सोमवार, 28 मई 2012

शुरुआत / The Begining .


मृत्यु निश्चित है. एक मात्र स्थिरांक. शेष सब परिवर्तनशील है पल-पल बदलते  हुए इस जीवन में, जिसमें जो भी कुछ है, उसका ना होना या ना रह जाना सार्वभौमिक सत्य है. सभी को ज्ञात है. भाग्य में ऐसा ही है कहने की पृथा भी है।  हा हंत! रे निष्ठुर भाग्य. क्या  इस अदम्य मानवीय  जिजीविषा पर तुझे कोई तरस नहीं आता? जो सब कुछ जानते हुए भी नित नए प्रयास करने में व्यस्त है, नित नए आयाम गढ़ने में तल्लीन है. हर क्षण एक नये स्वप्न के साकार करने हेतु इस आरम्भ का दुन्दुभि नाद - इसे क्या कहा जाये, मनुष्य की हठधर्मिता या गीता ज्ञान का अंतिम बोध? कर्म और फल का हजारों बार दुहराया जा चुका ये सन्देश यदि मान्य है तो तमाम शास्त्रों में जग-जीवन की नश्वरता पर इतना जोर क्यूँ है? 
अंत यदि निश्चित है तो अभीष्ट क्यूँ नहीं है? 
उलझन है तो आरम्भ में ही क्यूँ है. 
किस आरम्भ की फलदायक  परिणति होगी, कौन सा अधूरा रह जाएगा?
प्रश्न अनेक हैं.
और अगर प्रश्न हैं तो कुछ उत्तर भी हैं यहाँ, इस बार के चिरंतन में. आरम्भ तो कीजिये.
                    - पुष्पेन्द्र वीर साहिल.

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शुरुआत.


देखा है तुमने 
आँगन में लगा पेड़ सूख रहा है.
वो बावली गौरैया 
भी आज कल कहीं नज़र नहीं आती,
चावल  के दाने देहरी पर पड़े  मुंह चिढाते हैं  .
वो नटखट गिलहरी 
जो कल तक  रोशनदान  से झाँका करती थी 
आज  खुद ही कहीं छुपी बैठी है ...
चूहे भी नदारद हैं 
और कव्वे 

हैंडपंप भंजो 
तो वो मिट्टी उगालता है,
हवा कालिख  से लबरेज़ है.
लडखडाती रौशनी 
बैसाखी पर चल रही है 
और कोहरा गहराता जा रहा है.
लगता है 
जल्द ही अँधेरा सब कुछ  लील लेगा.
यों तो 
हर तरफ  सभ्यता का शोर है.

क्या कहूं ?
मैं भी तो इसी संस्कृति का हिस्सा हूँ !
जो कल से छीन कर 
आज  जी रही है ...
आने वाली नस्लों की उम्मीद पी रही है .
ऐसे ही अगर 
आज,
कुछ  और व्यूह रचेगा;
शायद 
कल के लिए कुछ  नहीं बचेगा.

थोड़ी सी तो ईमानदारी  
कल के साथ  करो... 
धरोहर धरा की बचाने की 
कुछ  तो शुरुआत करो.

     - स्कन्द.

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माफी नामा.



मेरे बच्चे 
हो सके तो मुझे माफ़ कर देना.


तुम्हारे दादा लड़े थे
उन्होंने लाठियां खाईं 
जेल गए 
कि मुल्क आज़ाद हो 
और मुल्क आज़ाद हुआ. 


पर मैं 
न तो आज़ादी पाने के लिए लड़ा था 
और न ही आज़ादी बचाने के लिए लड़ पाया.


जब लोगों ने नफरत के बीज बोये 
मैंने आँखें बंद कर लीं.
जब क्रूर अट्टहास किये 
मैंने कान बंद कर लिए  .
और जब मेरी आजादी छीनी 
मैंने ज़बान पर ताले डाल लिए.
नतीजा तुम  भुगतोगे मेरे बच्चे 
मेरी यह कायरता तुम्हें 
दर दर भटकाएगी,
मेरी भीरुता तुम्हें 
हर दिन रुलायेगी. 


ज़िन्दगी के 
इस आखिरी मोड़ पर खड़ा मैं 
बस इतना कहूँगा 
कि इन भटकनों के बीच
कभी जब मेरी याद आये 
तो चाहे  शर्म से सर नीचा कर लेना,
पर हो सके तो 
मुझे माफ़ कर देना. 

