुष्य को आकाश की असीमितता से परिचित कराता है , उड़ान के लिए पंख देता है ... तो दूसरी ओर  समझाता है सुख दुःख , पाना खोना , जीवन के सभी रंग क्षणभंगुर होते हुए भी निरंतर और स्थायी हैं क्योंकि ये हर तरफ बिखरे हुए हैं . कविता मनुष्य का मनुष्य से संवाद है .
      चिरंतन पुनः आया है ले कर कुछ कवितायेँ ... आप के लिए .

                                 - मीता .
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इनकी कलम से


तुम्हारे मेरे बीच .



तुम्हारे और मेरे बीच
कविता ही तो होगी
संवाहक - दूती - संवदिया .
कविता ही तो बनेगी पुल
जिसके नीचे बहते
समय के सतत प्रवाह को लांघ
रोज़ तुम तक आऊंगा .
पाऊंगा तुम्हें ,
फिर लौट आऊँगा
अपने आप को खोकर .

                   - दिनेश द्विवेदी .
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वो कविता है .


जो नंगे पैर तपती धूप में चलती है,
कविता है .
जिसके तन से
मेहनत के पसीने की महक आती है,
कविता है .
जो अपने हक़ की खातिर जूझती लडती है...
कविता है .

जो देती है आवाज़
दिल में दफ्न बातों को
चाह कर भी होठों तक
जो आने नहीं पातीं हैं ...
कविता है .

तनी भौहें भी कविता है,
भिंची मुट्ठी भी कविता है,
और वो चीख भी जो नींद से सबको जगाती है...
कविता है .

कविता वो भी है
जो रात के काले अंधेरों में
उजाले ढूंढती है,
और कहती है बढ़ो आगे,
अभी कुछ और भी हैं आसमां जो तुमने छूने हैं .

कविता वो भी है
जो कुछ नहीं कहती...
कहीं कोने खड़ी बस मुस्कुराती है...
और
अकसर मुस्कुराती भी बिलावजह ही है शायद !

मगर ये भी तो सच है
कि अगर वो मुस्कुराती है,
तो ऐसा भी नहीं
वो जानती ना हो
कि इस दुनिया में,
जिस में दर्द हैं इतने...
यहाँ पर मुस्कुराना कितना मुश्किल है !

मगर फिर भी
अगर वो मुस्कुराती है...
तो कविता है .

       - मीता.
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Poesy .


Poetry, dripping with obscurity
Drops of tears, mingled with lost loves
Feeble incantations, longings suppressed
Words bubbling to surface
Acidic, dark, with matted hair
Dried blood on them
Reminiscent of the past
Of feelings
Dark nights, cascading tresses of the moon
Dreams of guttural sounds
Shadows lurking
Gasping for breath
Reliving stinging departures
Answerless questions
And abject despair
And poetry is born

Well, what if
Poetry a magic, the poet
A sorcerer waving the wand
Starts time backwards
First in fits and starts
Then seamlessly
As you watch
Departing steps retrace
Hung heads arise
Tears slither back
Eyes dry up
The final hug
The initial departure
Into the life lived backward
Riding the sea of acrimony and excuses
Barbed accusations and swelling rages
To safely dock on quiet shores
At the beginning of love
And freeze time
Into a fresh new start
Possibility of smiles
Care and tenderness
Once again
Relived differently
What if?

Brand it heresy,
And poetry the occult
Let the poet gladly face wrath
So that life rewinds
So happiness pervades
In a million lives
A second chance
Reborn .

  - Sadhana .

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तेरा साथ .


किसी  दिन 
जब धरा से ख़िसक रहा हो 
नारंगी  दामन 
और दूधिया चाँद 
चढ़ रहा हो शर्माते 
आकाश की सीढियां 
तुम चुप चाप आ मेरे बाजू 
बैठ जाती हो ...

पढ़ती हो 
ख़ुशी और दुःख के साये 
दिन भर का कारोबार ,
और शब्दों की उँगलियाँ पकड़ 
बिछ जाती हो
कोरे कागज पर ...
एक रूप होता है साकार .

