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बुधवार, 5 मार्च 2014

संवेदना - The Thread that Binds


मानवीय सुख-दुःख निरंतर अभिव्यक्ति का मार्ग तलाशते हैं। सुख का वह एक क्षण जब मनुष्य को लगता है धूप का सोना बिखरा है तो मानो उसी के लिए, बारिश यदि होती है तो बस उसे ही भिगोने के लिए, तारों से भरा-पूरा आसमान उस से ही बातें करना चाहता है, दुनिया का हर फूल उसे देख कर मुस्कुराता है  … जैसे सब कुछ स्पंदित है उसके ह्रदय की गति से, चारों ओर सौंदर्य और स्फूर्ति भरी है उसकी ही विस्मित दृष्टि की तरह। तब वह अपने से बाहर आ कर जुड़ जाता है प्रकृति से, अपने इर्द-गिर्द के संसार से, उसे रचने, उस में बसने वालों से। कवि इसे अपना 'हरापन' कहता है। और यही हरापन उसकी अभिव्यक्ति को जीवित रखता है। ये हरापन वो संवेदना का तार है जो उसकी जड़ों से टहनियों तक रक्त संचार करता है और झुलसती हुई गरमी में भी उसे सघन, छायादार रखता है। कवि कह उठता है
" मेरा गीत न गा पाया यदि दर्द आदमी का
अगर नहीं कर पाया थमे पसीने का टीका
भाषा बोल न पायी हारी-थकी झुर्रियों की …
 … कुछ नहीं "
यही संवेदना मनुष्य को जोड़ती है अपने जैसों से, उनके सुख-दुःख से, हार-जीत से, उनके और अपने बीच के उस तंतु से 'जो आदमी को पेड़ों से अलग करता है।' किन्तु वह इस सत्य से अनभिज्ञ भी नहीं कि
"कहने पर भी कहीं
कही जाती है पीड़ा
पीड़ा की भूमि पर उगाता हूँ
फूल, वृक्ष, लताएं
सींचकर संचित अनुभवों से अपने। "
- केशव .
 कटु ही सही, जीवन की तेज़ बहती हुई धारा में गहरे उतर कर निकाला हुआ कवि का सत्य जिस वेदना को अभिव्यक्ति दे रहा है, वह उस संवेदना की ही तो कड़ी है जिसे वह जीवित रखना चाहता है, जब वह कह उठता है -
" वेदना में दूसरे की
वेदना जो है दिखाता
वेदना से मुक्ति का
निज हर्ष ही वह है छिपाता  … "
इसी लिए वह शब्दों से जूझता है कि सत्य को परिभाषित कर सके।  इसी लिए बार-बार रचता है कि उसके भीतर के मनुष्य का संवाद बाहर के मनुष्य से चलता रहे जिस से वह उस अदेखी डोरी से बंधा है जिसे संवेदना कहते हैं।
" खुदा को पा गया वाइज़ मगर है
ज़रुरत आदमी को आदमी की "
फिराक़ गोरखपुरी के इस शेर के साथ , चिरंतन का यह अंक आप सब के लिए -

- मीता .
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क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

मैं दुखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा,
रीति दोनो ने निभाई,
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी;
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

एक भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा?
सत्य को मूंदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?क्या करूँ?

कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरे से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का रहे व्यापार जारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

क्यों न हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुख नहीं बंटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ ?

- हरिवंश राय बच्चन
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संयोगवश 

मैंने एक दिन सड़क पर
एक आदमी को देखा
और मुझे लगा मैं इसे जानता हूँ।

'गलत'- मेरे मन ने कहा
तुम इसे नहीं जानते।

जानता हूँ - मैंने कहा
यह वही आदमी है
जो मुझे ट्रेन में मिला था

एकदम गलत - मेरे मन ने फिर कहा
यह वह नहीं है !

है !
नहीं है -
मैं देर तक सोचता रहा
कि तभी मुझे दीखा
उसके धूप भरे चेहरे पर वह चिकना सा द्रव
जो आदमी को पेड़ों से अलग करता है।

वही - वही
यह वही आदमी है -
मैंने खुद से कहा
और बहुत दिनों बाद
मुझे एक ऐसी खुशी हुई
जिसके बारे में किताबों में
मैंने कहीं कुछ नहीं पढ़ा है !

- केदारनाथ सिंह  .
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मेरा चेहरा 

मेरा चेहरा
अगर नहीं बन पाया मेरा गीत
कुछ नहीं  …

चेहरा जिस पर धूल पड़ी है झीनी-झीनी सी
जिसके नीचे आग दबी है नयी रौशनी की
खाकर मार समय की मेरी बोझल पेशानी
अगर नहीं गा पायी मेरी टूटन का संगीत
कुछ नहीं

मेरा गीत न गा पाया यदि दर्द आदमी का
अगर नहीं कर पाया थमे पसीने का टीका
भाषा बोल न पायी हारी-थकी झुर्रियों की
लाख मिले मुझको बाज़ारू जीत
कुछ नहीं।

-------------- और ------------
हरापन नहीं टूटेगा 

टूट जायेंगे
हरापन नहीं टूटेगा

कुछ गए दिन
शोर को कमज़ोर करने में
कुछ बिताए
चाँदनी को भोर करने में
रोशनी पुरज़ोर करने में

चाट जाये धूल की दीमक भले ही तन
हरापन नहीं टूटेगा

लिख रही हैं वे शिकन
जो भाल के भीतर पड़ी हैं
वेदनाएँ जो हमारे
वक्ष के ऊपर गढ़ी हैं

बन्धु! जब-तक
दर्द का यह स्रोत-सावन नहीं टूटेगा

हरापन नहीं टूटेगा

- रमेश रंजक  .
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उसने मेरा हाथ देखा 

उसने मेरा हाथ देखा और सर हिला दिया
"इतनी भाव प्रवणता
दुनिया में कैसे रहोगे !
इस पर अधिकार पाओ , वरना
लगातार दुःख दोगे
निरंतर दुःख सहोगे। "

यह उधड़े मांस सा दमकता अहसास
मैं जानता हूँ , मेरी कमज़ोरी है
हलकी सी चोट इसे सिहरा देती है
एक टीस है जो अंतरतम तक दौड़ती चली जाती है
दिन का चैन और रातों की नींद उड़ा देती है
पर यही एहसास तो मुझे ज़िंदा रखे है
यही तो मेरी शहज़ोरी है !
वरना मांस जब मर जाता है
जब खाल मोटी हो कर ढाल बन जाती है
हल्का सा कचोका तो दूर , आदमी गहरे वार
बेशर्मी से हंस कर सह जाता है ;
जब उसका हर आदर्श दुनिया के साथ
चलने की शर्त में ढल जाता है
जब सुख सुविधा और सम्पदा उसके पाँव चूमते हैं -
वह मज़े से खाता-पीता और सोता है
तब यही होता है ; सिर्फ
कि वह मर जाता है।
वह जानता नहीं, लेकिन
अपने कन्धों पर अपना शव
आप ढोता है।

