मंगलवार, 17 जनवरी 2012

आवाजें - unsaid voices ...

आवाजें कितने चेहरे बदल कर दस्तक देती हैं हमारे कानों में - कभी शोर की आवाज़ सुनते हैं ... तो कभी हम रूबरू  होते हैं सन्नाटों की आवाज़ से. जी हाँ, सन्नाटों की भी एक आवाज़ होती है ...
          और जब एक ख़याल सर उठाता है, एक एहसास करवट बदलता है, एक ख़लिश परेशान करती है, एक कशिश चुभती है कहीं भीतर... तब मन आवाज़ दे उठता है लफ़्ज़ों को ...
          ऐसे ही कुछ लफ्ज़ ... या लफ़्ज़ों की शक्ल में हमारे मन की आवाजें हैं  इस बार के चिरंतन के अंक में. आप तक पहुंचें ये आवाजें तो बताइयेगा ज़रूर...
                
             - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .
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आवाज़ की आस .



लफ्ज़ बेलिबास हैं
इन्हें... एक अदद आवाज़ की ही आस है...


बहुत दिनों से
तुम्हारी आवाज़ का झरना
आँखों के कोहसार से कूदा नहीं है कानों में
तुम्हारी साँसों की छुईमुई से
गुदगुदाए नहीं हैं जिस्म के रेशे


बहुत दिनों से
तुम्हारी आवाज़ को पहना नहीं है लफ़्ज़ों ने




लफ्ज़ बेलिबास हैं
इन्हें... एक अदद आवाज़ की ही आस है...

वो दो मिसरों को तराश कर
जो बनाए थे झुमके
वो कहाँ पहने तुमने
ग़ज़लों का मांग टीका 
रंग सिन्दूरी कभी रच न सका

बहुत दिनों से
यह अधूरे पैराहन  संभाले बैठ हूँ
तुम एक बार जो आवाज़ देकर बुलाओ मुझे
ये चुप्पी का बाँध तोड़ो 
मुझसे रूठो... मनाओ मुझे

जो एक बार सिर्फ तेरी आवाज़ मिले
तो यतीम लफ़्ज़ों को जीने की आस मिले

जो लफ्ज़ बेलिबास हैं
उन्हें लिबास मिले...


                     - देव . 


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अभी तक चल रही हूँ मैं .


बड़ी मुद्दत से हर सू इक ,
उदासी ही का आलम है ,
कोई ख़ामोशी सी पसरी हुई है 
यूँ फ़ज़ाओं में . 

जहां इन बंद दरवाज़ों से 
अपने सर को टकराकर ,
मेरी आवाज़ ही फिर लौट कर 
कानों में आती है .

पलट कर देखती हूँ 
दूर तक कोई नहीं दिखता ,
मैं सुनती हूँ मेरे खुद के ही 
क़दमों की हरेक आहट .

मगर उम्मीद कहती है ,
कहीं पर है वो दरवाज़ा 
मेरी आवाज़ को जो 
दर बदर होने नहीं देगा .

कोई खिड़की कहीं पर है ,
जहाँ से देख कर मुझ को 
बस इक आवाज़ दोगे 
और मुझ को रोक लोगे तुम .

इसी उम्मीद पर शायद 
थके क़दमों को लेकर भी ,
अभी तक चल रही हूँ मैं 
शहर की सूनी राहों में .

                 - मीता .
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अब बस ...                                           




देश से भ्रष्टाचार हटाना है ... आवाज़ उठाओ .
कश्मीर से फ़ौज को हटाना है ... आवाज़ उठाओ .
केरल में बांध टूट जायेगा ... आवाज़ उठाओ .
अफज़ल जेल से छूट जायेगा ... आवाज़ उठाओ .
कसाब बिरयानी खाता है आवाज़ ... उठाओ .
नल में पानी नहीं आता है ... आवाज़ उठाओ .


बत्ती की कई दिनों से कटौती है ... आवाज़ उठाओ .
बाबू समझता है दफ्तर उस की बपौती है ... आवाज़ उठाओ .
नेता चोर है ... आवाज़ उठाओ .
अफसर रिश्वतखोर है ... आवाज़ उठाओ .
बिग बॉस से होता नैतिकता का पतन है ... आवाज़ उठाओ .
इस देश में सिपाही का भी बिकता कफ़न है ... आवाज़ उठाओ .


