गुरुवार, 7 जून 2012

समंदर / The Boisterous Sea ...


गोरख की लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं - ''ये आँखें हैं तुम्हारी या तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समंदर! इस दुनिया को जितनी जल्दी हो सके, बदल देना चाहिए.'' कविता निहायत ही खूबसूरत है, इस में कोई शक नहीं. कोई २५-३० साल पहले पढी ये लाइनें दिलो-दिमाग पर कुछ ऐसे छप गयी हैं मानों समंदर के होने का एकमात्र उद्देश्य हमारे दर्द, तकलीफ़ और गम का प्रतीक बनना है. मुझे लगता है ऐसा सोचने वाला मैं अकेला नहीं बल्कि कागज़-कलम-कविता के सारे खिलाड़ी सब इसी काम में मशगूल हैं. मानों समंदर पर इतना दर्द भरा लिख दिया जाये कि इतने दुःख-दर्द को जन्म देने के ग़म में समंदर खुद ही शर्मिन्दा हो कर डूब जाए. 
खैर! हंसी-मजाक एक तरफ छोडिये. हाल-फिलहाल एक ख़याल आता है कि बहुत हुआ, समंदर जैसी बहुआयामी  शख्शियत  (जी हाँ, शख्शियत! ) के साथ ये ज्यादती अब बंद होनी चाहिए और हमें चाहिए कि समंदर के और भी रूपों को पहचाना जाये. मसलन समंदर खूबसूरत है क्योंकि डूबते सूरज के जितने रंग पहचाने गए हैं वो इसी समंदर के आईने में नज़र आते हैं. समंदर ताकतवर है क्योंकि दम तोड़ती लहरों पे डगमगाती नैय्या से लेकर हिमखंडों से टकरा कर टाईटैनिक तक के डूबने की कहानियां हम देख-सुन चुके हैं. समन्दर के अन्दर एक प्रेमी का ह्रदय धड़क रहा है जिसकी प्यास बुझाने हजारों नदियाँ अपनी शीतलता लिए दौड़ी चली आ रहीं हैं. और भी बहुत कुछ सोचा-लिखा जा सकता है. कुछ आप भी दिमाग की वर्जिश कीजिये और कुछ नया कहिये.
हाँ, इतना जरूर है कि ऐसे जितने भी ख़याल आ जाएँ, जब ध्यान पड़ता है कि समन्दर में वही खारापन है जो मेरी-आपकी आँखों से बहता है, तो फिर लगता है अब आँखें बंद की जाएँ और किसी सोज़ भरी आवाज को रूह में उतरने दिया जाये. मान ही लिया जाये कि समंदर दर्द में या तो डूबा रहेगा या  डुबोये  रखेगा. आइये, साथ ही डूबते हैं. 
    - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .

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तुम - मैं .
             
            1
जब कोवलम अलप्पी 
के किनारे, तुम्हारे 
साथ खड़ा हो निहारा 
तब महसूसा 
धीर- वीर- गंभीर- मर्यादित 
यह नीला समुद्र 
तुम्हारी तरह 
बंधनमुक्त बाँहों में 
समेटता ....बंधनयुक्त !


            2 
तीन समुद्रों से घिरी 
'विवेकानंद शिला' पर 
बीच समुद्र खड़े तुम 
और तट पर दूर,
'कन्याकुमारी' सा मैं .
इसी पर कहा है 
मृदुला गर्ग ने - 'प्रेम 
कितना सहज , कितना जटिल'.


             - दिनेश द्विवेदी. 


पुस्तक संग्रह "पारे की तरह" से ली गयी रचनायें .
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'हमारे मेहमान' के अंतर्गत इस बार हम आप के लिए दो रचनायें लाये हैं . पहले स्वागत करते हैं जाने माने लेखक, कवि एवं आलोचक श्री खुर्शीद हयात जी का . प्रस्तुत है उनकी एक बेहतरीन रचना -

समंदर...


समंदर में मैं हूँ ,
मुझ में समंदर .
बारिश की बूँदें समंदर में
और समंदर बारिश की बूंदों में
मुझे करीब से देखो
पहचानो .
उभरती डूबती लहरों को देखो
सुनो !
वह क्या कह रही हैं ?
यह रह रह कर कौन उभरता है
डूबता है
लहर लहर समंदर
लहरें साहिल से टकराती हैं
फैलती हैं
अपने होने का एहसास दिलाती हैं
फिर लौट जाती हैं .