- उपेन्द्रनाथ अश्क  .
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कोई नहीं उसके साथ 

क्या दुःख कविता में धुंधला हो जाता है
या कभी-कभी चमकीला भी
जीवन में पछाड़े खाती उस औरत का
तार-तार होता विलाप
पराये शब्दों में जाकर क्या से क्या हो जायेगा
कहना कितना मुश्किल है

तहस-नहस कर दी गयी उसकी झोपड़ी
चिथड़ों-बरतन भांडों समेत
बेदखल कर दी गयी जो विधवा
डरते-कांपते अधनंगे तीनों बच्चे खड़े
तकते उसे जैसे वह कोई खौफनाक दृश्य

तीसरे जो भी बांचेंगे
विस्थापन की यह हिंसा
दिखाई देगा क्या उन्हें
ऐसे ही किसी हड़कम्प में ध्वस्त होता हुआ अपना घर
बीसवीं के पटाक्षेप के बाद भी धरती पर
कितनी जगह है खाली बसने-बसाने के लिए
फिर भी पुश्तैनी कब्ज़ों को छोड़
घास-पात को निशाना बनाता है
हत्यारों का अंधा बुल्डोज़र
बसाने के बदले उजाड़ने की इस क्रूरता को
रचते हुए कितना कुछ टूट रहा है भीतर ही भीतर
और आस-पास की दुनिया में कोई फर्क नहीं पड़ रहा
कुछ नहीं हुआ जैसे चुप नदी नर्मदा
सुबह और पहाड़ चुप
वैसे ही मुंह बंद लोगों कि परछाइयाँ।

विपदा के सिवा कोई नहीं है
फिलवक़्त उस औरत के साथ
जब कि पूरा देश है चारों तरफ
हज़ारों शब्द हैं आंसू पोंछने
और कमज़ोरों के साथ खड़े होने के बारे में
पर एक भी शब्द उसके साथ
ऐसा कुछ नहीं कर रहा।

- चंद्रकांत देवताले  .
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नदी पार करते हुए 

मैं नहीं देख पाता
अपनी ओर बढ़ती हुई लहरों को
डरकर दूर भागती मछलियों को
किनारे से कटती हुई मिट्टी को

कैसे जान पाता नदी का दुःख
अगर गुज़र जाता मैं भी पुल से
औरों की तरह !

- नोमान शौक़  .
'रात और विषकन्या' से  .
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The Little Boy and The Old Man .


Said the little boy, "Sometimes I drop my spoon."
Said the old man, "I do that too."

The little boy whispered, "I wet my pants."
"I do that too," laughed the little old man.

Said the little boy, "I often cry."
The old man nodded, "So do I."

"But worst of all," said the boy, "it seems
Grown-ups don't pay attention to me."

And he felt the warmth of a wrinkled old hand.
"I know what you mean," said the little old man.

- Shel Silverstein .

शनिवार, 10 नवंबर 2012

जलाओ दिए पर ....


दीपावली त्यौहार नहीं पर्व है। पर्व और त्यौहार में बहुत अंतर होता है। त्यौहार मनाया जाता है और पर्व से पावन हुआ जाता है। दीपावली ' तमसो मा ज्योतिर्गमय ' का पर्व है - अन्धकार से प्रकाश की ओर जाता हुआ ... धरती से आसमान की तरफ बहती हुई अन्धकार को चीरती , मानव ह्रदय के प्रकाश की एक चपल रेखा जो भेद देती है महा अमावस्या के अंधकारमय सीने को। जब महादेवी कहती हैं -
" मधुर मधुर मेरे दीपक जल
  युग युग प्रतिदिन , प्रतिक्षण , प्रतिपल
  प्रियतम का पथ आलोकित कर ."
तब महादेवी का प्रियतम निजी स्तर से उठ कर विश्व के विराट रूप को ग्रहण करता है। वह कोटि कोटि जनों के अंधकारमय पथ को आलोकित करते हुए आशा और विश्वास के सूर्यलोक की तरफ प्रस्थान करता है। लौकिक धरातल पर प्रचलित धारणाओं के अनुसार श्री राम के अयोध्या आगमन पर असंख्य दीपमालिकाओं का जलाना अब तक क्यों चला आ रहा है ? क्योंकि यह वह प्रतीक है जो आज भी उतना ही सामयिक है जितना कि उस युग में था। आज भी गांधी के राम और उन के कहे राम - राज्य की परिकल्पना उन्ही नन्हे - नन्हे टिमटिमाते दियों की लौ में छिपी हुई है। महावीर स्वामी का निर्वाण भी इसी आलोक पर्व पर हुआ यानि शांकर दर्शन के अनुसार माया के अंधकारमय बंधन से मुक्त हो ब्रह्म के आलोकमय साम्राज्य में आत्मा का प्रवेश।

           प्रकाश के इस पावन पर्व की शुभकामनाएं .
                                                                 - दिनेश द्विवेदी .
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इनकी कलम से -

 कल्पना ही सही, कैसी है?


                         
घनीभूत हो उठते अन्धकार में
दूर कहीं एक ज्योति:स्फुर्लिंग ने 
तम-आवरण को चीर कर सर उठाया
और सहस्रों प्रकाश-वीथिकाएँ जन्म ले बैठीं !

एक अकेली आलोक-रश्मि 
और अन्धकार से जूझने की इतनी जीजिविषा !
मानो एक आवाहन ..
                                 है निखिल विश्व को उदबोधन
                                कर दो समस्त तम का शोधन...

बस,
अमावस की कालिमा को पल भर में विलोपित करती
कितनी उर्मिलायें तैल-पात्रों में झिलमिला उठीं ?
ज्ञात नहीं 
जैसे अमावस की रात्रि में दसों दिशाओं में सूर्योदय हुआ हो !
यही तो दीपावली की गरिमा, उसका सौंदर्य है !!

आज कोई कोना ऐसा नहीं 
जो प्रकाश-निधि-हीन हो
क्या मनु-पुत्र आज निशा होने ही न देगा?

'तमसो मा ज्योतिर्गमय'
महाप्राण से ये निवेदन - आज अर्थ खो बैठा है
किधर चलें - नहीं सूझता,
सर्वत्र तो प्रकाश बिखरा है...

तो क्या करें - ठहर जाएँ?

कदापि नहीं.
निमिष भर के इस उत्सव को अंतिम सत्य तो नहीं कह सकते.
अभी चलना होगा....