कविता !
तुम कुछ ऐसे उतरती हो .
कभी अन्दर की पीर 
कभी रूहानी ख़ुशी 
का पैरहन पहन कर 
मुझे लपेट लेती हो 
अपने अहसासों से .

तुम में समा कर 
मै भी भूल जाती हूँ 
सारी दुनियादारी .
जैसे दर्द और ख़ुशी के 
बोझ उतरते हैं .
और 
हम फिर गलबहियां डाले 
दूर तक 
ज़िन्दगी के रस्ते चलते हैं .

             - राजलक्ष्मी शर्मा .
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नज़्म उम्मीद से है...


चीनी शक्कर, मिश्री विश्री
           भूल गई है
आँखें मीचे
होठों पर चटखारे की जीभ फिराती रहती है
खट्टी अमिया, गाच्नी मिटटी
उफ़... क्या क्या यह खा जाती है

नज़्म के पाँव भारी हैं
नज़्म उम्मीद से है...

ग़ालिब के आशारों पर
दिन भर लिपटी रहती है
मीर, ज़ौक, ज़फर के नग्मे
ख्वाब में बुनती रहती है

कहते हैं...
हामिला जो देखे... वैसी सूरत पाती है
                           वैसी सीरत पाती है
अब देखें...
यह नज़्म कहाँ तक
किस शायर पर जाती है...

नज़्म के पाँव भारी हैं
नज़्म उम्मीद से है...

खाली बैठे दोपहरों को
आने वाली नज्मों के उन्वान सोचती रहती है
...यह नाम सोचती रहती है
जब कोई मिसरा करवट लेता है अन्दर
यह हाथ लगाकर पेट पर थपकी देती रहती है
और धड़कनों की चादर पर
कान लगाकर सुनती रहती है

नज़्म के पाँव भारी हैं
नज़्म उम्मीद से है...

शेर बने या गीत बने
नज़्म बने या दोहा
जो भी बने यह नज़्म की बेटी
बस पिघलाए नफरत का लोहा

मुझ शायर से नज़्म को
ऐसी ही कोई उम्मीद है...

नज़्म के पाँव भारी हैं
नज़्म उम्मीद से है... 

                            - देव .
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कविता तुम कौन हो ?

सवाल हो;या जवाब हो ,
कोरी कल्पना का हिसाब हो ,
उम्मीद का महताब हो ,
कोई थाती , कोई किताब हो ...

शायद, कोई प्रेम कहानी हो 
सुनी सपनों की जुबानी हो ,
धड़कन ,जो सुनानी हो ,
या तुम आँखों का पानी हो .

तुम शायद उम्मीद हो ,
और थोडा सा फलसफा ...
वो दर्द , वो जज्बात हो 
जिस ने है मुझ को लिखा .

बहुत सोचा 
बहुत पूछा 
पर फिर भी तुम मौन हो !

कविता 
तुम कौन हो ?

      - स्कन्द .
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दर्दे - सुख़न 

Old_diary : Open book over a light nature background Stock Photo

नज़्मों की पुरानी कापी या                          
कापी में पुरानी नज्में हैं
मुश्किल है बताना फ़र्क बड़ा

मैं जब भी हाथ लगाता हूँ
कुछ पन्ने खुद खुल जाते हैं
जिनके कोने हैं जर्द बड़े

वो पन्ने जीभ चिढ़ाते हैं
उन पन्नों में कबरें हैं
कुछ हिम्मत भरे ख़यालों की

कच्चे-पक्के अशआरों  में
जो बातें उतरी थीं, अक्सर
वो बातें उम्रदराज हुईं 

लफ़्ज़ों में मंशा होती थी
कुछ करने की, कर जाने की
अब सुस्त क़दम ग़जलें बाकी

इन ग़ज़लों में है रूह कहाँ
फिर भी कुछ ना कुछ लिखता हूँ
नाज़ायज सी बात है ये

अब बहरें पहले से बेहतर
कमज़ोर मगर मजमून बहुत 
क्या खोकर मैंने क्या पाया?

      - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .
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कविता .