ज़मीन की गर्दिश
सूरज की तपिश
ज़िन्दगी का बेदार होना
और पानी का भाप बन जाना .
मेरी कोख से निकलने वाली आवाज़ को
किसने सुना, किसने जाना ?
आसमां की कसम जो मेह बरसता है
और ज़मीन की कसम जो फट जाती है
तुम्हें क्या मालूम , मैं क्या हूँ ?
मेरी तहों में क्या है ?
बस एक घोंघा तुम्हारे हाथ लग गया
रेत के कुछ ज़र्रों का इल्म हो गया
और उस से आगे ...
और उस से परे ...


कसम है आसमानों की
और चमकते हुए तारों की
अगर मुझे जानना चाहते हो तो खुद एक समंदर बन जाओ
फ़ैल जाओ मेरी लहरों की तरह
फ़ैल जाओ मेरी लहरों की तरह
रात के तीसरे पहर, आती हुई सदाओं की तरह
सूरज की सतरंगी किरणों की तरह


समंदर की उभरती डूबती फैलती
सूनामी लहरें सदाएं दे रही हैं 
समंदर में मैं हूँ 
मुझ में समंदर ....!


           - खुर्शीद हयात .
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हमारे मेहमान ' में स्वागत है श्री चंडीदत्त शुक्ल जी कागोण्डाउप्र में जन्मजयपुर में निवास। इन दिनों दैनिक भास्कर समूह की लोकप्रिय पत्रिका ' अहाज़िंदगी के फीचर संपादक के रूप में कार्यरत।
कुछ भीगे क़तरे.


यूं मैं कुछ नहीं
यूं तो तू भी कुछ नहीं
पर तू जो हैमैं हूं जितना भी
हम हैंबस हैं।
यही तोलते हुए,
जो थासुनहरा था
जो हैबुरा है,
होना चाहिए जोवो होगा ही नहीं
निकलते जाते हैं हाथ से सब लम्हे
एक-एक कर.
कभी तो तराजुओं को अलग रख यूं ही कुछ बटोर लें...
सीपियों और मोतियों के बिना भी रेत मौजूद रहती है।
दिल में चंद घरौंदे बनाने की ख़ातिर ज़रूरी है,
समंदर की नीली चादर के कुछ भीगे क़तरे।


          - चंडीदत्त शुक्ल.
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                                                            HOPE .


What if the silent sea
Was a treasure trove
Would I find pain buried
Or pleasure unbridled

Shared dreams may be buried
Of a house by the shore
As the sun jumped over windows
Sea spray wet us to the core

The sand of some promises
A glistening fistful of hope
Sieved through lonely lives
As tides played their stroke




The crest of the waves
Which one ride of success
Never able to fathom
What lies on the sea bed

Let’s throw a few pebbles
With forgiveness its core
And see expanding ripples
Reach back to the shore

Maybe that’s life’s lesson
We all need to absorb
What life throws at you
Needn’t strike a dull chord

For hope revels in us
Throw hope at life
Life won’t have a choice
To stifle your might

The strong sea of life
With its ebbs and tides
Has to bow in deference
As hope forever abides.




- Sadhana .
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सागर ... मेरे दोस्त .
                       
सागर .......
तुम्हे याद है
हमारा मिलना पहली बार,
जब मै इत्ता सारा पानी देख
चिपक गयी थी
पापा के पैरों से
और पीछे क़दमों से चलते
कस कर आँखे बंद किये
ही तुमसे मिल पाई थी...


तुम्हारी उफनती गरजती उत्ताप लहरें
सब समेटने को आतुर
बहाने को तत्पर
बहुत दिनों तक डर लगता रहा
तुम मुझे ले जाना चाहते हो
कई रातों की नींद में तुम पीछा करते रहे
और एक दिन डरते डरते ही सही,
तुमसे दोस्ती हो गयी...