प्रश्न- कहाँ?
उत्तर - मौन

दूर कहीं .......धूल सी उड़ी  
नन्हे क़दमों की आहट...
कलुष-रहित ह्रदय में 
उष्ण-स्नेह-स्पंदन लिए
वह नन्हा
जिधर जा रहा है - वहीँ चलें

अपने अन्तर्तम की सारी कालिमा, सारा द्वेष समेटें
और छोड़ आयें....
दूर..... क्षितिज के उस पार
ताकि वर्ष भर दीवाली हो ! 

कल्पना ही सही, कैसी है?

                  ..... पुष्पेन्द्र वीर साहिल .
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अमावस का अँधेरा
        दियों से दूर नहीं होता .

क्या कभी 
किसी राम ने 
किसी रावण को मारा था ?

रावण तो आज भी जिन्दा है 
और उसके दस सर कट कर  
हर तरफ बिखर गए हैं .
कभी वो
आतंकवाद बन कर उभरता है  ,
कभी वो भ्रटाचार बन कर ,
और उसका दमन जारी है .

और राम 
वो है कहाँ  !!
अब कौन सा वनवास काट रहे हैं  
की सिर्फ उनकी खडाऊं ही नजर आती है  .
भरत की पूछो तो 
वो राम को ढूँढने निकले हैं 
और प्रजा प्रताड़ित हो रही है .

सीता 
उसकी तो अग्नि परीक्षा 
अब जन्म लेने से पहले ही हो जाती है ,
और उसको जन्म लेते ही  
धरती में समाना पड़ रहा है .
जनता का पसीना 
स्वित्ज़रलैंड की लंका मैं कैद है ,
और राम का नाम ले कर
विभीषण उस पर राज कर रहे है .

और महंत 
भोली भली जनता को 
कलयुग  की घुट्टी पिला रहे है .
फिर कैसा दशहरा 
फिर कैसी दिवाली 
अमावास का अँधेरा
दियों से दूर नहीं होता .



- स्कन्द .


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हम तुम .
                                
                                   

हम दीप जला कर बैठे हैं, तुम साथी ईद मना लेना,
हम खील बताशे खाते हैं, तुम शीर हमारी खा लेना।

जगमग रोशन जब उसका, सारा आंगन हो जाये,
मेरा घर भी पास खड़ा धीमे धीमे मुस्काये,
हिन्दू मुस्लिम मुद्दों के यहाँ नहीं होते परचम,
मेरी गलियों में आओ देखोगे अनमोल रसम,
मेरे सूने घर का, आंगन रोशन वो करता है,
मेरे घर लक्ष्मी आये, सदा जतन वो करता है।

उसका मेरे घर आकर भेली का टुकड़ा लेना,
मेरा उसके घर जाकर मीठी वो गुजिया लेना,
हम दीप जला कर बैठे हैं, तुम साथी ईद मना लेना,
हम खील बताशे खाते हैं, तुम शीर हमारी खा लेना।
                         
                                      ..... इमरान खान ' ताइर '.

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नीलम चिरंतन के साथ पहली बार जुडी हैं . उनका बहुत स्वागत है -

दीवाली ...


सुबह:

   सुबह उठते ही
   आसमान में सूरज
   सावन का झूला झूलता
   अपने कानो पर फटाके लगाए
   ज़मीन को भी अपनी तपिश देता है..
 
   अम्मा, रंग फर्श पर बिखेर देती है
   प्रक्रति को अपने आँचल से निकाल
   कर आँगन में छोड़ती हुई ...

   छोटू,यहाँ वहाँ चींटियों
   को न्योता देता
   लड्डू के मोती गिराता
   हुआ


शाम..

 ढलती शाम ने आसमान में
 रंगोली बिखेर दी ..
 दीवाली उसे भी मनानी है

सूरज मुस्कराता हुआ
तारो को बुलाता हुआ
छुप गया उनसे आँख
मिचोली के लिए ...

रात :

  आसमान में आग लग गयी
  सागर ज़मीन से उपर की तरफ
  मूड गया ...
  समझ ना आए ये ज़मीन है
  या आसमान , रोशनी में
  जलते हुए ...

प्रेम :

    घर घर की दीवारे मीठी हो गयी
    नमक का पानी धूलकर बहा गया
    लगता है रंग रोगन, चाशनी से हुआ

    पड़ोस की छत अब सबकी है
    जो कल तक सिर्फ़ उनकी थी..

दर्द :

आसमान तक जाती
तेरी याद की रोशनी
यादो को ही रंग बिरंगा करके
अपने घर में छोड़ दिया ...

कड़वाहट को दिल से दूर कर
ज़ुबान को याद से मीठा बना दिया
तेरी यादो की ध्वनि की घंटी से
रब को शुकराना हो गया...

यादो के लिबास उतार कर
नयी यादे बना डाली ...

याद है दीवाली की रात को
ही तुम रोशनी के साथ
रोशनी बन गयी......

ग़रीब:

 घर आज भी वैसा ही है
 जैसा रोज़ था ...
 चाँद तो आज किसी का नहीं
 उसके घर भी आज दीवाली है...

  दीप नहीं, फूल नहीं , पूजा नहीं
  मेरे झोपड़ी के बाहर बस   रात काली है..........

देश :

रावण कई है आज भी
राम कही मिलता नही
लूट लिया अपनी ही सीता को
राम ने रावण बनके
अब दीप जले भी तो क्या ,
अंधेरे मन के तो जाते नहीं.


मगर फिर भी दीवाली उम्मीदो की है
गर्भ में पल रहा भविष्य सुंदर और स्वस्थ है
इसी उम्मीद के साथ दीवाली की सभी को शुभकामनाएँ .

           - नीलम समनानी चावला .

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अंतरदीप



एक दीप अंतस का तुम भी जला लो

सारा आकाश जगमगाता है इस अमाकी रात

मुझे भी याद आती है वो मीठी मीठी बात

तुम भी मेरे संग मुस्कुरा लो

एक दीप अंतस का तुम भी जला लो

बचपन के खुलते है कई बंद द्वार

जब मस्ती का नाम होता था त्यौहार

उन्ही यादों के द्वार तुम भी खटका लो

एक दीप अंतस का तुम भी जला लो

आज मेरे बच्चे करते है वैसा ही व्यव्हार

निश्चिन्त मनछुट्टियाँ और ढेर सारा प्यार

शामिल हो के हम संग तुम भी गुनगुना लो

एक दीप अंतस का तुम भी जला लो

ये ठीक है हवाए तंग मौसम का साथ नहीं

कई परेशानियाँ है पर दुःख की कोई बात नहीं

आज सब बिसरा के उम्मीदों को गले लगा लो

एक दीप अंतस का तुम भी जला लो ...

 -------- और ---------



आपकी 
एक एक मुस्कुराहट 
प्रेम  की 
भरोसे की 
और शुभेच्छाओं की 
और
देखिये 
वो पत्थर की दीवार 
रौशनी से झिलमिला उठीं .