बस ..........
अब और आवाज़ मत उठाओ .
हर तरफ से उठती आवाज़  
अब शोर बन चुकी है ...
कामचोरी की घटा घनघोर बन चुकी है .
बहुत सरल होता है दूसरों पर उंगलियाँ उठाना .
उतना ही मुश्किल होता है 
अपनी जिम्मेवारी निभाना .
अब चुपचाप रह कर 
चलो हम अपना - अपना काम करें 
और इस देश की अकर्मण्यता हरें .
        
                      - स्कन्द .
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चीखती आवाज़ .



हमें पसंद है आवाज मीठे गानों की
जो आती है टीवी से देर रात
देखते हैं जब भूले-बिसरे गीत

अच्छी लगती है हमें
भिनभिनाती सी आवाज 
जो करता है हमारा फ्रिज
और फिर खटके से हो जाता है
थोड़ी देर के लिए चुप

आवाज जो आती है पटरी से
खटक खटक, खटक खटक 
गुजरती है जब रेल पुल से

आवाज जो करती है अक्सर
अटक अटक के चढ़ती लिफ्ट
सुबह शाम दफ्तर में

ऐसी जाने कितनी आवाजें 
बिखरी पडी है मेरे आस-पास
बहुत जरूरी, बहुत अजीज आवाजें

आप भी तो सुनते होंगें ये आवाजें

लेकिन आवाज तब भी हुई थी
जब खंजर की तरह गाड़े गए थे सरिये 
कहीं गहरे-भीतर तक
पहाड़ की छाती में

आवाज होती है तब भी
जब एक मरी हुई घाटी की
रूह से रिस कर गिरता है खून
पानी की शक्ल में  
सैकड़ों फीट की ऊंचाई से

एक बाल भी उखड़ जाये तो
चिहुंक पड़ते हैं हम
और उखाड़ फेंके हैं हजारों पेड़ 
पहाड़ तो चीख पडा होगा

तरक्की के नाम पर हो रहा हैं
कुंवारे पहाड़ों का शीलहरण
बेहतर है कि हम यहाँ दूर ही बैठें रहे
अपने-अपने घरों में

अगर पहुँच गयी यहाँ शहरों तक
खलल डाल  देंगी हमारे आराम में
वो आवाज पहाड़ की

बिजली बहुत जरूरी है,
बच्चे कैसे देखेंगे डोरेमोन वरना ?

देखो, चाहे कुछ भी हो जाए
पहाड़ों की वो चीखती आवाज हम तक नहीं पहुंचनी चाहिए
आओ, उसे तरक्की के नारों में दबा डालो ! 


                                  - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .


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अनुगूंज .                                            



आवाज़े
कई शक्ल बना कर आती हैं .


कभी फुसफुसाती ,
कभी गूंजती आवाज़ ...
कुछ ठहरी ,
कुछ बहती आवाज़ .
कुछ शोर सी , 
कमजोर सी .


सारी आवाज़े घूमती है जेहन में
टकराती है
टटोलती हैं
स्वीकारती हैं कभी
नकारती हैं
मेरा वजूद ...


कुछ पार निकल जाती हैं
कुछ सहम कर
वहीँ रह जाती हैं .
कभी चुप्पी बन कर ,
कभी आंसू बन कर ,
बस बह जाती हैं .


              - रश्मि प्रिया 

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 Resonance .

 
When dream weaver leaves word spinner
Clanging wheels and hissing engines
Echo in the lonely station
Teeming with wet stories
Of meeting and leaving
And voices coalesce
Rivulets of desire
Gather momentum
In thunderous silence
 And dream weaver sings
In the voice of falling teardrops
As the word spinner’s tale
Echoes adieu in empty hearts

Or is it adieu?

For the thread of memories
Has knotted silver specks
Tied with the unseen voice
Of snowflakes surrendering
To a rapturous earth
As they fall silently
On a world exploded
With the voice of surrender
As two souls are transformed
To dream spinner and word weaver

How can goodbyes exist?
When in the silence of surrender
They absorbed one another
 The voice of their being
Now resonates in each other!


                          - Sadhana .
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आवाज़ हो गई है मेरी आज बेसदा ...