तुम बसने लगे शरीर के किसी उजाड़ कोने में
उफनते रहे मेरे अन्दर
पतीले के दूध की तरह
कभी अपनी कोर ना लांघी
तुम देते रहे सन्देश
हद से बढ़ना तूफ़ान ही लाता है,
और ये भी कि ज्वार भाटा के दिन तय होते हैं...
एक सीमा में रह कर
तुमने नदियों को गले लगाया
सोख ली उनकी मिठास
और खुद को खारा बनाया
सबकी सुनी पर दर्द किसी को ना बताया.


तुम्हारे किनारे आ
सारे शोर थम जाते है
तुम्हारी लहरे जब तट पर बुलबुलों में बदलती
तो सिखा जाती जीवन का सच
कितना छोटा हो सकता है जीवन,
और ये, कि
कई छोटी छोटी लहरें मिल कर
सहमा सकती है किसी को,
ये भी कि लगातार आघात
चट्टानों को छील कर चिकना कर सकते हैं
और
हारना हल नहीं
हिस्सा है
जीने के अभ्यास का....
       
           - राजलक्ष्मी शर्मा.
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ज़िद.



मौज का साहिल से रह रह के टकरा जाना 
ज़ब्त किसमें है ... यह होड़ लगी हो जैसे 
ये है दीवानगी लहरों की ... या बेरुखी साहिल की ...
दोनों के जिस्म तार तार ... रूहें छलनी हों जैसे ...
चोट ऐसी जो एक उम्र तक दिखाई दे 
टुकड़ों टुकड़ों में हर सिम्त बही हो जैसे ...
फिर भी मौजें हैं कि दीवानावार साहिल से 
अब भी टकराती हैं ...टकरा के पलट जाती हैं ...
इश्क का यह भी एक अंदाज़े बयां देखा है,
चोट पहुँचाना जैसे 
शर्ते आशनाई हो .


           - सरस.
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तूफान लग रहा है समन्दर में आयेगा।


साहिल भी अब कहाँ ये लहर रोक पायेगा, 
तूफान लग रहा है समन्दर में आयेगा

हमको वफा की राह में वो ज़िल्लतें मिली,
नामे वफा से दिल भी मेरा खौफ खायेगा।

उम्मीदें मंजिलों की सभी टूट जाएँगी,
रिश्तों का गर सफीना मेरा डूब जायेगा.

मेरी ये जिसके नाम पे दुनिया उजड़ गयी,
मुझको न थी खबर वो मेरा दिल जलाएगा.

कर के खुदा पे आज यकीं चल तो नाखुदा,
टूटा जो तेरा हौसला वो पार लायेगा


बाज़ू ओ पंख काटके उड़ने का इशारा,
'ताइर' ये ज़माना तुझे कितना सतायेगा।



                      - इमरान खान ' ताइर '.       

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नाजायज़ .


तमाम रात समंदर पे  इश्क़ तारी था 
तमाम रात बोसों की आवाज आती रही 
तमाम रात समंदर ने बदन सहलाया   
तमाम रात साहिल ने उससे बात न की

सुबह जाके  कहीं  इश्क़ का  जुनून उतरा 
और मुंह धोया तो समंदर को ये एहसास हुआ 
थोड़ी सी रेत सिला रात भर की मेहनत का!
अब इसे कौन से साहिल की गोद में डालूँ?
             - पुष्पेन्द्र वीर साहिल.

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सागर.
                   


बूंदे टप-टप 

  बादल घम-घम


     नदिया कल-कल 


        सागर-घर



महका मौसम


    सूरज मद्धम 


       दिन रंगीला


           सागर नीला



ढलती शामें 


     चंदा थामें 


         तट रेतीला 


            सागर गीला 



सीपी-मोती


    आशा-ज्योति 


       लहरें छाया-


           सागर काया



डूबी आँखें 


   यादें बाटें


      नींदें हारा


         सागर खारा



बात पुरानी


     वही कहानी


          प्यासा-सहरा


              सागर-गहरा



उम्र खिवैया


   जीवन नैया


       कौन सहारे 


              सागर तारे...



                
                        - प्रीति तिवारी.



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समंदर की धड़कन सुन कर.