------------ और ---------------

आस्था - दीप .

दीप आस्थाओं के जला लो 
आओ तुम दीपावली मना लो 

कण कण  रची श्रृष्टि ने नवीनता 
नवीन परिधान से खुद को सजा लो 

तम चीर कर रोशन करो चिराग 
अमा "की रात तुम जगमगा लो 

सबका मन कर दे सुगन्धित  
अंतर्मन में कुछ पुष्प खिला लो 

रूठ कर बैठे प्रिय मित्र को 
आज अपने घर बुला लो 

हर त्यौहार मीठे का रिवाज 
अपना मन  मीठा   बना लो

------------- और --------------

तुम हो ...

फुलझड़ी से ज्यादा 

तुम्हारी आँख चमकती है

स्पर्श बोलता है 

खुशियाँ महकती हैं

नए परिधान में आओ तो 

आँगन ऋतुएं उतरती है 

तुम नाराज़ हो 

तो 

तन जाता है काला शामियाना

खुश हो तो 

रौशनी बिखरती है ....:)

     
        - राजलक्ष्मी शर्मा .

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CELEBRATION .


i see wishes hanging from trees
where leaves once gathered gold
as autumns mellow sunshine
filters through the winter cold

reminds me of the shaded pine
where you clasped my hand
hesitatingly for the first time
and the fire in my heart
tasted wine in your blood
and millions of tiny lights
sparkled through our souls

gently you gathered a twinkle
the bud of your palms aglow
as my hands clasped yours
and they merged into one
with the glow of surrender

rememeber how then night fell
diwali lights of the mountains
scintillating hope doubly reflected
in the lake and in our eyes
and how you whispered

each diwali in one diya
this twinkling light will glow
and till you can discern it
our sacred love will flow

do you know, love?
since then my celebration
of this festival of lights
is just that  one lamp
glowing in your name
always and forever!

....... Sadhana .

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एक दिया फिर आज जलाओ .


मन को ऐसा क्यों लगता है ,
चाहे कितने दीप जला लें 
कहीं अँधेरा रह जाता है !

इतने रूप बदल कर फैला .
इतने रंग बना कर छाया .
इतनी आसानी से कब मिट पायेगा 
ये तम का साया !?

चाहे जितने दीप जला लो ,
धरती को तारों सी जगमग दे डालो ,
आकाश बना लो ;
जब तक दीपक नहीं जलेगा 
मन के उस गहरे गह्वर में ,
घोर अँधेरा नहीं छंटेगा .

तुम प्रकाश को ढूंढ रहे हो कहाँ ?
दियों की इस जगमग में !
ये प्रकाश तो क्षण भर का है 
और अँधेरा युगों युगों का !!

एक दिया फिर आज जलाओ 
मन के उस बिखरे आँगन में 
जिस में कब से धूल अटी है ,
एक रंगोली वहां सजाओ .

अब उसके प्रकाश में देखो 
सब कुछ कितना आलोकित है .
कोई भी तो नहीं पराया ,
तेरा मेरा नहीं कहीं कुछ ,
प्रेम सत्य है , और पूजित है .

एक दिया फिर आज जलाओ 
उस सूने घर के आँगन में ,
जिस में भूख रहा करती है ,
बीमारी है , बेकारी है ,
नाउम्मीदी बेचारी है .

पोंछो उन आँखों के आंसू ,
देखो ये उजास कैसी है ,
मुस्कानों में फ़ैल रही है ,
सूरज के प्रकाश जैसी है !

एक दिया फिर आज जलाओ वहां ,
जहाँ फिर कभी बुझे ना .
रहे हमेशा शीश उठाये ,
ज्योतिर्मय ,
जगमग करती लौ ;
तम के आगे कभी झुके ना .

---------------- और -----------------------

दीप मेरे जल ....


दीप मेरे जल तुझे है जूझना तम से , तिमिर से .

देख तुझ को नियति ने इस रूप में इस हेतु ढाला,
जल सके तुझ में भले ही क्षीण सी , पर ज्योति ज्वाला ,
सींचता जा ,सींचता जा , ज्योति को अपने रुधिर से .
दीप मेरे जल तुझे है जूझना तम से , तिमिर से .

मत समझ तू धूल मिट्टी से बना तो क्षुद्र है ,
क्षणिक जीवन हो तो क्या है , देख तुझ में रूद्र है ,
तू भला है तारकों की ज्योति हीना पंक्ति भर से .
दीप मेरे जल तुझे है जूझना तम से , तिमिर से .

है तेरी पूजा निरंतर प्राण को अपने गलाना ,
झेल पीड़ा दाह , श्वासों की अकम्पित लौ जलाना ,
अब न कोई राह भटके फिर अँधेरे की डगर से .
दीप मेरे जल तुझे है जूझना तम से , तिमिर से .

                - मीता .

        ( झरता हुआ मौन से )

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शुभ दीपावली 


खुशियाँ खूब और गम न हो ,
लौ चिरागों की कम न हो .

लुटाते रहे यूं ही ज़माने भर में ,
'खज़ाना-ए-मोहब्बत' खतम न हो .


"दीये" दिवाली और खुशियों के खूब रोशन हो आपके जीवन में !!

... अमित हर्ष .
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हमारे मेहमान -


कल ...
  • बीती रात जब मैं लौट आया था ओस मे भीग रही छत से, मुंह उठाये खड़ी मुंडेरों पर कुछ मटियाले दीये टिमटिमा रहे थे, जबकि चुक गया था उनका तेल...... उनकी बाती राख हों चुकी थी,फिर भी अपनी पेंदी पर सिमट जाने के बावजूद वो जले जा रहे थे...... यद्यपि उस वक़्त उनकी रौशनी लुभावनी भी नहीं शेष थी, फिर भी.........
    रौशनी देना भी कितना त्रासद होता है ना......... आपने लगातार जलते जाना होता है चुक जाने तक,और एक रोज़ अपनी ही जड़ों पर अपनी ही राख सिमट आती है!
    कल ...
    कल फिर भी शेष रहेगा अंधियारा..... 
    कल फिर आएगी कोई घोर काली अमावस
    हाँ पर
    दीये भी आते रहेंगे
    अपनी शिराओं पर आग लगाए ..... जिद्दी दीये,
    ना अँधियारा कभी ख़तम होगा
    और ना ही दीये अमर होंगे
    क्रम चलता रहेगा......
    होने और ना होने के बीच ....... 
    प्रकाशमान होने की त्रासदी नए नए प्रतिमान गढ़ेगी!

              - अमित आनंद .
    _________________________________________________

    दीप देहरी जलते - जलते ...