हमदर्दे ज़िन्दगी वो मेरा हो गया जुदा।
आवाज़ हो गई है मेरी आज बेसदा,


टूटे हुये नसीब का साथी नहीं कोई,
सीनाज़नों को एक मिला यार मैक़दा।


लम्हा है ये तमाम का नरमी से काम ले,
हो जाउँगा मैं अबकी दफा यार बेसदा।


अब रोशनी का राह में नामोनिशाँ नहीं,
अंधे सफर पे छोड़ हुआ हमसफर विदा।


आगोश में तो आ मेरे हर ग़म फना करूँ,
खामोश बेबसी से मेरी कह रही रिदा।


हर ख़ासो आम के तू ही लाज़िम गले मिले,
भाई है मौत हमको तेरी बस यही अदा।


मैं मुझको ढूंढता फिरूँ ताउम्र न मिलूँ,
कैसा अजीब हूँ मैं रहूँ खुद से गुमशुदा.


कश्ती में है सुराख तो पतवार भी है गुम,
लेकिन खुदा तो साथ है चल चल रे नाखुदा.


                                      - इमरान .


बेसदाः खामोश
सीनाज़नः सोगवार
रिदाः मिट्टी

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आवाज़ ...                                     


चुप्पी, जब तूओढती है 
मेरी सांसें तोड़ती है 
ख़ामोशी को गले लगाकर 
सन्नाटों को सखी बनाकार 
तन्हा मुझकोछोडती है ...
चुप्पी जबतू ओढती है 

चुप्पी, जब तू , ओढती है 
कितने सवाल ,छोडती है
मौन का निर्मम जाल बना कर  
हर पल को चिरकाल बना कर 
निशब्द, निरुत्तर, छोडती है ...
चुप्पी जब, तू ओढती है 

चुप्पी, जब तू, ओढती है 
मायूसी की तरफ मोड़ती है 
दिन के सारे रंग चुरा कर
उमीदों का संग छुड़ा कर
बेबस ,रेंगता छोडती है ...
चुप्पी जब, तू ओढती है 

चुप्पी, जब तू , ओढती है 
हर धड़कन, दर्द जोड़ती है 
तिनका तिनका, मुझको जला कर 
कतरा कतरा, राख उड़ा कर 
अस्तित्वहीन, छोडती है ...
चुप्पी जब, तू ओढती है .

                        - स्कन्द .

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वो आवाजें जहां हैं ...खूबसूरत हैं, मुकम्मल हैं . 
      

मिले हैं आज हम दोनों बड़ा अरसा गुजरने पे
पुरानी याद आयी और पुराना एक अफसाना 
जहां से बात छूटी थी वहीँ से फिर शुरू करना 
ख्यालों में तो लगता है बहुत अच्छा, मगर जानां


नहीं मुमकिन कि हम दोनों पलट दें वक़्त के धारे
सफ़र तय हो चुका काफी, नहीं अब सोचना होगा
जो आवाजें अभी तक गूंजती है पिछली राहों में
उन्हें कह दो वहीं ठहरें, नहीं अब लौटना होगा .

मेरे दामन में भी उम्मीद की हरकत कोई ताजा
तुम्हारी आँख में भी अब नए सपनों की जुम्बिश है
वो आवाजें जहां हैं, खूबसूरत हैं, मुकम्मल हैं
मगर अब जिंदगी को और ही  लफ़्ज़ों की ख्वाहिश है .


                                 -  पुष्पेन्द्र वीर साहिल .


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चिंगारी .

एक वादा करो खुद से ,
अपनी आवाज़ की चिंगारी 
तुम बुझने नहीं दोगे ...


ये एक छोटी सी चिंगारी 
बड़े से ख्वाब बुनती है !
लगभग रोज़ लडती है ,
और खुद को बचाती है 
बमुश्किल राख़ बनने से .


अभी वो आंच है इस में 
अंधेरों को बुझा देगी ,
मशालों को जला देगी ...
ज़रा तुम साथ दो इसका 
तो सदियों से जमी 
रातों की बुनियादें हिला देगी .


तुम्हारे हाथ में है 
इस को सुलगाना ... हवा देना .
या फिर इस को भी 
मुर्दा राख के नीचे दबा देना ,
बुझा देना .


मगर ये भूलना मत 
एक चिंगारी वो जरिया है ...
जिस से घुप्प गहरी 
रात के काले अंधेरों में 
उजाला बोया जाता है .
सुबह की धूप आने तक 
सिहरती , कंपकंपाती सर्दियों को 
ढोया जाता है .