तुमने मेरा रंग  पाया है...
मेरा रूप पाया है, 
पर मेरी कायरता को 
अपने पास  न फटकने देना;
मेरे बच्चे उस से लड़ना.


उस से लड़ना 
नहीं तो मेरे बच्चे 
मेरी तरह तुम  भी 
ऐसे ही रोज़  रोज़  मरोगे;
मेरी तरह तुम  भी 
ऐसे ही किसी मोड़ पर 
डरे सहमे खड़े मिलोगे.


ज़िन्दगी के इस आखरी मोड़ पर खड़ा
तुम्हारा  कायर  पिता 
तुमसे यही भीख  मांगता है.
तुम्हारी आज़ादी की शुरुआत 
इसी लड़ाई से होगी मेरे बच्चे.

तुम  कायर मत बनना.
और हो सके 
तो मुझे माफ़  कर देना.
सुना है 
माफ़  करने से हिम्मत बढती है.

            - दिनेश श्रीवास्तव. 


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एक नयी शुरुआत...



रेशम सी फिसलती ज़िन्दगी
चल मोतियों सी  बात करें
नन्हे ख्वाब उगायें हथेली पर
नींदों को  सौगात करें
         चल एक नयी शुरुवात करें


कुछ किस्सों की सीवन उधेड़े
कुछ की करें मरम्मत
कुछ छोड़ दे मुफलिस से
कुछ नयों से मुलाक़ात करें
           चल एक नयी शुरुवात करें


रोज तो तय होती है मंजिलें
कितने क़दम और कितने मोड़
याद है पहाड़ों(table) की तरह
आज बिना सोचे सफरात करें
            चल एक नयी शुरुवात करें


अभी अभी सोयी है इक नज़्म
थक सूरज की बांहों में
आज रात  चाँद को दूल्हा
और तारों की बारात करें
             चल एक नयी शुरुवात करें


                  - राजलक्ष्मी शर्मा.
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Beginings And Ends - Perspectives.




End Of The Begining .

First, dies a slow death
your zeal.
Then one by one
dreams perish .
In the barred cage
of your heart,
hope flutters a while
till one morning
you find it's tiny body
lying at the bottom...
lifeless .


It is
the End of the Begining
of the tiny thoughts
that once made you smile,
Leaving you in a daze
to meander
through the unruly course of life.


Sometimes when things end,
Beginings end .


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Beginings Never End.


However hard the winds may blow
Turning your sails upside down,
If you just do not give up,
You might never really drown .


This is what I've learned in life,
You just need the will to strive,
End's the door for a brand new Begining
And of course, you will survive :-)




                                    - Meeta .
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हो गयी शुरुआत...

                                                                    
हो गयी शुरुआत, हो गयी शुरुआत
हम सफर पे चले, डाल हाथों में हाथ।
पैरों में है आसमां, हाथों में है कायनात
हो गयी शुरुआत, हो गयी शुरुआत

महकी महकी है वो, कोई परी है वो, आँखो की है रोशनी।
मीठी है वो गुड सी, शीरीं है शहद सी, चीनी की है चाशनी।
लज्ज़तें हैं मेरी अब मेरे साथ साथ।
ढल गये सारे ग़म, ढल गई काली रात।
हो गयी शुरुआत.......

पास जो वो आये, आके मुस्कुराये, तो ये सफीने चलें।
दूर जो वो जाये, कश्ती डगमगाये, धड़कनें भी ये रुकें।
भरता नहीं दिल मेरा कितनी करूं चाहे बात।
क्या यही प्यार है खुद से करूँ सवालात।
हो गयी शुरुआत.......

होश नहीं रहता, चैन नहीं मिलता, बेताबियाँ हैं जवां।
छाया नशा कैसा, हाल हुआ ऐसा, कर नहीं पाऊँ बयाँ।
बेखुदी छा गई कैसी हैं मुश्किलात।
जागूँ मैं करवटें लेता रहूँ सारी रात
हो गयी शुरुआत.......

इमरान.

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एक मामूली कहानी .

शुरुआत याद नहीं है .
शायद 
मन के भीतर उगे 
किसी शून्य से हुई होगी...
या फिर 
किसी स्वप्न से.