    स्वप्न संजोते रात बीत गयी
    बीत गया दिन चलते - चलते ,
    पाहून कोई द्वार न आये
    दीप देहरी जलते - जलते।

    मंगल कलश हुए सब रीते ,
    बिखरे रोली - अक्षत - चन्दन ,
    बाहर - भीतर घिरा अँधेरा
    विपिन हो गया मन का नंदन।

    आस संजोये उम्र बीत गयी
    नैन भरे हैं ढलते - ढलते !

    पाहून कोई द्वार न आये
    दीप देहरी जलते - जलते।

            - नत्थू सिंह चौहान .

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    Masters -

    जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना .



    जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना                                              
    अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
    नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
    उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
    लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
    निशा की गली में तिमिर राह भूले,
    खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
    ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
    जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
    अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

    सृजन है अधूरा अगर विश्‍व भर में,
    कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
    मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
    कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
    चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
    भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
    जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
    अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

    मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
    नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
    उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
    नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
    कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
    स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
    जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
    अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

    ------------- और -----------------

    मैं अकंपित दीप प्राणों का लिए 




    मैं अकंपित दीप प्राणों का लिए,
    यह तिमिर तूफान मेरा क्या करेगा?

    बन्द मेरी पुतलियों में रात है,
    हास बन बिखरा अधर पर प्रात है,
    मैं पपीहा, मेघ क्या मेरे लिए,
    जिन्दगी का नाम ही बरसात है,
    साँस में मेरी उनंचासों पवन,
    यह प्रलय-पवमान मेरा क्या करेगा?
    यह तिमिर तूफान मेरा क्या करेगा?

    कुछ नहीं डर वायु जो प्रतिकूल है,
    और पैरों में कसकता शूल है,
    क्योंकि मेरा तो सदा अनुभव यही,
    राह पर हर एक काँटा फूल है,
    बढ़ रहा जब मैं लिए विश्वास यह,
    पंथ यह वीरान मेरा क्या करेगा?
    यह तिमिर तूफान मेरा क्या करेगा?

    मुश्किलें मारग दिखाती हैं मुझे,
    आफतें बढ़ना बताती हैं मुझे,
    पंथ की उत्तुंग दुर्दम घाटियाँ
    ध्येय-गिरि चढ़ना सिखाती हैं मुझे,
    एक भू पर, एक नभ पर पाँव है,
    यह पतन-उत्थान मेरा क्या करेगा?

                 - गोपालदास "नीरज".

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    श्री विपिन जोशी की दो रचनायें इस विशेषांक में प्रस्तुत हैं। उनके लिए श्री माखन लाल चतुर्वेदी जी ने कहा था," विपिन जी के गीत न केवल मध्य प्रदेश की किन्तु हिंदी संसार की निधि हैं। उनके ह्रदय के बोल अशर्फियों के तौल पर भी नहीं तोले जा सकते।"


    दिशा - बोध .


    अपने दीपक तुम आप बनो , संगी !
    तम ही खुद तम - तारक हो जायेगा।

    अभिलाषाओं का अंत नहीं ,
    अभिमंत्रों की आवाज़ नहीं ,
    तृष्णाओं के तट का , तल का -
    आरम्भ नहीं , अंदाज़ नहीं !
    अपने दर्पण तुम आप बनो , संगी !
    गुण ही खुद गुण - गायक हो जाएगा।


    अपने दीपक तुम आप बनो, संगी !
    तम ही खुद तम - तारक हो जायेगा।

    आशाओं का आधार नहीं ,
    विश्वासों का विस्तार नहीं ,
    सपनों की साधों का , स्वर का -
    संसार नहीं , संचार नहीं।
    अपना सपना तुम आप बनो , संगी !
    सुख ही खुद सुख - साधक हो जाएगा।


    अपने दीपक तुम आप बनो, संगी !
    तम ही खुद तम - तारक हो जायेगा।

    दुनिया बहुरंगी है , लेकिन -
    रस - रंग नहीं , ढब - ढंग नहीं ,
    अपनों की अपनी नगरी में
    अपना भी अपने संग नहीं।
    अपने संगी तुम आप बनो , संगी !
    दुःख ही खुद दुःख - दाहक हो जाएगा।

    ---------- और ------------

    स्नेह दीप बुझते जाते हैं ...


    विद्युत् दीपों के प्रकाश में
    स्नेह दीप बुझते जाते हैं।

    अन्धकार के वक्षस्थल पर
    आभा करती है अठखेली,
    कोमल - कुंदन किरण कुमारी
    कुटिया से चढ़ गयी हवेली !
    झन - झन की झंकृति झंझा में ,
    पावन स्वर उड़ते जाते हैं।


    विद्युत् दीपों के प्रकाश में
    स्नेह दीप बुझते जाते हैं।

    नगर - नगर में जुड़ा हुआ है
    स्नेह हीन दीपों का मेला !
    दिशा - दिशा में घूम रहा है
    दीप खोजने स्नेह अकेला !
    ज्योतिर्जग के जगमग पथ पर
    चरण - चिन्ह मिटते जाते हैं।


    विद्युत् दीपों के प्रकाश में
    स्नेह दीप बुझते जाते हैं।

    चेतन जल के अंतराल से
    जड़ चट्टानें उभर रही हैं ,
    मन्त्रों की उषा नगरी में
    यंत्रों की निशी विचर रही हैं !
    अभिनन्दन के आडम्बर में
    पूजा - पल घटते जाते हैं।


    विद्युत् दीपों के प्रकाश में
    स्नेह दीप बुझते जाते हैं।

               - विपिन जोशी ( 30 सितम्बर 1922 - 18 अगस्त 1961 )
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    यह दीप अकेला स्नेह भरा ...

    यह दीप अकेला स्नेह भरा                                          
    है गर्व भरा मदमाता पर
    इसको भी पंक्ति को दे दो

    यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा
    पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लायेगा?
    यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा
    यह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित :

    यह दीप अकेला स्नेह भरा
    है गर्व भरा मदमाता पर
    इस को भी पंक्ति दे दो

    यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युगसंचय
    यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय
    यह अंकुर : फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय
    यह प्रकृत, स्वयम्भू, ब्रह्म, अयुतः
    इस को भी शक्ति को दे दो

    यह दीप अकेला स्नेह भरा
    है गर्व भरा मदमाता पर
    इस को भी पंक्ति दे दो

    यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,
    वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा,
    कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में
    यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,
    उल्लम्ब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा
    जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय
    इस को भक्ति को दे दो

    यह दीप अकेला स्नेह भरा
    है गर्व भरा मदमाता पर
    इस को भी पंक्ति दे दो 

     - अज्ञेय .
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    चरागाँ 


    एक - दो भी नहीं छब्बीस दिये
    एक - इक कर के जलाए मैंने।

    इक दिया नाम का आज़ादी के -
    उसने जलते हुए होठों से कहा
    चाहे जिस मुल्क से गेहूं मांगो
    हाथ फैलाने की आज़ादी है।

    इक दिया नाम का खुशहाली के -
    उसके जलते ही ये मालूम हुआ
    कितनी बदहाली है ...
    पेट खाली है मिरा
    जेब मेरी खाली है !

