सोमवार, 14 नवंबर 2011

उस पार - Across the Bridge .

                               
                          क्या है "उस पार" ?
किसी के लिए "उस पार" वो है जो हम देख चुके.... हमारा बीता हुआ कल .... हैं कुछ स्मृतियाँ - खट्टी- मीठी ... कुछ सपने - पूरे-अधूरे ... कुछ जो पीछे छूट गया... कुछ जो हाथ नहीं आया... कोई कसक उस मुलाक़ात की - जो हुई या जो हो न सकी....

और किसी के लिए है "उस पार" वो जो हम देखेंगे.... हमारा आने वाला कल.... वो आशाएं, जिनका सच होना बाकी है... वो मंजिलें, जिन्हें पाना है.... वो रिश्ते जो बनेंगें.... वो गीत, जो लिखे जाने बाकी हैं.. वो सब कुछ जो बनेगा हिस्सा हमारे भविष्य का...
और इस समय हम खड़े हैं 'इस पार' .... तलाश में हैं उस पुल की - 'The Bridge Across' - जो ले कर जाएगा " उस पार " ...

कहिये, आप देंगें साथ हमारा इस सफ़र में?                
                              
                                         -  पुष्पेन्द्र वीर साहिल .___________________________________

खिडकियों के उस पार 
_________________________________
कांच की खिडकियों के पार                                
दुकानों , मकानों , घास और बगीचों पर 
एक ही रफ़्तार में मुसलसल 
गिर रही है बारिश 
दो दिनों से बेहिसाब ...

हवा न जाने किस तर्ज पर काट रही है 
चक्कर गोल - गोल 
भेदती हुई दुछत्ती के परदे 
खडखड़ाती गैरेज की छत ...

कुछ कुछ देर में 
खिड़की से झांकते 
हम 
खबर ले लेते हैं 
इन उन्मादी झोंकों में 
जूझते या शायद झूमते 
अमलतास , सहजन और चौड़े पत्ते वाले 
ऊंचे झारखंडी पेड़ों की ...

यकीनन जिन की पत्तियों पे होंगे 
बौछारों की चोटों के अदृश्य निशान .

सवेरे काम वाली बाई 
परेशान-हैरान ले गई दोपहर की छुट्टी .
उस के घर की ज़मीन उगल रही है पानी 
और खपरैल रिस रहा है चूल्हे पर ...

बारिश गिर रही है दो दिनों से 
दुकानों, मकानों, घास और बगीचों पर 
एक ही रफ़्तार में मुसलसल 
कांच की खिडकियों के 
उस पार .


                    पारुल पुखराज .

___________________________________________________


  उस पार ऐसा हो . . .
_______________________________




कभी खुद को मैं ढूंढूं इस तरफ इक बार, ऐसा हो
निगाहे-रूह तुझ पर हो टिकी उस पार, ऐसा हो

मैं राहे-जिन्दगी में जिनको पीछे छोड़ आया था 
वो यादें सब की सब आयें कभी उस पार, ऐसा हो

वो कुछ अशआर रिस कर गिर गए लब से कहीं मेरे 
तेरे लब पे दिखाई दें मुझे उस पार, ऐसा हो

बहुत दिन से तुझे मैं दूर से ही चाहता हूँ, अब 
लगूं खुल के गले तुझसे सरे-बाज़ार, ऐसा हो

किनारे पर खड़े हो कर तमाशा देखने वाला 
कभी आके यहाँ हमसे मिले मंझधार, ऐसा हो

मेरे नगमे रहें ज़िंदा, भले ही नाम मिट जाये
फ़क़त मशहूर हो मुझमें छिपा फनकार, ऐसा हो .

                                                 पुष्पेन्द्र वीर साहिल .


