मंगलवार, 15 मई 2012

मोड़ / The Bend .

                                             
जिंदगी की समानता अगर करनी हो तो एक बहती नदी से की जा सकती है. बार बार मोड़ लेती हुई, घूमती हुई एक नदी, जिसे पता नहीं कि अगले मोड़ पे उसमें समा जायेगा कौन सा  झरना, मिल जाएगी कौन सी छोटी सी सरिता? रहेगा तो फिर भी वो बहता पानी ही, लेकिन कुछ तो बदल जायेगा भीतर भीतर. 
ऐसे ही जीवन अनेक मोड़ ले ले कर बहता रहता है. भाई, बहन, दोस्त, पति-पत्नी ... तमाम रिश्ते इस जीवन धारा के मोड़ पर हमसे जुड़ने को आतुर हैं. हर रिश्ता कुछ बदल डालता है हमारे अन्दर. कभी मिठास दे जाता है तो कभी खटास भी. लेकिन जीवन है कि चलता ही रहता है. 
और फिर जब बहुत देर तक कोई मोड़ नहीं आता, कोई घुमाव नहीं आता,  सपाट बहना होता है ... तो समंदर आ जाता है. महाप्राण में प्राण के विलीन होने के जैसा ही है यह जीवन धारा का मृत्यु-रूपी समंदर में मिल जाना. 

इसलिए मित्रों, स्वागत करो हर मोड़ का, बांह फैला कर! कदाचित मुड़ते रहना ही जीवित रहना है.
                     - पुष्पेन्द्र वीर साहिल.
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बिना सोचे
 
बिना सोचे 
कि ये एक राह है,
और राह है 
तो मोड़ भी होंगे...
चलो, 
एक साथ चलते हैं .

न जाने कौन सा मकाम 
मेरे नाम लिक्खा है,
न जाने कौन सी मंज़िल 
तुम्हारी मुन्तजिर है....
शायद 
रास्ते के मोड़ को 
मालूम  है सब कुछ.

ये तुम  भी जानते हो 
और मैं भी...
कि जब भी मोड़ आते हैं 
तो रस्ते रुख  बदलते हैं.

मगर फिर भी 
बिना सोचे 
चलो, 
एक साथ  चलते हैं..

                - मीता .
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तू यूँ क्यों चला गया।


दिल में गुबार भरके तू यूँ क्यों चला गया,
इक मोड़ पे सफर के तू यूँ क्यों चला गया।

सालार ए फ़ौज तू जो रहे हौसला बढे,
दुश्मन से आज डरके तू यूँ क्यों चला गया।

तेरी ये मंज़िलें हैं तेरा कारवाँ भी है,
सब कुछ तमाम कर के तू यूँ क्यों चला गया.

नगमा तू ही है दिल का तू ही साजे दिल भी है,
राहत मेरी नज़र के तू यूँ क्यों चला गया.

इस मोड़ की तमन्ना हमें इक ज़माँ से थी,
आके यहाँ गुज़र के तू यूँ क्यों चला गया.

'ताइर' की मर गयी है वो उड़ने की आरज़ू,
पर ही मेरे कतर के तू यूँ क्यों चला गया.

                   - इमरान खान 'ताइर'

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गुजर गए कि कोई मोड़ रहगुजर में नहीं
               
गुजर गए कि कोई मोड़ रहगुजर में नहीं 
मज़ा इसीलिए शायद कोई सफ़र में नहीं 

रात भर जेह्न में आतिशफशां दहकता रहा
बूँद भर दाग़ रोशनी का पर सहर में नहीं 

बचपना खो गया है नस्ले-नौ का, देखता हूँ 
कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा, मिला शहर में नहीं 

दुआएं  मांगने  में  जो सुकून  था, उतना 
जाने क्यूँ चैन उन दुआओं के असर में नहीं 

           - पुष्पेन्द्र वीर साहिल.
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सावधानी हटी, दुर्घटना घटी 



जीवन को सरलता, सफलता पूर्वक 
जीने के लिए 
किसी भी मोड़ का कोई तोड़ नहीं!

चाहे वो शारीरिक अंगों के मोड़ हों -
घुटनों, कोहनी, आँतों, शिराओं, 
धमनियों, नाड़ियों के मोड़ ...
वृक्षों की जड़ों,तनों के
पशु पक्षियों, कीट पतंगों की 
शारीरिक बनावट के 
उन्हीं में क्षमता निः सृत है 
हिलने डुलने की 
जीवन को गति देने की .

पहाड़ों, नदियों, नालों में 
सड़कों, रास्तों, बगियाओँ  में 
कहाँ नहीं है मोड़?
सारी सृष्टि 
मोड़ तोड़ का जोड़ ही तो है.