    इक दिया नाम का यकजहती के -
    रौशनी उस की जहाँ तक पहुंची
    कौम को लड़ते झगड़ते देखा ...
    माँ के आँचल में हैं जितने पैबंद
    सब को इक साथ उधड़ते देखा।

    दूर से बीवी ने झल्ला के कहा
    तेल महंगा भी है , मिलता भी नहीं
    क्यों दिए इतने जला रक्खे हैं
    अपने घर में न झरोखा , न मुंडेर
    ताक सपनों के सजा रक्खे हैं ...

    आया ग़ुस्से का इक ऐसा झोंका
    बुझ गए सारे दिये ...
    हां , मगर एक दिया , नाम है जिसका उम्मीद
    झिलमिलाता ही चला जाता है।

              - कैफ़ी आज़मी .
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    सरगम में लता जी के अनुपम स्वर में पंकज मलिक जी का यह यादगार गीत प्रस्तुत है, इस आशा के साथ कि उस अद्वितीय की लौ हमारे भीतर चिर प्रकाशमान रहे और पथ प्रदर्शित करे - 

    तेरे मन्दिर का हूँ दीपक ...

    शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

    खोना पाना - Life in a nutshell .


    पहले खोना खुद को ....और खो कर खोजना .... खोजने में खो जाना ....और तब जा कर पाना ....किसी और को ....और फिर रहना परेशान .... कि कहीं फिर न खो जाए ....
    ये बात है तो गड्डमड्ड ....कुछ हद तक ऊलजलूल भी ! पर इश्क की एक परिभाषा कुछ ऐसी भी हो सकती है. आप इस से असहमत होने के लिए आज़ाद हैं ....लेकिन मन में ही सही, स्वीकार तो करेंगे कि हाँ ये खोना - पाना, इस खोने- पाने की कहानी ...इतनी आसान नहीं है बयान करना ....और ये भी तो ज़रूरी नहीं कि तमाम दास्तानें जो हैं खोने पाने की - उनकी रूह में इश्क ही रवां होता हो. क्योंकि इस दुनिया में बहुत कुछ है खोने को और बहुत कुछ है पाने को. सवाल ये है कि आप क्या चाहते हैं ?

                                           - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .
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    तुम्हारे मेरे बीच ...  
                    
    तुम्हारे और मेरे बीच
    कविता ही तो होगी
    संवाहक - दूती - संवदिया .
    कविता ही तो बनेगी पुल
    जिसके नीचे बहते
    समय के सतत प्रवाह को लांघ
    रोज़ तुम तक आऊंगा .
    पाऊंगा तुम्हें ,
    फिर लौट आऊँगा
    अपने आप को खो कर .


                 - दिनेश द्विवेदी .
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    खोया क्या ... पाया क्या !!! 

    Old_diary : Old antique vintage paper backgroundखोने और पाने का 
    कोई तो नाता है .
    अकसर ऐसा हो जाता है
    जो भी शिद्दत से पाना चाहें ...
    खो जाता है !

    साथ साथ चलते हैं दोनों
    पूरी तरह न कभी कुछ खोया ;
    न ही कुछ पाया .

    पाते ही खो गया
    जो भी पल हाथ आया .

    लम्बे सफ़र में
    खोया क्या ,पाया क्या
    अब कहाँ इतना याद !

    बस ये समझ आया ,
    जो कुछ भी पाया
    उसे पहचाना ...
    मगर
    खो जाने के बाद .

                            - मीता .

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    उसे खोने में भी पाने का मज़ा आया है ...



    Day And Night  : Day and night tree (other landscapes are in my gallery) Stock Photo
    वो मेरा हो न सका पर मेरा हमसाया है,
    मैंने खोके भी हर इक राह उसे पाया है।

    उसकी आँखों में वफाओं का निशाँ तक भी नहीं,
    बेवफा है वो मगर मुझ पे वही छाया है।

    जो भी मिलता है मुझे वो ही बिछड़ जाता है,
    मुझपे किस्मत ने हमेशा ये सितम ढाया है।

    मुझको तन्हाई से बढ़कर कोई हमदम न मिला,
    इसने बस प्यार किया औरों ने ठुकराया है।

    दिले ग़मगीं में भी वो बनके खुशी रहता है,
    उसे खोने में भी पाने का मज़ा आया है।

                             -  इमरान .

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    खोया ... पाया .
    Sunbeams : beautiful red tulip in sunbeams against cloudy sky




    समय की कसौटी पर खुद को आजमाया 
    अब क्या हिसाब करूँ ये खोया वो पाया .

    उम्र के इस पड़ाव पर आज यही विचार आया
    'वही'संजोता सब कुछ जिसने ये जहाँ बनाया
    .............क्या हिसाब करूँ ये खोया वो पाया .



    हाँ कुछ पल कठिन थे ,कुछ देर से गुजरे
    निशानियाँ बची है जब 'उसने ' आजमाया
    .............क्या हिसाब
    करूँ ये खोया वो पाया .




    गर आँचल के कोर में बंधे खुशियों के पल
    वैसा ही लिया जीवन जैसा 'उसने' थमाया
    ...........क्या हिसाब करूँ ये खोया वो पाया .



    बहुत ही ईमानदारी से 'वो' करता है हिसाब
    जो दिया जिंदगीकोबिलकुल वही लौटाया
    .......अब क्या हिसाब करूँ ये खोया वो पाया .

     
                                                     -  रश्मि प्रिया .

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    उसको पाने के हालात नहीं बन पाए ...

    खुदको खोने के ज़ज़्बात नहीं बन पाए .               
    Loneliness : Lonely Man Sitting Next to a Lakeउसको पाने के हालात नहीं बन पाए .

    मैंने तकलीफ़ बड़ी देर तक रोके रक्खी 
    फिर भी रोने के हालात नहीं बन पाए .

    ख़ुश्क आँखों के अश्कों में असर क्यूँ होता  
    उसके दिल में वो बरसात नहीं बन पाए .

    लफ्ज़ मांदा थे, रस्ते में कहीं जा बैठे 
    उसको सुननी थी जो बात नहीं बन पाए .

    किसी ख़ामोश सफ़र पे मिरे एहसास रवां
    यूँ तो काफी थे, बारात नहीं बन पाए .

    मिलने आये हैं गिले बनके बीते लम्हे
    क्या कहूं, क्यूँ ये मुलाक़ात नहीं बन पाए .
                     
                     - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .
    ......