_____________________________________________________________


इजाजी 


For an irreplaceable part of me 
 who crossed over उस पार on 17/08/2010



इजाजी , तुमने कहा था ना
जब सीखे मैंने पंख फ़ैलाने
कि  रविवार के अवकाश में
चाहे पड़े कुछ क्षण निकालने

       लिख देना एक पाती तुम
        प्यार भरे दो अक्षर की
       मै करुँगी प्रतीक्षा आतुरता से
       बिटिया की कुशलता की

हुआ विवाह बदला संसार
और हुआ परिवर्तित दूर संचार
तुमने किया आग्रह एक बार
मोबाइल  कॉल करना हर शुक्रवार

    फिर एक दिन मिला आमंत्रण तुम्हे
   बनने को इश्वर का पाहुना
   पर इतनी जल्दी क्यों थी तुम्हे
   की  भूल गयीं तुम मुझे बताना

किस पत्र तो पढ़ पाओगी तुम
वोह कौनसा तार  है तुमसे जुडा
जिससे अब पहुँच  सकूँ तुम तक
जब मन हो उदास मेरा

 हर बार किया मैंने पूरा  वादा
पर अब तुम खोजो राह नयी
और कुशल भेजो उस पार से तुम
-  मेरी बेटी, मै  हूँ  राजी ख़ुशी


  साधना.

---------------------------------------------------------------
                                 उस पार ...
                                _________
                                          


उस पार प्रिये मधु है न तुम हो,
उस पार अकेले जाना है,
श्वासों की गति से मुक्त हो,
नये आयाम को पाना है.

उस पार न मृत्यु का भय है,
उस पार न जन्मों का बंधन,
उस पार पहुँचता वही मुमुक्षु
अर्पित कर दे जो तन मन धन.

पलटें अतीत के पन्नो को,
उस पार दधिची सिर्फ एक,
कवच और कुंडल दे जो,
दानी ऐसा भी कर्ण एक.

जो प्राप्त हुआ उस सदगति को,
वो ही महात्म बन पाया है.
बिना समर्पण भाव लिए,
उस पार की इच्छा रखने वाला,
केवल त्रिशंकु कहलाया है.

उस पार न कल कल सरिता है,
उस पार न कलरव करते खग,
उस पार न सूरज है न शशि है,
उस पार न गति का कोई भय.

इस पार का संचालन करता,
इस पार को गति जो देता है,
इस पार की सीमा रेखा का,
निर्धारण जो करता है,
वो शक्तिपुंज वो बिंदु मात्र,
इस पार नहीं उस पार कही....

                         प्रीति . 
_________________________________________

                               
                                अब की बार .
                             ____________


अब की बार चलो, आर - या - पार 
अब चाहे जीत हो, अब चाहे हार 
चाहे तैरनी पड़े उलटी, वक्त की धार 
अगर साथ तुम दो मेरा, हूँ मैं भी तैयार 
अब की बार चलो, आर - या - पार 

तुम भर लो अपनी आँखों में, सपने कई हज़ार 
उड़ने को तो चाहिए हमे पंख बस चार 
फिर हमको क्या रोकेंगे तीर हो या तलवार 
उलट के रख देंगे हम तुम कोई भी हो अब वार 
एक हाथ बंधा एक कॉल उठा चल मेरे दिलदार 
अब तोड़ के रख देंगे हम जो बाँटें कोई दीवार 
अगर साथ तुम दो मेरा, हूँ मैं भी तैयार 
चल पड़ेंगे संग दोनों , मीलों कई हजार .

अब की बार चलो, आर - या - पार 
अब चाहे जीत हो, अब चाहे हार 
चाहे तैरनी पड़े उलटी, वक्त की धार 
अगर साथ तुम दो मेरा, हूँ मैं भी तैयार 
अब की बार चलो, आर - या - पार .

                                      स्कन्द .

_________________________________________

उस पार .
____________


हर खुशी का फूल अपने बाग में खिलता रहे।
जल रहा 'उस पार' कोई शौक से जलता रहे.