बचपन, यौवन, बुढापा 
यह भी तो मोड़ ही हैं.
धार्मिक, सामाजिक हों 
अथवा सांस्कृतिक, राजनैतिक कृत्य, 
परिवर्तनशील होने के फलस्वरूप 
मुड़ने के लिए बाध्य कर देते हैं सभी को .

परिवर्तन स्वयं ही मोड़ है 
जिसके अनुसार सावधानी पूर्वक मुड़ने से 
जीवन सार्थक होता है 
जो परिवर्तानानुसार सावधानी वर्तते हुए 
मुड नहीं पाता है ...
अस्तित्व खो बैठता है, 
पिछड़ जाता है .

स्थान स्थान पर पर्वती रास्तों में 
मोड़ों पर मुड़ने की हिदायतें मिलती हैं 
मोड़ कैसा है 
कितना तीव्र है .... आदि आदि .
इन मोड़ों से चालक की आँख हटी नहीं 
दुर्घटना घटी नहीं .
अब यदि 
मोड़ पर असावधानी बरतते 
अपनी गाडी को कोई 
हवा में ही उड़ा ले जाये 
उसके लिए फिर क्या कहा जाये !!

       - ललित मोहन पांडे . 
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                        The Blessing


I watch the night when the moon moans
Tired of circling around the earth
And rears to run off of a tangent
Years of self deception of being tied
To the unyielding emotionless earth
Drops of anguish bleed in moonbeams
Dripping like stains on ice
When will the pull loosen?
Will the moon find a turn
Running away from its beaten path
To find its own glory

You the earth and I the moon
Like an object of splendor
Scintillating trophy displayed
Revolving the orbit of your expectation
Oh! What a turn it was
An assumption of your sheen
Being your own light
Shattered into glass needles
Raw burnt edges still suffocate me
Their smell the reminder
Life limps along a path
And a turn sometimes
A blessing in disguise


- Sadhana .
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उसी मोड़ पर



उसी रास्ते के किनारे
उसी मोड़ पर
आज  भी एक  गीली सी याद लिए
गुज़रती हूँ मैं ...


मगर ना तो अब वहां
वो दरख़्त है
और ना वो पीला पत्ता 


हैं तो बस
मेरे होंठों पर
अब भी तुम्हारा नाम .


हाँ उसी मोड़ पर
मैंने एक आशियाना बनाया है
अपनी उम्मीदों का
जहाँ तुम मिलोगे एक रोज़ और कहोगे
" अब भी बारिशों को छूती हो क्या !"


तब मैं
बस इतना कहूंगी
" मेरी आँखों की बरसातों को
बस एक बार , हौले से
तुम छू लो ना."


उसी रास्ते के किनारे 
उसी मोड़ पर 
अब भी हमारे क़दमों के निशां हैं...


आओ 
अगर मुमकिन हो 
मिटा जाओ ये निशां 
या फिर आओ 
कि  साथ चलें 
दूर तक ...
क़दम क़दम . 


         - अनन्या .
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पहले मोड़ के किस्से अजीब होते हैं...



काश!
उस मोड़ पे
राह दिखाने के बजाय
तुमने हाथ मेरा थामा होता
और साथ चल दिए होते 
अगले कई मोड़ सुहाने होते
और ये सफ़र भी आसां होता
मैंने रातों को उठकर यही अकसर सोचा

बहुत दिन बाद ये इलहाम  हुआ
उस रोज़  मुझे आगे ही नहीं जाना था 
बस उसी मोड़ पे रूक जाना था
जहां तुमने मेरे लौटने की राह तकी  

पहले मोड़ के किस्से अजीब होते हैं
दिल के कितने क़रीब होते हैं

              - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .

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Oftentimes .


Oftentimes 
I've seen this happening 
right at the moment 
when your dreams 
start taking a shape -
The sleep ends .

However hard you shut your eyes,
Whatever attempts you make 
to recall those faded traces ...
It shows up not again .

And then, 
wide awake
In the dark you try to make
what could have been 
the possible fate 
of that poor abortive dream !! 

How helpless it feels !!
A begining 
and no end at all .

Oftentimes 
I've seen this happening 
Just at the moment 
when you catch 
a glimpse of your destination -
The path bends .