ये मेरा वादा है 
लिखूंगी तुझको
उस वक़्त जब...

मन रेतीले ढेर सा 
ढहने लगे
औ' आँखों में गहरी 
उतर आये नमी 
निढाल सा बोझिल सा
कदम का एक टुकड़ा
दफ्न कर रहा हो
सफ़र अपना....
तब तू आना मेरे पास...

ये मेरा वादा है
लिखूंगी तुझको
उस वक़्त जब...

फिज़ा की सुर्ख रंगीनियत
ढलान पे हो
बसंत कहने ही वाला हो
फूल पत्तों शाखों को अलविदा
हवाएं कैद हों
मौसम के बाड़े मे
जर्रा जर्रा रुखाई से हो भरा
तब तू आना मेरे पास...

ये मेरा वादा है
लिखूंगी तुझको
उस वक़्त जब...

मन इशारे से
करीब बुलाए वीराने को
गम में डूबे पत्थर भी
उभर आये
उसके पाँव टिकाने को
तू समझ लेना
वक़्त हो चला है तेरा भी
बिखर जाने का...
उस वक़्त तू आना जरुर....

ये मेरा वादा है
लिखूंगी तुझको.

      - प्रीति .
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कविता ... तुम रहना .


नीरव निस्तब्धता में,
बिना किसी आहट के 
देवदारों पर पड़ती 
रुई के फाहे जैसी 
बर्फ की तरह ...
कविता ... तुम झरना।

पानी से वाष्प हो , 
वाष्प से फिर पानी बन ,
पुनः पुनः ले जीवन ... 
आदि से अंत तक ,
अंत से अनंत तक ,
उद्गम से संगम तक 
तरंगिनी ... बहना।

तारकों में शशि जैसी ,  
प्रखर ओज, तेजोमय  
उदयमान रवि जैसी , 
अनजाने भावों सी ,
अनबोये पुहुपों सी ,
और कभी 
अनचाहे शूलों सी उगना ...
सोये हुए अंतस में 
कविता ... तुम चुभना।

काँटों भरे पथ पर 
लहुलुहान पैरों से ,
किन्तु हताश नहीं ,
किंचित उदास नहीं ... 
टिमटिमाती आँखों में 
स्वप्नों के बीज लिए ,
सांस-सांस 
आशा की लौ बन ...
कर जलना।
कविता तुम युगों तक 
बिना रुके चलना।

       - मीता .
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ए कविता .


कितनी चंचल                                              
कितनी नटखट 
कभी करे दोस्ती
कभी खटपट 

कभी निस्तब्ध्ता 
कभी शोर 
कभी इस ओर  
कभी उस ओर 

कभी किनारे से बह जाती 
कभी हृद तक समाती 
कभी थामती  मुझे
कभी छोड़ कर दूर निकल जाती 

कभी शोख 
कभी उदासियाँ 
कभी सजग 
कभी ले उबासियाँ 

ऐ कविता .....
जितनी बार देखूं 
तुझे 
हर बार नया रूप 
सब सराहें 
कह 
क्या खूब क्या खूब .

- राजलक्ष्मी शर्मा .
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और आखिर में -

" मैंने सोचा था कि ग़ज़लें नहीं कहनी हैं मुझे ,
  लिखे बगैर मगर चैन कहाँ मिलता है ."

   - इमरान खान ताइर .
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MASTERS - हिंदी 


कविता की ज़रुरत .



बहुत कुछ दे सकती है कविता
क्यों कि बहुत कुछ हो सकती है कविता
ज़िन्दगी में

अगर हम जगह दें उसे
जैसे फलों को जगह देते हैं पेड़
जैसे तारों को जगह देती है रात

हम बचाये रख सकते हैं उसके लिए
अपने अन्दर कहीं
ऐसा एक कोना
जहाँ ज़मीन और आसमान
जहाँ आदमी और भगवान के बीच दूरी
कम से कम हो ।

वैसे कोई चाहे तो जी सकता है
एक नितान्त कवितारहित ज़िन्दगी
कर सकता है
कवितारहित प्रेम .

- कुंवर नारायण .