इश्क का पौधा मिरे 'उस पार' भी फलता रहे,
उम्र भर यूँ ही वफाओं का सिला मिलता रहे।

आपका 'उस पार' जाना भी हमें मन्ज़ूर है,
आमदों का ख़्वाब में' पर सिलसिला चलता रहे।

आपके पहलू में' है 'उस पार' मेरी जिन्दगी,
आपकी यादों से' मेरा हर अलम ढलता रहे।

चाहता हूँ आपको 'उस पार' आकर देखना,
कब तलक तड़पे जिगर दिल कब तलक जलता रहे।

मंज़िलें भी खुद ब खुद 'उस पार' से आ जाएँगी,
रूह में बस हौसलों का ज़लज़ला पलता रहे।

दूर जाना हैं हमें ऊँचे पहाड़ों से गुज़र,
कब तलक 'उस पार' जाने का अहद टलता रहे।

छोड़ भी दो सोचना 'इमरान' चलते हैं चलो,
लाख रुख़्ना अब हमारी राह में डलता रहे।

अलमः दुख
अहदः फैसला
रुख़्नाः रुकावट

                                                   इमरान .

____________________________________

 The Bridge to Forever .



Evening’s tresses sprawl across the sky
And the dark dusky temptress tiptoes in
As a tide in the sea of our senses
A raindrop of synchronised thoughts
Moistens the dried up memories
The long lost fragrance of your body
Wafts up to our heightened desires
As oceans across we lie supine
On beds on simmering dreams
Which smoulder into a raging fire
And words in colours fly across seas
Sparkling with golden shared moments
Blue with the bruises of broken desire
Sometimes red with a passionate swirl
Taking the silver from promises baked dry
In the cold and lonely moonlight
At times a hint of green envy
As others claim your existence
And create this scintillating display
Of a bridge of dazzling fireworks
Across to the land of forever

Shall we join our hands?
And walk across this fire
No fear of the beyond
Let it be gaping emptiness
The absolute black end
Or a birth again together
To live with one another
Across this bridge to forever

Sadhana .


                 ________________________________________


गुलाबी फूल .
______________




अस्तित्व की इस यात्रा में
ना जाने कितने बार रुके
और चले कदम .
कभी रास्ते आसान बनाते
छोटे छोटे पुल
तो कभी तेज जल धारा
और रास्तों में शूल .

पैर उखड़े ,गिरे
फिर सम्हले
सपने आँखों में उगते रहे
बुझते रहे
जिन्दगी के अर्थ समझते रहे .
अपने बनाये मिथकों को
तोड़ते रहे
गढ़ते रहे .

पर
जीवन की किताब में रखा
वो प्यार का गुलाबी फूल
ना कुम्हलाता है
ना मुरझाता है
ईश्वर के अनमोल उपहार की तरह
सब के ह्रदय घर बनाता है .
'उस पार' की यात्रा में
नए पुल बनाता है .

वही है
अपनी चमक से
अँधेरे में राह दिखाता है
परिस्थितिओं को ;बस' कर
जीना सिखाता है ..

                         रश्मि प्रिया .

__________________________________



कुछ तो होगा .
_________________


अकसर मैं सोचती हूँ 
इन पर्वतों के आगे ,
उन बादलों से ऊपर ,
उस आसमां की हद तक 
जो दिख रहा है मुझ को 
उस से भी कहीं आगे ,
कोहरे की चादरों के उस पार ;
कुछ तो होगा !!

आती कहाँ से है ये 
दो पल की ज़िंदगानी ? 
जाता कहाँ को है ये 
बहती नदी का पानी ?
धुंधला बना हुआ है 
इक नक्श सा अधूरा ,
ज़ेहन की सरहदों के उस पार ;
कुछ तो होगा !!

मुट्ठी को कितना बांधो 
कब धूप रुक सकी है ?
खोली है जब हथेली 
खाली ही तो मिली है .
कुछ हो , जो आ के ठहरे ,
बदले न रंग ओ चेहरे ,
बदलते मौसमों के उस पार ;
कुछ तो होगा !!

ये भीड़ का समंदर 
और रूह की तनहाई ,
ये ख्वाब , ये उम्मीदें 
और दर्द की परछाईं ,
ये शोर ओ गुल का आलम ,
और रात दिन की भटकन ,
इन सारे सिलसिलों के उस पार ;
कुछ तो होगा !!

                         मीता .