    मांदा - थके हुए
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    अल्लाह देखो मेहेरबां है .

    Thorns : Rose thorn मेहेरबां है मेहेरबां है                                       
    अल्लाह देखो मेहेरबां है
    यह धूप भी उजली सी  छांह है
    अल्लाह देखो...
    मेहेरबां है...

    रातें देखो ढल रही हैं
    उम्मीद की लौ जल रही हैं
    रोशन ही रोशन अब जहाँ है
    अल्लाह देखो मेहेरबां है...

    बोया है हमने फूल 
    तब ही पाई है खुशबू यहाँ .
    कांटे कांटे बस लहू है ...
    ज़ख़्मी खुदा की आरज़ू है
    अम्न का मौसम कहाँ है

    अल्लाह फिर भी मेहेरबां है...

    पर कटे हैं पंछियों के
    हौसले उड़ते कहाँ हैं !
    आज़ादियाँ हैं सब कफ़स में
    परिन्दे बेआस्मां हैं !

    अल्लाह फिर भी मेहेरबां है...


    हमने क्या खोया है देखो 
    हमने क्या पाया यहाँ ...
    उम्र दे दी ज़िन्दगी को 
    नूर ऐ खुदा पाया कहाँ ?

    काटे तोड़े फेंके मोड़े

    हमने कितने रिश्ते छोड़े

    जितने दिल बदले हैं हमने

    उतनी लाशें हैं यहाँ .

    मेहेरबां है मेहेरबां
    अल्लाह देखो मेहेरबां...

    धूप सर पर आ गिरी
    आसमाँ फट कर गिरा है
    पेड़ खुद गिरने लगे हैं
    नदियाँ बहती अब कहाँ हैं

    मेहेरबां है मेहेरबां
    अल्लाह फिर भी मेहेरबां है...

    यह आख़िरी हरकत न हो
    घर खुदा के बरकत न हो
    धरती कफ़न में ढक न जाए
    रिश्ते लहू के कट न जायें
    इंसान हैं हम किस तरह के
    अपने किये पर अब लजाएं

    आओ उगायें कोपलें कुछ
    नन्हे उजाले खिलखिलाएं
    गर्दने काटें नहीं अब
    गर्दनें उस दर झुकाएं
    रूठे खुदा को चल मनाएं
    दीवार सरहद की गिराएं
    मंदिरों में भी खुदा है
    मस्जिदों को चल बताएं

    खोते रहे हैं सदियों से हम
    आओ... अब हम कुछ तो पाएं...


    मेहेरबां है मेहेरबां है
    अल्लाह देखो मेहेरबां है .


                           - देव .

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    खोना .... पाना ....

    Sunbeams : Sky Sun Cloudsऔर क्या पा सकूँगा मैं , 
    तुझ से मुक्कदस ?

    वही दरोदीवार 
    रोगन से सजे हुए ,
    तराशे कांच के फानूस
    छत पर धजे हुए ,
    कीमती कालीन 
    पैरों पर बिछे हुए ,
    मखमली लिबास 
    जिस्मों पर खिंचे हुए .

    सोने की चमक ,
    चांदी की दमक ,
    सिक्कों की खनक ,
    वैभव की धनक ,
    अंधी इच्छा का शोर ...
    बस पा लेने का जोर .

    ना बुझने वाली प्यास ,
    एक अंतहीन तलाश .
    सांसों सासों पर झूलती 
    झूठी जन्नत की आस .

    तू नहीं है इन पैमानों में 
    तू है मन का विश्वास .
    जो रहता है यहीं कहीं 
    मेरे वजूद के पास .

    और क्या खो सकता हूँ मैं 
    तुझसे जरूरी ?

    तू तो है अक्षत प्रकाश 
    आबद्ध हवा सा एहसास 
    ना सन्नाटा तू , ना शोर कोई 
    ना बंधन तू ,ना डोर कोई 
    ना जबर है तू ,ना जोर कोई 
    ना ओर है तू ,ना छोर कोई .

    ना तू पीर कोई ना पैगम्बर 
    मंदिर मस्जिद ना तेरा घर 
    जहाँ झुके सजदे में सर 
    वहीं तू आता है नज़र .
    तू बच्चों की मुस्कान है 
    तू गीता तू ही कुरान है 
    तू व्रत है तू रमजान है 
    तू भजन तू ही अज़ान है .

    मैं जो भी हूँ बस तुझ से हूँ 
    तू ही मेरी पहचान है ,
    तू होने का है एहसास 
    जो है मेरे वजूद के पास .


               - स्कन्द .


    _________________________________________________________


    पगडण्डी .


      कुछ दरख्तों के मीठे साए थे ...
      जिन से हो कर के एक पगडण्डी
      थोड़ी पथरीली , टेढ़ी मेढ़ी सी
      मेरे घर की तरफ गुज़रती थी .

      रोज़ उस से मैं हो के घर जाता
      उन दरख्तों के साथ बतियाता ...
      जंगली फूलों को चुन लिया करता
      गाती बुलबुल को सुन लिया करता .

      फिर एक रोज़ उस पगडण्डी पे चलते चलते
      सोचा कुछ दूर तक टहल आऊँ ....
      काली , चमकीली एक सड़क देखी
      जो एक शहर की तरफ जाती थी .
      शहर .... जो दूर जगमगाता था .
      रौशनी .... जो मुझे बुलाती थी .

      फिर तो ये सिलसिला सा चल निकला
      मेरा उस सड़क पे अक्सर जाना
      और उस रौशनी से बतियाना .

      और एक रोज़ उस सड़क को हमक़दम करके
      मैं उस पगडण्डी को पीछे कहीं छोड़ आया ....
      जो मेरे घर की ओर जाती थी
      वही घर .... जिस की छत के साये में
      मुझे सुकून की एक गहरी नींद आती थी .

      अब मेरे चार सू उजाला है .
      रात भी दिन की तरह रौशन है .
      पर मुझे रोज़ रोज़ जाने क्यूँ
      वही पगडंडी याद आती है !

      और एक रोज़ फिर से लौटा मैं
      उसी पगडण्डी से उसी घर में
      टूटी फूटी सी चंद दीवारें
      अजनबी नज़रों से मिलीं मुझसे ...
      अब वहां कोई भी नहीं रहता .

      और अब कोई जगह ऎसी नहीं
      जहाँ जा कर सुकूं की नींद आये .
      रौशनी धूप बन के चुभती है .

      ढूंढता हूँ मैं अब न जाने क्यूँ
      उन दरख्तों का वो घना साया !
      सोचता हूँ मैं अब न जाने क्यूँ
      मैंने क्या खोया , मैंने क्या पाया .

                                          - मीता .
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      दर्दे-सुखन !!

