सोमवार, 21 नवंबर 2011

क़दमों की आहट ... Echoing Footsteps...




बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ए ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं।

तबियत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों के चादर तान लेते हैं

'फ़िराक' अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफ़िर
कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं

वैसे तो फ़िराक़ गोरखपुरी की इस नज़्म के बाद लगता है कि "क़दमों की आहट" पे कुछ लिखा जाना बाकी नहीं है... क़दमों की आहटें जितने भी अल्फाजों में ढलने थीं, ढल चुकीं हैं... उन क़दमों की आहट के इंतज़ार में जितनी भी शमाएँ जलनी थीं, जल चुकी हैं... 

फिर भी जरूरी है कि लिखा जाये क्योंकि रुकी नहीं है अब तक - "क़दमों की आहट" ....... गूँजतीं हैं आहटें बदस्तूर अभी भी जेहन के गलियारों में ....... आते हुए क़दमों की, जाते हुए क़दमों की.... 

इन्हीं आहटों के सिलसिले को बढाती कुछ और रचनाएँ इस बार "चिरंतन" पर आपकी पेशे-खिदमत हैं..... बताइयेगा अगर ये आहटें पहुंचें आप तक !


         
                    पुष्पेन्द्र वीर साहिल .



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क़दमों की आहट .





वो गहरा सन्नाटा, फैली ख़ामोशी
दूर कहीं... घुटे हुए शब्द
अवरुद्ध कंठ से हिचकोले खाते..
बाहर निकलने की जी तोड़ कोशिश मे
दबे दबे से..जब होंठों ने बुदबुदाये ,
उन्हें स्वर नहीं मिल पाए .


अनकहे को समझ पाता कौन?
उस मौन को पढ़ पाता कौन?
बहुत कुछ सिमटा था अक्षरों के अंतराल मे ,
बहुत कुछ फैला था शब्दों के जाल मे ,
दौड़ते भागते शब्द रास्ता नहीं ढूंढ पाए ;
डूबते उतरते रहे मन की नदी मे
अर्थ नहीं पा पाए .


अनकही उन बातो से
मन बोझिल हुआ जाता है ,
सुनसान रास्तो मे
कहाँ कोई आता है .


कही से भटकती
एक आवाज़ वहां पहुची ,
कोशिश की सुनने की
सब कुछ समझने की .
समझा तो जाना
मन को हिलाती सी ,
धीरे धीरे लडखडाती सी ,
कही दूर से आती सी ,
अनसुना गीत गुनगुनाती सी ,
ना वो अकुलाहट थी ना चाहत थी ...


वो थी तो सिर्फ और सिर्फ
मन के कदमो की आहट थी.


                                    प्रीति .


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बस क़दमों की आहट आये ...




बस 'क़दमों की आहट' आये' आने का' इमकान कहाँ,

ऐसे झूटे' ख्वाबों के सच होने का' इमकान कहाँ।


उम्मीदों के' बागीचे का' पत्ता पत्ता बिखर गया,
इस गुलशन में' फूलों के' फिर खिलने का' इमकान कहाँ।


दाना खाने' के चक्कर में' पंछी जो' उस पार गये,
खा पीकर भी वापिस उनके' आने का' इमकान कहाँ।


हाँ दौलत के' ढेर नहीं ये' माना माँ के आँचल में,
पर' दो वक्ता रोज़ी के ना' मिलने का' इमकान कहाँ।


डगमग होके' गोते खाए रूहें बाबा अम्मा की,
टूटी नय्या' पर साहिल पे' लगने का' इमकान कहाँ।


अब छोड़ो वो' देस के' वक्ते आखिर है' तुम आ जाओ।
कूच को हम तैय्यार के ज़्यादा रुकने का' इमकान कहाँ।


देख ज़ईफों' की हालत 'इमरान' समा पुरगौहर है,
नई मगर ये' पीढ़ी है नम होने का इमकान कहाँ।


                                       इमरान .


इमकान : संभावना
रोज़ी: भोजन
ज़ईफः बूढ़े
समाः आसमान
पुरगौहरः आँसू से भरा




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It's you !!





When all the world is sleeping ...
in the resonating silence ,
whose footsteps do I hear ,
reverberating 
night after night !


Is that you , my dream ?
Whom I left crumpled by my pillow
when I opened my eyes ...
and just forgot you existed !!


Or is that you , my hope ?
Still young and fresh ,
still brimming with life ,
still unaware 
that you too shall meet the same fate .


Is that you , my love ?
All I remember is
you left as silently as you came ...
on transparent wings .