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मुक्ति .


मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिला
मैं लिखने बैठ गया हूँ .

मैं लिखना चाहता हूँ 'पेड़'
यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है .
मैं लिखना चाहता हूँ 'पानी'.

'आदमी' 'आदमी' – मैं लिखना चाहता हूँ
एक बच्चे का हाथ
एक स्त्री का चेहरा
मैं पूरी ताकत के साथ
शब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ
यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा
मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाका
जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है

यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा
मैं लिखना चाहता हूँ।

- केदारनाथ सिंह .

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Masters - English 

The Poet and his Songs .



As the birds come in the Spring,      
We know not from where;
As the stars come at evening
From depths of the air;

As the rain comes from the cloud,
And the brook from the ground;
As suddenly, low or loud,
Out of silence a sound;

As the grape comes to the vine,
The fruit to the tree;
As the wind comes to the pine,
And the tide to the sea;

As come the white sails of ships
O'er the ocean's verge;
As comes the smile to the lips;
The foam to the surge;

So comes to the Poet his songs,
All hitherward blown
From the misty land, that belongs
To the vast Unknown.

His, and not his, are the lays
He sings; - and their fame
Is his, and not his; - and the praise
And the pride of a name.

For voices pursue him by day,
And haunt him by night,
And he listens, and needs must obey,
When the Angel says: Write!

         - Henry Wadsworth Longfellow .

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My Poetry .




My poetry’s not mere poetry, no,

but it’s the sound of sobbing from a life,

the din of doors in a dark jail,

the wheeze of two poor wasted lungs,

the thud of earth tossed to bury dreams,

the clash of teeth all chattering from cold,

the cry of hunger from a stomach wrenching wild,

the helpless voice before so many wrecks.

All sounds of life half lived,

of death half died — no poetry, no.


- Nguyen Chi Thien .

( Vietnamese Poet) 

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A poet!He hath put his heart to school.




A poet!—He hath put his heart to school,

Nor dares to move unpropped upon the staff

Which art hath lodged within his hand—must laugh

By precept only, and shed tears by rule.


Thy Art be Nature; the live current quaff,

And let the groveller sip his stagnant pool,

In fear that else, when Critics grave and cool

Have killed him, Scorn should write his epitaph.


How does the Meadow-flower its bloom unfold?

Because the lovely little flower is free

Down to its root, and, in that freedom, bold;

And so the grandeur of the Forest-tree

Comes not by casting in a formal mould,

But from its own divine vitality.


                      - William Wordsworth .
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हमारे मेहमान 


बिना रुके .


मुझे कवितायें लिखते जाने का शाप है 
बेशक गिर जाये 
सहन का दरवाजा 
क्या फर्क पड़ता है / गिर जाने दो
अभी कलम में स्याही शेष है .

सभ्यताओं ने 
मेरी कविता से सीखा था
ककहरा .

मैं लिख रहा था 
उस रोज़ भी 
जबकि 
बिग बैंग से उपजी थी धरती .
बेशक 
मैं लिखता रहूँगा 
प्रलय तक .

बिना रुके / बिना थमे / सांस लिए

जीते हुए / मरते हुए!

     - अमित आनंद .
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कविता जानती है .



कविताओं के साथ सम्बन्धों की शरुआत 
तुम्हारे सामान्य दु:खों की स्वीकारोक्ति से होगी .
वे मामूली दु:ख जिन्हें इतना भोगा गया
कि वे आम हो गए .
दु:ख, जिन्हें भोग कर तुम सुन्न हो गए ,
कविता उन्हें सुनते ही संजीदा हो जायेगी .

मसलन, बताओ उसे कि तुम नहीं देख पाए
कब और कैसे तुम्हारे बच्चे 
किवाड़ों की सांकल पकड़ कर खड़े हुए 
और चलना सीख गए .
कब तुम्हारी जवान बेटी को 
बिलकुल तुम्हारी तरह कुछ दांयी ओर मुड़ी 
नाक वाले लडके से प्यार हो गया .
अगर तुम उससे सिर्फ इतना कहो
जीवन के इस पड़ाव में तुम अकेले रह गए 
कविता, गिलहरी के बालों से बना ब्रश लेकर 
तुम्हारे चहरे की झुर्रियों पर जमी धूल साफ़ करेगी 
मानो तुम खुदाई में मिला मनुष्यता का एकमात्र अवशेष हो .