______________________________________


      

8 टिप्‍पणियां:

reena ने कहा…

sari rachnayen behad khubsurat,aap sabhi ko badhai
reena pant

leena alag ने कहा…

most commendable!!!...again a bridge n two shores seen n so convincingly expressed as per each ones understanding..."uss paar"...whether seen from sumthin as small as a window by parul ji...or the incomplete lover who's other half is sumwhr across by pushpendra ji...sadhna ji's most heart rendering void left by a mom...or her playin on the colours symbolising different moods n feelings...skand ji's n imran ji's idea of crossing the bridges spelling rising above all obstacles to eventually culminate in a state of perfect bliss whr nothin but love exists...n preeti ji,rashmi ji n meeta expressing their idea of the hereafter of the unknown which they hope is paradise in the true sense of the word...where we will eventually get the answers to all r queries n where nothin can eva go wrong again..."hamara azmay safar(safar ka iraada) kab kidhar ka ho jaaye...yeh woh nahin jo kissi rehguzar ka ho jaaye...ussi ko jeenay ka haq hai iss zamaanay mein...jo idhar ka lagtaa rahe aur udhar ka ho jaaye"...lookin fwd to ur next edition....:)

sangeeta ने कहा…

बहुत खूब. हर रचना उम्दा है और उसे बार बार पढने को जी चाहता है. सबसे अच्छी बात है की हर किसी की शैली जुदा है. साधना जी की दोनो रचनाएँ मर्मस्पर्शी हैं.
पर इतनी जल्दी क्यों थी तुम्हे की भूल गयीं तुम मुझे बताना
भावविहल कर गयीं
स्कन्दजी की ये पंक्तियाँ दिल को छू गयीं -
तुम भर लो अपनी आँखों में, सपने कई हज़ार
उड़ने को तो चाहिए हमे पंख बस चार
मीता जी की
आती कहाँ से है ये
दो पल की ज़िंदगानी ?
सोचने पर मजबूर करती हैं
मुझे आपका ये ब्लॉग बहुत ही पसंद है और में अब बेताबी से अगले अंक का इंतजार करती हूँ.

reena ने कहा…

सोचा है कई बार
कुछ तो अनगढ़ -अद्बुत
होगा उस पार ........
माँ ने बताया था
कि उस पार........
है स्वर्ग या नरक का द्वार
बना कर्मो को आधार
नियम है ईश्वर के अपरम्पार
कि करम जो करे सुंदर
मिलेगा उसे स्वर्ग का द्वार
और जो करम करे बेकार
सीधा जाये नरक के पार
अभी तक भ्रान्ति यही मन में
कि सच में होगा क्या उस पार?
अगर कर्म है आधार
तो कैसे तय करता होगा पालनहार
कि किसके गले पड़ेगा हार
और किसे मिलेगा नरक का द्वार..............

meeta ने कहा…

Leena that's a very apt quote -
"hamara azmay safar(safar ka iraada) kab kidhar ka ho jaaye...yeh woh nahin jo kissi rehguzar ka ho jaaye...ussi ko jeenay ka haq hai iss zamaanay mein...jo idhar ka lagtaa rahe aur udhar ka ho jaaye".
Thanks!!Lovely,thoughtful and amazing comment.

meeta ने कहा…

संगीता जी,इतनी प्यारी टिप्पिणी से चिरंतन का हौसला बढ़ाने के लिए हम आप के बहुत आभारी हैं.आप ऐसे ही प्यारे कमेंट्स दीजिये,हम लगातार लिखते रहेंगे.बहुत धन्यवाद !!

meeta ने कहा…

Reena ji,these lines have added manifold to the beauty of Chirantan.We are so thankful to you for this lovely and creative comment.it carries the gist of our this week's issue. Thank you so much.

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

रीना जी, संगीता जी एवं लीना जी..
आप सब का सराहने के लिए आभार. आपकी प्रतिक्रियाएं हमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं.
लीना जी ने जो शेर लिखा, बहुत माकूल है. रीना जी की कविता बहुत सुन्दर और अर्थपूर्ण लगी.
धन्यवाद

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...