ये ही आवाज़ 
तुम को मुद्दतों तक याद रखेगी 
कभी जब तुम नहीं होगे .
तो ...
ये वादा करो खुद से 
अपनी आवाज़ की चिंगारी 
तुम बुझने नहीं दोगे .


                - मीता .


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आज के विषय से सम्बंधित दुष्यंत कुमार जी की ये ग़ज़ल प्रस्तुत है जो कि उनकी पुस्तक ' साए में धूप ' में से ली गयी है ...
            
                ग़ज़ल                               


कहाँ तो तय था चरागाँ हरेक घर के लिए 
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए .


यहाँ दरख्तों के साए में धूप लगती है 
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए .


न हो कमीज़ तो घुटनों से पेट ढँक लेंगे 
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए .


ख़ुदा नहीं न सही , आदमी का ख्व़ाब सही 
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए .


वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता 
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए .
                            
                                    - दुष्यंत कुमार .
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18 टिप्‍पणियां:

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" ने कहा…

मगर उम्मीद कहती है ,
कहीं पर है वो दरवाज़ा
मेरी आवाज़ को जो
दर बदर होने नहीं देगा .

hope keeps us going,
all poems worth reading,nice collection

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" ने कहा…

आवाज़

मेरे कान में
जब से उन्होंने कहा
मेरे बिना
उनका दिल नहीं
लगता
उनकी आवाज़ ने
निरंतर दिल में
खुशी की इतनी
मधुर घंटियाँ बजायी
अब उनकी
गूँज के आगे
कोई और आवाज़
मुझे अच्छी नहीं
लगती
02-11-2011
1738-07-11-11

Reena Pant ने कहा…

मेरे मन का गलियारा
इतना संकरा भी नहीं
कि तू आवाज़ दे और
वो सुनाई न दे
बस तू बुलाता चल और
मैं आता रहूँगा तेरे पीछे
अपनी लकीर खीचे
दूर तलक
आकाश औ धरा की सीमा से परे
क्षितिज के उस पार ही होगा मिलन
इस मिलन की दस्तक से
जगमगा उठेगा सहन
खिल उठेगा सारा उपवन
बस नज़र मिला के
दे आवाज़
और में आता चलूँगा .........
मेरे दिल का गलियारा
इतना संकरा नहीं
कि तू आवाज़ दे
और वो सुनाई न दे

Reena Pant ने कहा…

काबिले तारीफ रचनाएँ ,दिन ब दिन गहरी और विस्तृत होती जा रही है लेखनी ,सभी को बधाई व् शुभकामनायें

अनुपमा पाठक ने कहा…

sound in all its forms well expressed in words...
The world of resonating voices have been made cherishable by this issue of chirantan...
I would just say that whichever topic chirantan choses, the poets here make the topic immortal and meaningful with their flair for writing and creative talents!!!
Hats off to the whole team!!!

vikram7 ने कहा…

ati sundar rachanaayen .

girijapande ने कहा…

सुनती हूँ मेरे खुद के ही
क़दमों की हरेक आहट .बस इक आवाज़ दोगे
और मुझ को रोक लोगे तुम =====मीता बहुत् ही सुन्दर् भाव् हे आपके---------गिरजा शकर् पान्डे

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

डा. राजेंद्र जी, आपका आभार सराहने के लिए. आशा है आपका प्रोत्साहन यूँही मिलता रहेगा.

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

रीना जी, आप की कविता अपने आप में बहुत खूबसूरत है. धन्यवाद.

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

अनुपमा जी, आप का प्रोत्साहन हमारे आगे बढ़ने का संबल है. बहुत बहुत धन्यवाद.

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

विक्रम जी, आपने चिरंतन की रचनाओं को सराहा, कोटिश: धन्यवाद.

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

गिरिजा शंकर जी, चिरंतन टीम की और से आपका आभार.