समंदर किनारे से रेत के कुछ कण चुन कर 
उलझे भावों के धागों से सपने बुन कर 
चले हम जो कहते हुए लहरों की कहानी 
जुड़ गए कितने पथिक आहटें सुन कर .

आंसुओं का एक समंदर सबके नयनों में समाया 
आती जाती लहरों का संगीत ही चहु ओर छाया 
ऐसे में गूंजता है एक मौन पूरी तन्मयता से 
अभी अभी एक दीप ने मानो अँधेरे को हराया .

जलती हुई लौ का नन्हा प्रकाशवृत्त सबल है 
मझधार का किनारों के प्रति मोह प्रबल है 
बिखरे हैं कितने रेतीले आकार समंदर किनारे 
धाराओं के सान्निध्य में भावनाओं का संसार धवल है .

इस धवल संसार से सुनहरे कुछ मोती चुनकर,
चलो हम सजाएं परिदृश्य एक कविता बुन कर .
निश्चित ही हो जाएगी परिलिक्षित गहन शांति,
लिखेंगे हम ध्यानस्थ समंदर की धड़कन सुन कर .

                          - अनुपमा पाठक .

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                                             निर्मोही .


                                               समुद्र,
क्यूँ इतने निर्मोही तुम
बस हर सुबह शाम
यूँ धीमे पाँव आ के
आँचल भिगो जाते हो
तुम्हारे गीलेपन की खुशबू
कुछ नमकीन सी है
बरसों से बर्फ हुए
जज़्बात जगा जाते हो.

एक दिन मिलना मेरे
उस ताल के पानी से
जिसके निश्छल सतह पे
हुआ अरसा प्रतिबिम्ब देखे
बचपन के रूठने मनाने
से जवानी के अरमानों तक
हर कहानी है समायी उसमें
हर दुआ के अंजाम तलक.

सच कहती हूँ उसकी
गहरायी में जो मिठास है
खारापन ले के तुम्हारा
कैद कर लेगी आगोश में
जाओ मिलो उससे जाकर,
वही जल तुम - वही वो 
उसका मोह तो न छूटे कभी
और तुमसे प्यार ही न हो

                                                             - साधना .   
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नए चेहरे में इस बार स्वागत करते हैं अंजनी कुमार जी का और पढ़ते हैं उनकी लिखी एक खूबसूरत सी ग़ज़ल -

मैं ठहरा अदना सा एक दरिया...



मैं ठहरा अदना सा एक दरिया, तू है समंदर कहाँ पता था 
हुए कभी हमकिनार तो तुम चले हमें दरकिनार करके .


तू इतना गहरा, कि दिल में तेरे है क्या मुझे ये कहाँ खबर थी 
मैं तेरी जानिब निकल पड़ा था, तमाम अड़चन को पार करके .


मिलोगे कैसे कि जब हमारा नसीब खानाबदोश राहें ,
अधूरी हसरत मचल रहीं हैं हमारे दिल में गुबार बनके .


नहीं है मुमकिन तेरे लिए भी तटों की चौखट को लांघ पाना 
तभी तो उठती है बेक़रारी ये तेरे सीने में ज्वार बन के .


                     - अंजनी कुमार.
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नदी तुम सागर बनोगी .


याद है तुमको ?
वो ऊंची हिमाच्छादित चोटियाँ 
जिनसे निकल,
पर्वतों की तीव्र ढालों पर 
दूधिया, फेनिल हंसी में खिलखिलाती 
राह अपनी खुद बनाती, 
चल पड़ी थीं तुम.
किनारों पर खड़े वो देवदार 
तुमको हँसता देखते 
तो मुस्कुराते थे.


याद है तुमको ?
वो पहला शिशु झरना 
तुमसे आ कर जुड़ गया था जो... 
फिर न जाने 
कई स्रोते, कई नाले, कई झरने
तुमसे आ कर जुड़ रहे थे,
संग तुम्हारे 
वो भी आगे बढ़ रहे थे.

तुम हरेक चट्टान से टकरा रही थीं, 
पर्वतों को काटती,
एक उत्सुक वेग से जैसे हुलसती
और उफनती, 
बही जाती... 

तुम कभी रूकती नहीं थीं,
चाह कर भी रुक नहीं सकती थीं शायद ...
सत्य यह है .