तुम बताओ अपनी कविताओं को 
कि बचपन से तुम इतने निराशावादी नहीं थे .
अपने बाड़े में बोये थे तुमने बादाम के पेड़
जिन्हें अकाल वाले साल में बकरियां चर गयी ,
कि उस शहर में जब तुमने किराये पर कमरा लिया 
मकान मालिक ने मना किया था 
कि तुम खिड़कियाँ नहीं खोल सकते ,
जबकि कविता जानती हैं 
तुम बिना दरवाजे खोले जिन्दगी गुजार सकते हो 
पर खिडकियों का खुलना कितना जरूरी था तुम्हारे लिये .

तुम बैठो कविता के साथ बगीचे के उस कोने में
जहाँ सबसे कम हरी घास हो ,
जहाँ अरसे से माली ने नहीं की 
मेहंदी के पौधों कि कटाई-छटाई ,
जहाँ कुर्सिओं के तख्ते उखड़े पड़े हो ,
उस जगह जहाँ सबसे कम चहल-पहल हो 
और बताओ उसे
कि जब तुम जीने के मायने समझे 
तुम अस्सी पार जा चुके थे .

कविता जानती है
कि इन आम से दु:खों को भोगना 
उतना ही मुश्किल है जितना 
हादसे में मारे गए पिता के 
अकड़ चुके जबड़े में उंगली फंसाकर गंगाजल उडेलना ,
और हुचक-हुचक कर रोती
विधवा हो चुकी माँ को चुप कराना .

कविता जानती है यह तथ्य 
कि सारी कविताएँ किसी अनसुने दु:ख का 
विस्तृत ब्यौरा हैं .

- अहर्निशसागर .
_________________________

Translations / अनुवाद 

Life , on the Go .

Behind the row of pines,
lies a heap of snow.
Above in pallor,
flies a flock of crow
.............. & ...............

somebody said -
the passage means -
a lonely exile,
only with the breeze,
and its chimes,
or the travellers,
and their daze,
or with the spiral of the ivies,
fleeing the yard .
And I,
gloomy,
in the rain,
behind the socked glass.
This is my room
Here I write,
of the walls .
There are the two walls,
And of the few passers.
Somebody despairs,
somebody knits,
another counts,
and somewhere , someone reads ...
I write .
............... & ..................
Somebody hear -
Life means: the sighting,
of a starling,
leaving the sky.

Tell me what is wrong ?
You still have the sun,
and the children,
coming next month,

Still you have the thought of the dove
you watched last night !

Somebody died.
Still , the breads are good.
Still water falls down.
Still, the horses drink
from the same lake.
............. & ...............
Still,
the drops move to the rivers.
And the snow slides on the shoulders-
of silence .

And , time still flies above
the shivering spine of the jasmine .

            - Sohrab Sepehri .



Translation: Maryam Dilmaghani, 
December 2008, Montreal
Courtsey Persian poetry in English.

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सिर्फ कविता के लिए .



सिर्फ कविता के लिए यह जन्म, सिर्फ कविता के लिए

कुछ खेल, सिर्फ कविता के लिए बर्फ़ीली सांझ बेला में 

अकेले आकाश-पाताल पार कर आना, सिर्फ कविता के लिए

अपलक लावण्य की शान्ति एक झलक,

सिर्फ कविता के लिए नारी, सिर्फ

कविता के लिए इतना रक्तपात, मेघ में गंगा का निर्झर

सिर्फ कविता के लिए और बहुत दिन जीने की लालसा होती है

मनुष्य का इतना क्षोभमय जीवन, सिर्फ

कविता के लिए मैंने अमरत्व को तुच्छ माना है । 


मूल बांग्ला कविता : सुनील गंगोपाध्याय . 

हिन्दी अनुवाद : प्रियंकर पालीवाल .