      Old_diary : Open book over a light nature background Stock Photoनज़्मों की पुरानी कापी या                       
      कापी में पुरानी नज्में हैं
      मुश्किल है बताना फ़र्क बड़ा

      मैं जब भी हाथ लगाता हूँ
      कुछ पन्ने खुद खुल जाते हैं
      जिनके कोने हैं जर्द बड़े

      वो पन्ने जीभ चिढ़ाते हैं
      उन पन्नों में कबरें हैं
      कुछ हिम्मत भरे ख़यालों की

      कच्चे-पक्के अशआरों  में
      जो बातें उतरी थीं, अक्सर
      वो बातें उम्रदराज हुईं 

      लफ़्ज़ों में मंशा होती थी
      कुछ करने की, कर जाने की
      अब सुस्त क़दम ग़जलें बाकी

      इन ग़ज़लों में है रूह कहाँ
      फिर भी कुछ ना कुछ लिखता हूँ
      नाज़ायज सी बात है ये

      अब बहरें पहले से बेहतर
      कमज़ोर मगर मजमून बहुत 
      क्या खोकर मैंने क्या पाया?


                 -पुष्पेन्द्र वीर साहिल .
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      इस अंक में "जाने माने हस्ताक्षर" वर्ग (MASTERS CATEGORY)  में हम आपके लिए ले आकर आये हैं प्रख्यात कवि मदन कश्यप जी की ये बेहतरीन नज़्म 

      खोई हुई चीज़ों की नज़्म      





      शायद अब वह अंतड़ियों से भी ज्यादा लंबी हो गई हो 
      फिर भी मेरी स्मृति के छोटे से कोने में रहती है 
      खोयी हुई चीजों की एक गुड़मुड़ी फेहरिस्त 
      जैसे पाँच फुट आठ इंच लंबे शरीर में
      रह लेती हैं मीलों लंबी नसें

      वैसे खामख्वाह कुछ खोते रहने की आदत नहीं है 
      कोशिश करता हूँ कि रहूँ चाक-चैकस 
      केवल जरूरी चीजें ही ले जाता हूँ यात्रा में
      जाने से पहले अपने बक्स 
      तथा लौटने से पहले कमरे का अच्छी तरह मुआइना करता हूँ
      फिर भी कभी-कभी कोई गलती हो ही जाती है 

      पत्नी कहती है कि बेशऊर हूँ
      बटन लगाना तक भूल जाता हूँ
      कभी-कभी बस या ऑटो में चलते हुए 
      चला जाता हूँ एक-दो पड़ाव आगे 

      पैसों के खोने का हिसाब नहीं है
      उन्हें तो रहना नहीं होता 
      खोते नहीं तो खर्च हो जाते हैं

      मुझे लगता है भूलता बहुत हूँ इसीलिए खोता हूँ
      परंतु कुछ खोना ऐसा होता है जिसे भूल नहीं पाता 

      खोने का दुख अक्सर छोटा होता है 
      मगर कभी-कभी बहुत लंबा भी होता है 
      एक बार जब घर में केवल एक ही छाता था 
      मैंने खो दिया और खुद यात्रा पर चला गया 
      तब पत्नी को बेटे की दवा के लिए 
      बारिश में भींगते हुए डिस्पेंसरी जाना पड़ा 
      आप कहीं बारिश में घिर जाएँ और भींगते हुए 
      घर लौटें उसकी बात और है
      लेकिन आप उस वेदना की कल्पना नहीं कर सकते 
      जो छाते के अभाव में घर से भींगते हुए निकलने से होती है 
      मैं अपनी पत्नी की बारिश से ज्यादा अपमान में
      भींगते हुए चेहरे की कल्पना करके अब भी डर जाता हूँ

      कभी-कभी हम व्यर्थ की चीजों के लिए बेचैन होते हैं
      बचपन में स्कूल में याददाश्‍त बढ़ाने की दवा खरीदी थी 
      दो रूपए की पूरी दवा कहीं खो गई 
      मैं बहुत रोया-चिल्लाया 
      और अपने छोटे भाई की फजीहत भी की 
      तब मुझे लग रहा था कि मैं याददाश्‍त बढ़ाने की 
      एक महान अवसर से वंचित हो गया 
      अब उसे याद करके शर्म आती है और भाई के प्रति 
      जो अब इस दुनिया में नहीं है
      अपने व्यवहार के लिए दुख होता है 

      कुछ खोना सुई की चुभन जैसा होता है 
      जिसमें दर्द बहुत तेज उठता है पर जल्दी मिट जाता है 
      जैसे चाबी का गुच्छा खो जाना 
      कलम खो जाना 
      चश्‍मा खो जाना 
      डॉक्टरी पर्ची खो जाना 
      किशोरी अमोनकर का कैसेट खो जाना 
      वैकल्पिक व्यवस्था के साथ ही 
      खत्म हो जाता है खोने का गम

      परंतु, कुछ ऐसा खोना भी होता है 
      जो नासूर की तरह टपकता रहता है 
      और बिलआखिर छोड़ जाता है एक गहरा निशान 

      मैंने कई बार ऐसी चीजें खोयी हैं 
      जो फिर मुझे कभी नहीं मिलीं

      किताबों का खोना बिल्कुल अलग तरह का मामला है 
      अक्सर किताबें खोती नहीं टपा दी जाती हैं
      कई बार हम टपानेवाले को जानते होते हैं 
      पर कुछ कर नहीं पाते 

      मैंने चीजें खोयी हैं 
      बहुत-बहुत चीजें खोयी हैं
      मगर चीजों से ज्यादा अवसर खोया है 
      यह चीजों के खोने की कविता है 
      अतः अवसरों के खोने का ब्यौरा नहीं दूँगा 
      पर कई बार अवसर भी चीजों की तरह होता है 
      अथवा चीजें अवसर की तरह होती हैं 

      पता नहीं तब मैंने चीज खोयी थी या अवसर खोया था 
      पर एक खोना ऐसा भी है 
      जिसे मैं अब भी अतीत में लौटकर 
      पा लेने के लिए बेचैन हो जाता हूँ

      वे लोग कुछ नहीं खोते जो समय को अंगुलियों पर नचाते हैं 
      खोना मुझ जैसों के हिस्से होता है जिन्हें समय नचाता है 

      अब खोने की कविता इतनी भी लंबी नहीं होनी चाहिए 
      कि पाठकों को अपना धैर्य खोना पड़े
      सो समाप्त करता हूँ
      वैसे भी खोने की चर्चा क्या करना एक ऐसे समाज में
      जिसने अपना गौरव खो दिया हो!


                        - श्री मदन कश्यप 

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      आज के विषय से सम्बंधित श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी की ये भावपूर्ण कविता , जगजीत जी के स्वरों में आप के लिए प्रस्तुत है .


      क्या खोया क्या पाया जग में ...



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