बढ़ रही थी शनै: शनै:
अब तुम्हारी धार, 
फैलता ही जा रहा था 
कूल का विस्तार,
और अब तुम बह रही थीं शांत, 
सुनती 
अपने ऊपर तैरती नावों के चप्पू ,
एक निस्पृह भाव से स्वीकारतीं 
स्नेह श्रद्धा से समर्पित फूल 
और सब कीच कालिख भी .
एक गहरी वेदना महसूसतीं
प्यासी धरा के लिए 
और सामर्थ्य भर 
उसकी बुझातीं प्यास,
अपनी प्यास को उर में छिपाए ....



नदी क्या तुम थक गयी हो ?
धूप में जलते हुए,
चलते हुए 
सैकड़ों झरने समेटे...
सोचती हो  
क्यूँ कहीं कोई नहीं तुमको समेटे जो ?
जहाँ विश्राम कर पाओ 
जहाँ ठहराव हो,
जिसके परे फिर ना कोई भटकाव हो . 


धैर्य मत खोना 
तुम्हारी यात्रा का अंत होगा ...
वहां देखो... 

अनगिनत लहरें सम्हाले , 
अनगिनत मोती छुपाये 
ह्रदय की गहराईयों में, 
थामने तुमको अकल्पित प्यार में 
नील सागर खड़ा है अपने अगाध विस्तार में 
सौंप देना स्वयं को .
न जाने कितनी धाराएं 
समाहित हो के सागर बन चुकी हैं 
तुम भी उस में डूब जाना 
और उसकी थाह में विश्राम पाना.


नदी जब सागर बनोगी, 
देखना 
तुम भी ना तब प्यासी रहोगी.


              - मीता.
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For Master's Category, in this issue we are bringing this very well known poem by famous American poet Walt Whitman that speaks of immortality of love where even death can not separate the souls that love truly.

                                     1
Out of the rolling ocean, the crowd, came a drop gently to me,
Whispering, I love you, before long I die,
I have travel’d a long way, merely to look on you, to touch you,
For I could not die till I once look’d on you,
For I fear’d I might afterward lose you.



                                   2
(Now we have met, we have look’d, we are safe;
Return in peace to the ocean, my love;
I too am part of that ocean, my love—we are not so much separated;
Behold the great rondure—the cohesion of all, how perfect!
But as for me, for you, the irresistible sea is to separate us,
As for an hour, carrying us diverse—yet cannot carry us diverse for ever;
Be not impatient—a little space—Know you, I salute the air, the ocean and the
land,
Every day, at sundown, for your dear sake, my love.)
                            Walt Whitman .
________________________________________________________

 आज हम आप के लिए लाये हैं एक गहरी और दिल छू लेने वाली ग़ज़ल जगजीत सिंह जी की आवाज़ में -
 सुनते हैं सरगम में ' ऐ खुदा रेत के सेहरा को समंदर कर दे '.  
  


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6 टिप्‍पणियां:

ख़ुर्शीद हयात ने कहा…

चिरंतन का यह अंक जिंदगी - रंग , सोच समंदर लहरों का एक खूबसूरत इस्तेयारा / प्रतीक है . बधाई आप को .अभी मैं आप सब की कविताओं की लहरों में खुद को उभरता तो कभी डूबता महसूस कर रहा हूँ ... डूबने उभरने की प्रक्रिया से गुज़रने के बाद तफ़सीली गुफ़्तुगु बहुत जल्द ....ख़ुर्शीद ह्यात

Vinay Mehta ने कहा…

उफनते जज्बातों की झड़ी सी लग आयी है ...
बूंद बूंद बन इस समंदर में समाई है ....

बहुत सुंदर प्रस्तुति ..


बधाई ..........

Reena Pant ने कहा…

baht sunder racnaon ka sankalan,

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

खुर्शीद जी, विनय जी, रीना जी, सराहने के लिए आप सभी का धन्यवाद !

अनुपमा पाठक ने कहा…

बेहद सुन्दर रचनाओं के बीच मेरे प्रयास को भी स्थान देने के लिए चिरंतन का आभार!

संजय भास्कर ने कहा…

bahut khoobsurt
mahnat safal hui aapki

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