      - Meeta .
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                                   खोयी वह लड़की .
                                                                     
कई साल पहले
अपने छोटे से घर
के पिछवाडे को खोदते
वो जार जार रोई  थी
अपनी काली बिल्ली को  दफनाते
कुछ साल बाद अपनी टूटी गुड़िया  
के साथ बचपन की दोस्ती को भी
और चंद लम्हे अबोध  बचपन के
उस काले शीशे के संदूक में


आज भी रात को
उस करवट सोये आदमी
और बीच में लडके
के ऊपर से उड़ के
पहुँच जाती है वह 
उस मोड़ पे वापस
दफनाई कविता में
जहाँ सुलगता हैं यादें
बारिश में भीगे उसके  बाल
पे लिखी किसी की पंक्तियाँ
सूरज के रंग में लिपटे एहसास
एक बेटी का अंश जिसको
नाम देने से पहले ही
सूली चढ़ा दिया गया


कल्पना की वह उड़ान
चौके के धुंए में गश खा गयी
पर वह खुद नहीं पहचान पाती
किस मोड़ पे खोयी वह लड़की .


- साधना .


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मोड़ के इस एक तरफ .

मोड़ के उस पार एक कहानी तेरी भी
मोड़ के इस तरफ एक अफसाना मेरा भी
और मोड़ पे बस तू है, मैं हूँ और इश्क है...

मोड़ के उस एक तरफ
तुम अपनी पाजेब की झंकार से
उम्मीदों के उजाले खनखनाती हो
धूप के नन्हे पहर
मुस्कुरा कर अपने रुखसारों से उड़ाती हो

मोड़ के इस एक तरफ
मैं तुम्हारी मौसीक़ी के आबशार सुनता हूँ
तुम्हारी उगती हुई शफ़क से अपने आफ़ताब बुनता हूँ

मोड़ के उस एक तरफ
तुम खिलखिलाती, जगमगाती रेशमी सी शाम हो
दिया बाती गुनगुनाती तुम मेरी पहचान हो

मोड़ के इस एक तरफ
मैं तुम्हारी याद में टांकी हुई एक अधखिली सी रात हूँ
चाँद का पैबंद है एक वर्ना मैं बस रात हूँ
मोड़ के इस एक तरफ
तुम रास्तों पर मील का पत्थर लगाती चल रही हो

अपनी पलकों में अँधेरे झिलमिलाकर धूप बोती चल रही हो
मोड़ के इस एक तरफ
मैं बस तुम्हारी याद में यूँ रास्ते रोशन किये बैठा हुआ हूँ
तुम कभी आओगी फिर पलटकर 
सो रास्ते में जुगनुओ की एक शमा जलाये बैठा हूँ

मोड़ के उस एक तरफ
तुम भी पलकें भिगाए बैठी हो
नीम तारीक से इस रास्ते पर 
आंसुओं के दीपक जलाये बैठी हो

मोड़ के इस एक तरफ
मैं भी हिज्र की रातें वस्ल की एक होलिका में झोंकता हूँ
तेरे आने की खबर को आती जाती हर सबा को टोकता हूँ

मोड़ के इस एक तरफ
एक हंगामा है बेक़रारी है
मोड़ के उस एक तरफ
बस तेरी याद तारी है... तेरी याद तारी है...

                    - देव .
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At the Turn of the Road



The glory has passed from the goldenrod's plume,
The purple-hued asters still linger in bloom
The birch is bright yellow, the sumachs are red,
The maples like torches aflame overhead.

But what if the joy of the summer is past,
And winter's wild herald is blowing his blast?
For me dull November is sweeter than May,
For my love is its sunshine,--she meets me to-day!

Will she come? Will the ring-dove return to her nest?
Will the needle swing back from the east or the west?
At the stroke of the hour she will be at her gate;
A friend may prove laggard,--love never comes late.

Do I see her afar in the distance? Not yet.
Too early! Too early! She could not forget!
When I cross the old bridge where the brook overflowed,
She will flash full in sight at the turn of the road.

I pass the low wall where the ivy entwines;
I tread the brown pathway that leads through the pines;
I haste by the boulder that lies in the field,
Where her promise at parting was lovingly sealed.

Will she come by the hillside or round through the wood?
Will she wear her brown dress or her mantle and hood?
The minute draws near,--but her watch may go wrong;
My heart will be asking, What keeps her so long?

Why doubt for a moment? More shame if I do!
Why question? Why tremble? Are angels more true?
She would come to the lover who calls her his own
Though she trod in the track of a whirling cyclone!

I crossed the old bridge ere the minute had passed.
I looked: lo! my Love stood before me at last.
Her eyes, how they sparkled, her cheeks, how they glowed,
As we met, face to face, at the turn of the road!

                       - Oliver Wendell Holmes .


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सरगम में चित्रा सिंह जी की मीठी आवाज़ में प्रस्तुत है 
ये खूबसूरत और थोड़ी उदास  सी ग़ज़ल जिसे लिखा है 
सुदर्शन फाकिर जी ने... 
आइये सुनते हैं  'जिस मोड़ पर किये थे हमने करार बरसों' 



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11 टिप्‍पणियां:

Vinay Mehta ने कहा…

चिरंतन का यह अंक पड़ के बरबस निदा फाजली जी की कविता याद आ गयी ......
आप सब के साथ साँझा करता हूँ ....
आप सब की रचनाओ को में सर झुका के नमन करता हूँ ....


सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो


इधर उधर कई मंज़िल हैं चल सको तो चलो
बने बनाये हैं साँचे जो ढल सको तो चलो


किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो


यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिराके अगर तुम सम्भल सको तो चलो


यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चन्द उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो


हर इक सफ़र को है महफ़ूस रास्तों की तलाश
हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो


कहीं नहीं कोई सूरज, धुआँ धुआँ है फ़िज़ा
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो.....
(निदा फाजली )---


मोड़ बड़े है जिंदगी में हर मोड़ एक नया मुकाम दे जाता है..
तेरे अन्दर भी.. मेरे अन्दर भी नई प्यास जगा जाता है..
यही आस ही तो इंधन का कम करती है ....
हर नए मोड़ से फिर नयी राहों का आगाज़ करती है ...
विनय ......

दश्त दर दश्त घुटे रहे ..
अरमान सिने में दफ़न करते रहे ...
उम्मीद न छोड़ी न विनय छोड़ा करार ..
हर मोड़ पे जिंदगी किया तेरा इंतज़ार ......

Na ने कहा…

Vinay Ji, thanks for sharing this gem with us. Your contributions always add a glow to Chirantan, and we truly apprecaiate how you are an inseparable part of it.

Ratindra sharma ने कहा…

देव कि लिखि हुइ कविता बहुत हि खूब्सूरत है...

Na ने कहा…

Ratindra ji, Thanks for the appreciation.We hope you will continue to read us

अनुपमा पाठक ने कहा…

हर मोड़ पर सुन्दर है... क्यूंकि चिरंतन है!
भावों की समृद्धि हर कविता... हर मोड़ को गरिमा प्रदान करती हुई इस अंक को संग्रहणीय बना रही है, लगभग चिरंतन के प्रत्येक अंक की तरह!

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

खोयी वो लडकी ! बहुत ही खूबसूरत कविता साधना जी. नए आयाम लिए हुए. बहुत ही मौजूं कविता.

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

विनय जी, बहुत खूबसूरत ग़ज़ल शेयर की आपने.
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो ... सच कहा है.

अनुपमा जी, आप हमेशा सराहती हैं, धन्यवाद आपका.

leena alag ने कहा…

I have soooo completely exhausted my stock of superlatives (because nothing lesser than that will ever do) on commenting that this time i will completely fall upon my Masters to come to my rescue... [:)] ...this once please allow me to just quote a couplet of the best writers against each composition...will follow the order of names as they appear in the issue...

Meeta-

"उस मोड़ पे हम दोनों कुछ देर बहुत रोये
जिस मोड़ से दुनिया को इक रास्ता जाता है...

Imran Khan "TAAIR"-

"या इश्क था उदासी-ओ-तन्हाई से मुझे
या वक़्त एक मोड़ पे सदियों रुका रहा...

Pushpendra ji-

"हर कदम पर मोड़ थे,हर मोड़ पर मंज़र नए
उम्र की इक-एक साइत सर्फे-हैरानी हुई...

Sadhana ji-

"है ख़त्म अहले-दर्द पे ये वज़अदारियाँ (उम्दा तौर तरीके)
जिस मोड़ पर मिले थे उसी पर जुदा हुए...

Ananya-

"सरे शाम ठहरी हुई ज़मीं जहां आसमां है झुका हुआ
इसी मोड़ पर मेरे वास्ते वो चराग ले के खड़ा न हो...

Devesh ji-

"हर मोड़ पे पड़ता है हमें वास्ता इससे
दुनिया से अलग कहने को रास्ता है हमारा...

I would just like to say that an issue like this jiska har" mod" ek hi destination tak le jaataa hai and that is the deepest recesses of the heart and if there's anybody who reads it otherwise then...

"हर लफ्ज़ को छूते हुए जो कांप न जाए
बर्बाद वो अलफ़ाज़ की औकात करे है"...

This again is an out n out soul stirring issue... (Y) ... :)

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

Thank you Leena ji. I wonder why can't we post a second issue of Chirantan on this topic ''MOD/The bend'' where we only post your comments! It will be complete in itself. Such a fantastic collection of quotes, such deep shayri!
I am amazed at your ability to recall such gems.
Thanks again.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

बहुत खूब...सुन्दर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) ने कहा…

bahut acchhaa lagaa yahaan aakar....sabhi cheezen acchhi hain...aur pyaari bhi....aur....sab abhi hi kah daalun kyaa...!!??

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