और फिर
दिलचस्प होने के लिए 
ये कोई प्रेम कहानी नहीं!
ईश्वर से माँगा... न किसी से तुम्हें छीना,
वादे किए...न कोई दुहाई दी,
दिल  टूटा... न कोई रस्म.

तुम्हें 
पा लेने की जुस्तजू नहीं, 
खो देने का डर भी नहीं.
होती हैं कुछ  कहानियां 
ऐसी भी...
जो कहानियों जैसी नहीं होतीं.


पर देर तक ... 
दूर तक 
चलती हैं साथ साथ 
उंगली थामे... 
किसी मासूम  बच्चे की तरह.

कैसे, कब,
कहाँ शुरू हुई थीं ...
याद न हो
ये अलग बात है.

         - मीता .
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वहां से.

जहाँ तुम
सब ख़तम  कर के चले गए थे  
वहां से ... यहाँ तक 
मैंने खुद को बनाया है 
फिर से .
और अब तुम  कहते हो 
साथ  चलो .


सुनो... 
मैं एक  शुरुआत कर चुकी हूँ ,
तुम  भी उसी शून्य से शुरू करो .

       
                    - अनन्या .
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इब्तिदा करूँ कैसे...
Floral Art - Daisy Chain by Stephie Butler
इब्तिदा करूँ कैसे                                                                                       
तुमसे ये कहूं कैसे

बात तुमसे करने को 
बेकरार रहता है,
सुबहो-शाम इस दिल को 
किस क़दर तुम्हारा ही
इंतज़ार रहता है,

इंतज़ार के लम्हे
बेकली के आलम में
इस तरह मचलते हैं,
जिस तरह मचल कर के
साहिलों के शानों पे
रोशनी की किरनों के
सांसो-दम बिखरते हैं,

ख्वाहिशों के रेले हैं 
जुस्तजू के मेले हैं
बेवजह झमेले हैं,

दिल में कुछ वीरानी हैं
क्या अजब कहानी है
तुमको जो सुनानी है,

बात क्या है, क्या मालूम
मालूमात करनी है
लाख मुश्किलें हो पर,
कुछ तो बात करनी है,

जो भी कह सकूं जानां
बात वो ही कहनी है,
बात जो भी कहनी है
उस का कुछ नहीं हासिल
बात सुन सको जो तुम
उस की बात करनी है,


बस यही तो मुश्किल है
बात वो करूँ कैसे 
तुमसे ये कहूं कैसे
इब्तिदा करूँ कैसे?

       - पुष्पेन्द्र वीर साहिल. 
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Masters Category के अंतर्गत  पढ़िए रघुवीर सहाय जी की लिखी ये बहुत प्यारी, सरल  सी कविता, जो हर दिन को जीवन की एक  नयी शुरुआत  बताती है ...



आज फिर शुरू हुआ जीवन

आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी
आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा
जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया

आज एक छोटी-सी बच्ची आई,
किलक मेरे कन्धे चढ़ी
आज मैंने आदि से अन्त तक एक  पूरा गान किया

आज फिर जीवन शुरू हुआ ।


           - रघुवीर सहाय.
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आइये सुनते हैं बेहतरीन अदाकारा और उम्दा शायरा मीना कुमारी जी की लिखी हुई ग़ज़ल उन्हीं की
आवाज़ मे. सरगम में प्रस्तुत है ' आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता '.
( गीत  प्रस्तुति - लीना अलग )



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7 टिप्‍पणियां:

दीपिका रानी ने कहा…

बहुत खूबसूरत और मेहनत से तैयार पोस्ट.. सभी कविताएं उम्दा थीं..

अनुपमा पाठक ने कहा…

Wonderful!
It made a great reading!

Reena Pant ने कहा…

बहुत सुंदर कवितायेँ

Reena Pant ने कहा…

सुबह फिर शुरू हुई
एक नयी ज़िन्दगी
उमड़ फिर गए नए ख्वाब
जो डूबते सूरज के साथ
छिप गए थे
रात के अंधरे में
हर सुबह यही होता है
ऐसे ही होती है शुरुआत .....

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

दीपिका जी, अनुपमा जी, रीना जी, आप सब का धन्यवाद.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

Nomaan Shauque ने कहा…

बहुत अच्छा संकलन है .. राजलक्ष्मी शर्मा की रचना खास तौर से पसंद आयी .. नोमान शौक़

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