श्री पालीवाल की दीवार से साभार.. 

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On Earth .


I have never wished

to be a star
on the robe of the sky -
or to be like the anointed souls,
silently attending the gathering
of the Gods .

I have never left the Earth .

I do not know the stars .
................. & ......................
Like other plants,
standing on the earth ,
I drink the rain and sunlight -
I breathe the breeze to live ,
to survive .

I am not barren ,

but fertile !
Filled with desire
nurtured by sorrow
I stand on earth
looking up to the moon 
I see the stars hailing ,
praising me , caressing ,
bracing me .

I look out from the tear 

I am no more -
than the echo of a song !
Eternal is not me !
Eternity , not mine !
I am just a note 

the echo of a song !

Steered by the echoes 

of the fading song ,
I build my nest around -
the silence ,
the absence
and the strokes of hands 
sliding on my skin
like the dews of a rose .
.................. & ....................
On the walls of my house 
as small as a day ,
as great as the life ,
with the dark chalk ,
and the scalpel of love -
the passers left me notes ;
they carved their names 
and hopes .

On the walls of my house,

as small as a day,
as great as the life ,
the passers let me know
their sorrow ,
their dreams ,
their never told words ;

And these broken words

penetrating my core ,
piercing into my heart ,
they rain , the stream ,
from my hazy eyes ,
like the falling stars !
................. & ..................
From all the lips
caressing my lips ,
the glow of a dew ,
and the seed of a star -
was left to grow -
in my cloudy eyes ,
like keepsakes carved 
on the walls - of my house .

Then why should I wish

for a remote star ,
blinking just at nights ?

        - Forough Farrokhzad .



Translation: Maryam Dilmagani, 
September 2006, Montreal
Courtsey Persian poetry in English.

_________________________




सरगम -

सरगम में आप के लिए प्रस्तुत है हरिवंश राय बच्चन जी का लिखा और मुकेश जी का गाया, दिल की गहराई तक उतर जाने वाला ये गीत जो जीवन की क्षणभंगुरता को बहुत ही खूबसूरती से उकेरता है - 

मैं पल दो पल का शायर हूँ .



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9 टिप्‍पणियां:

Ashwini Kumar ने कहा…

loved it.

Neelima ने कहा…

superb links

Neelima ने कहा…

superb links

बेनामी ने कहा…

सभी कविताएँ अपने पूर्णतया भावों को बयान कर रही हैं
आपका प्रयास सराहनीय हैं .. जारी रखियेगा.. शुक्रिया

-Aharnishsagar

Reena Pant ने कहा…

बहुत दिनों बाद पढने को मिला -एक और बहुत सुंदर अंक,बहुत भावप्रवण और सार्थक भूमिका ....सभी रचनाकर्ताओं को मेरा आभार और बधाई
मैं बहुत देर तक शब्दों को
पकडती रही,
कविता रचने का प्रयास करती रही
और शब्द उड़ते रहे
आगे -पीछे
दाएँ -बाएं
बनते-बिगडते रहे
कभी बादल बन
विस्तृत आकाश की सीमा
लांघने की कोशिश में विफल
कभी चाँद की चांदनी
में पिघल गए
तो कभी सूरज की गर्मी
में जल गए।
मैं बहुत देर तक दिल और
दिमाग को मिलने का
प्रयास करती रही
कविता रचने का प्रयास करती रही .
शब्दों की धार
कभी तीखी होकर
अपनों को घायल कर देती
तो कभी पनीली हो
दिशा बदल देती
मैं उन्हे कागजों में समेटने का
प्रयास करती रही।
मैं बहुत देर तक शब्दों को
पकडती रही,
कविता रचने का प्रयास करती रही ...........

Na ने कहा…

Thank you Ashwini ji for the appreciation

Na ने कहा…

Neelima Ji, many thanks for reading and appreciating

Na ने कहा…

Aharnishsagar Ji , dhanyawad aapki sarahna ke liye

Na ने कहा…

Reena ji, you always encourage us , and write such poetic words thats it's a lasting pleasure to read your comment.Thank you.

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