Oh yes ,
I know you so well !!
You faceless , shapeless shadow 
of an unchanging , ever loyal friend .


My loneliness ,
it's your footsteps that echo
in the silent hallways of my memory ;
and knock at the rusty gates of my heart .


                                Meeta .


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मुझे जीना सिखाया .

ऐ ज़िन्दगी ,
कभी नाराज़ हो कर
शरारतन
चेहरा तकिये में छुपाया ;
पर तेरे क़दमों की आहट ने
मुझे जीना सिखाया .


तुमसे बिना बात के झगड़ों से
हर बार जी कसमसाया ;
सच कहूँ तेरे क़दमों की आहट ने
मुझे जीना सिखाया .


ये भी सोचा अनसुना कर दूँ
कई बार चाहा
कई बार मुंह बनाया ;
सच कहूँ तेरे क़दमों की आहट ने
मुझे जीना सिखाया .


                          रश्मि प्रिया .


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उन क़दमों की आयी आहट !






खुली खिड़कियाँ
तेज हवाएं
बेकल बारिश
भीतर लायें
बूँद बूँद
पानी छितरायें
किसकी यादें
छन कर आयें ?


भीगा तकिया
सीली चादर
उल्टी सलवट
करवट लेकर
मुझसे पूछे
कुछ शरमा कर
किसके नाम पे
अँखियाँ कातर ?

खामोशी में
कैसी ठक-ठक
दिल में ना रुक
जाए धक-धक
मन के नैना
हारे तक-तक
रस्ता देखें
आखिर कब तक ?

रीता जाए
मन-धीरज घट
उलझी जाए
उंगली से लट
कुमकुम-कंगन
पहनूं झटपट
उन क़दमों की
आयी आहट !

              पुष्पेन्द्र वीर साहिल .

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तब तो  क़दमों की आहट होगी ; 
तब तो कोई आएगा ...


उम्मीद अभी भी बैठी है दहलीज़ पर 
कि कोई लौट आयेगा ,
पहले होगी क़दमों की आहट ,
फिर दरवाजा खट- खटायेगा .
कैसे उसे ये कोई अब समझाएगा 
जो बीत गया है वो 
लौट के अब न आयेगा .

उम्मीद कई दलीलें देगी ,
जिरह करेगी जज्बातों से ;
अब उस से भला कोई 
कैसे जीत पायेगा ...
क्या उसको बतलायेगा 
कैसे उसको समझाएगा 
न क़दमों की आहट होगी 
न ही कोई आएगा 

कतरा कतरा रिस रहा है 
उम्मीद का गहरी रातों में ,
कमली सी वो  हो गयी है 
उलझी उलझी जज्बातों में ,
कहती है 
जब टूटेंगी सांसें 
और 
अर्थी कोई उठाएगा 
तब तो 
क़दमों की आहट होगी 
तब तो कोई आएगा .

                 स्कन्द .

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                    The Language of Footsteps .




Do you know how we share
This language as a pair
The language of footsteps
That we two did create 
It’s the language of love
Which no one can translate

Its soundless words dripping
With passion unique
And rich nuances of silence
Which only we can speak .
Soundless, wordless
And formless too ,
No grammar, no punctuation
Just seamless communication
Born of the sounds
Which can’t be pronounced
Just heard in silence
Your arrival they announce .

Emotions a lonely trough
Or a buoyant crest
I can tell by the sound
Of your familiar tread .
For the sound of footsteps
With bated breath we wait ,
 To echo across the worlds
Where we live separate

I can sense your longing
By the impassioned pace ,
laced with desire
Your footsteps make
And you can feel
The depth of my love
By the silence in between
As I walk on tip toe .

At times it becomes
A laborious long wait ,
When the sound of your footsteps
Don’t echo at the gate .
And when the bells of anklets
Create this alluring tune
You know that my footsteps
Beseech you to return .

We live  this enchanting music
That our footsteps together create ,
This symphony of love
In which our hearts vibrate .


For there is no one else
Who can so well communicate ,
In this language of footsteps
That we two did create .

Sadhana .

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वो तेरे क़दमों की आहट .




बड़ी मुश्किल से 
मैंने फिर से इक दुनिया बसाई है .
यहाँ पर मैं 
मेरी तनहाइयों के साथ रहती हूँ .
खुद को मसरूफ रखती हूँ .
मैं तुझ को सोचती भी अब नहीं हूँ .

तेरी हर याद को मैं दूर ले जा कर 
बयाबां में 
कहीं पर छोड़ आई हूँ .
तेरे हर अक्स को 
धो पोंछ कर 
दिल से मिटा डाला ...