Na ने कहा…

Dr Rajendra,Reena Ji,Anupama Ji, Vikram Ji and Girija Ji, we at Chirantan truly appreciate your encouragement.Reena ji and Anupama ji have been with us since inception and we are grateful for that. We hope we can keep creating words which hold the attention of our newer readers too.Thank you so much for your time and appreciation

Leena Alag ने कहा…

Marvel at the way everyone here in Chirantan put thoughts to words when my comments are like repeating a speech..they hav become a litany learnt by heart...this issue is a masterpiece because the canvas of CHIRANTAN is covered with colours sooo diverse n unseen...Pushpendra ji in reference to ur introduction i would lyk to quote,"Drop a word of cheer n kindness:in a minute u forget;but there's gladness still a-swelling,n there's joy a-circling yet,and u'v rolled a wave of comfort whose sweet music can be heard..over miles n miles of water just by dropping one kind word"-James.W.Foley.....CHIRANTAN has initiated that ripple...:)....Devesh ji,ur poetry has a visual effect....ur words sketch images...kabhi of a pregnant woman n her cravings to kabhi of a nazm waiting to be dressed in the ornaments of your untouched and unrevealed n unsaid words..."ek iss aas pe ab tak hai meri band zubaan...kal ko shaayad meri aawaaz wahaan tak pahunchey"...:)...Meeta, again alwayssssss hopeful despite the despondency..."sun sako to aankhon mein lafz gungunaatay hain...khamoshi zubaanon ki...khamoshi nahin hoti"....:)....Skand ji u and ur inspirational poetry have been missed tremendously these last two weeks...nobody can ever come close to such blood boiling and awakening creations as you...."AB BAS"...should be the voice for the 26th of January...."CHEEKHTI AAWAAZ"...pushpendra ji aap jaisay soft poetry wala jab cheekh lagatay hain to trust me it shakes the readers to the core...this is soooo heartfelt...for u i had like to say..".main bahut khamosh hota hoon to mujhsay ghar ke sannaatay boltay hain...jab zubaan par kainchiyaan latki hui hon,dhaar paa jaatay hain...akshar boltay hain"....rashmi ji you are an epitome of brevity...aapki four lines mein pooray issue ka nichod hota hai...sadhana ji,what a pleasure seeing u back...:)...dream weaver n word spinner can never be apart its just that in the words of Stephen King..."words shrink things that seem timeless when they are in your head to no more than living size when they are brought out"...:)...imraan ji,skand ji the pain one feels in being met with silence,"ab to apni hi koi aawaaz sunnay ke liye...todtay hain log dil...lekar bahaanay kaanch ke"....pushpendra ji,"woh aawaazein jahaan hain...khoobsoorat hain, mukammal hain"...ab yeh issue indeed mukammal hai...because this is you...always happy n contented...at peace...n passing on that comfort...:)....meeta "Chingaari" se achchay message pe yeh issue end nahin ho sakta tha...this in truth epitomises Chirantan and the voices behind it...ek choti si chingaari which started as a dream is now fired with the voice of so many...yeh awaaz ki chingaari most definitely kabhi nahin bujh sakti!!!..."Bol,yeh thoda waqt bahut hai...jismo-zubaan ki maut se pehlay...bol ki kuch zindaa hai ab tak...bol ki jo kehna hai keh de".... i am sooooo proud to b a part of this voice!....:)
just adding a cherry on the top..."iss sheher mein jeenay ke andaaz niraalay hain...honthon pe lateefay hain awaaz mein chaalay hain"-Javed Akhtar"

Leena Alag ने कहा…

Reena ji,what a beautiful composition...any sound from the heart, will definitely reach the heart...just as this heartwarming poem of yours...:)

meeta ने कहा…

@Rajendra tela ji many thanks again for your beautiful poem and encouraging comment . Hope definitely keeps us going :)

@Reena di you have in fact taken two topics of Chirantan in your heart touhing composition . So positive and so beautiful . You have been reading us from the start so you are a witness to our growth . Thanks . your comment made us all feel so good .

meeta ने कहा…

@Anupama many thanks for your appreciation and beautiful encouragement from all of us .

Vikram ji many thanks .

Girija Shankar ji - Thanks and regards from all of us .

meeta ने कहा…

@Leena a special mention to your comment -
" Bol,yeh thoda waqt bahut hai...
jismo-zubaan ki maut se pehlay...
bol ki kuch zindaa hai ab tak...
bol ki jo kehna hai keh de ."
This is the zeal and energy that motivates all of us . Thanks for always always standing by our side . And I am also going to paste Reena di's comment for you : so it becomes a part of Chirantan .

"leenaji apka aur chirantan ka saath mano dor aur sui,patang aur dor ka ho,bahut sunder tarekey sey aap kavitaon ki gahrai ko chukar nikal jaati hai....."

Thanks to Reena di . She has said exactly what we all want to say .

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