हरेक दरवाज़ा खोला 
कि हवा और धूप आये 
और मिट जाए तेरी खुशबू .
चला जाए तू इतनी दूर 
कि फिर लौट ना पाए ....
ना आँखों में , ना यादों में ,
ना मेरे दिल की दुनिया में .

मगर 
अब भी ना जाने क्यों ,
वो तेरे क़दमों की आहट
मेरे ख्वाबों में आती है .
मुझे सोने नहीं देती .

                    
                            मीता .

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12 टिप्‍पणियां:

leena alag ने कहा…

the vastness n depth of this topic is so immense that no one can come thru widout drowning in its feel...loved pushpendra ji's introduction..."kadmon ki aahat"...could b the sound of hope too but sumhow it can only be felt as reminiscence of the love lost...or happy moments which r now just memories...preeti ji ur pain of unproclaimed love is sooo intense n so very touching...imran ji u have created history...i mean to think from ageing parents point of view who have no othr hope except ears straining to hear the footsteps of their child...meeta ur rendition of solitude in two diffrent languages wid the same intensity has won my heart completely:)...pushpendra ji hats off to ur potrayal of mixed feelings of luv,anxiety,apprehension n the desire 4 acceptance...skand ji's picturisation of eternal wait for ur love till ur dying day n even thereafter...n sadhna ji kudos to ur sound of silence...cant say its the topic or the par excellence of ur guys writing but it has left me elated n extremely pensive at the same time..."har aahat hai uskay kadmon ki...ki dil yun hi dhokaa khaata hai....jab bhi darwaazaa khulta hai...koi aur nazar aata hai...."...:)

meeta ने कहा…

Leena , what I love in this issue is the variety of emotions on the same topic . They range from intense sadness to deliciously romantic . Everyone has a different angle for 'Qadmon ki aahat'. It was a creative and fulfilling experience to write on this topic ...given by Sadhana di . In fact , she is the one who decides the topic every week .
Thank you for reading us so , so beautifully and giving us your amazing comment . Once Chirantan is posted , I start waiting for your comment :)

reena ने कहा…

aap logon key prayas sarthak hai wakai .ab to har mangalwar ka intezar rahta hai.....

leena alag ने कहा…

my due apologies for having skipped mentioning rashmi ji's poetry...trust me it was truly unintentional...rashmi ji, i was saving the best for the last n i just dont kno how i made the blunder of missing out on telling u that out of all the notes urs was actually the most positive one n within the constraits of the topic n the introduction given by pushpendra ji... the words,"bahut pehlay se unn kadmon ki aahat jaan laytay hain...tujhay ai zindagi hum door se pehchaan laytay hain" r truly befitting ur beautiful poetry...please do forgive me for my negligence!

Na ने कहा…

Leena, its such a pleasure to be read by someone who appreciates the nuances of each poem so very delicately.Your appreciation and words do mean a great deal to us. i am grateful

Na ने कहा…

Reena, its a pleasuure to write each week, knowing that you all are there to encourage us each tuesday..please be with us always

leena alag ने कहा…

@meeta...very true meeta...it is indeed an art to come up wid topics tht appeal n bring out the best in all...my compliments to sadhna ji for this...:) @sadhna ji...its actually us who should be grateful to sensitive writers like u...its a pleasure n honour to be in touch wid a group like this...:)

बेनामी ने कहा…

beautiful words sadhana!!! all i have to say is...mein unke kadamon ki aahat ko pehchaan leti hoon, bhaari kadamon ki niraasha ko jaan leti hoon, jab kabhi chalen woh ithlaakar unki roomaniyat ka mein anumaan leti hoon!!!

अनुपमा पाठक ने कहा…

nice collection!

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

Leena ji, Reena ji evam Anupama ji - aap sabhi ka sarahne aur critical appraisal ke liye shukriya.. aasha hai aap log aage bhi padhte rahenge.

meeta ने कहा…

@Reena di - हम हर मंगलवार को उपस्थित हो जायेंगे , बशर्ते आप पढ़ते रहें . Many thanks :)
@Leena - It's truly our pleasure reading your comments and knowing that there is someone who is reading each and every poem so thoroughly . It motivates us to do better next time :-)
@ Dear Benaami - Very lovely expression .
@Anupama - Nice meeting you Anupama , a hearty welcome to you in Chirantan .

leena alag ने कहा…

@pushendra ji...thank u so much for the acknowledgement...humein bhi ummeed hai ki "Chirantan" aur hamara saath door tak raheyga...:)
@meeta...<3 u!...:)

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