मंगलवार, 10 जुलाई 2012

बचपन / Those were the days...


बचपन. जिसे बार-बार याद तो किया जा सकता है पर बार-बार जिया नहीं जा सकता.
सच कहें तो बार-बार याद किया नहीं जा सकता, बल्कि याद करना पड़ता है. या यूँ कहें कि अपने आप याद आता रहता है. ये उम्र का ऐसा हिस्सा है जिसे हमने अपने मां-बाप की छाती और काँधे के सहारे लगे बेफिक्री से जिया है. शायद बेफिक्री का वो एहसास ही बचपन को ख़ास बनाता है. 
बचपन का भोलापन, तोतली जुबान,  तमाम खिलौने छोड़ कर लकड़ी और ढेले के खेल, साढ़े सत्रह लाख सवाल (और मां के पास उन सबके जवाब!) ...
बचपन की बात हो तो मां का जिक्र छिड़ना लाजिमी है क्योंकि बचपन की यादों में मां के आँचल की ठंडक और हिफाजत का एहसास, दोनों घुले-मिले रहते हैं.
बचपन की बात हो तो ख़याल करीने से लगा कर नहीं रखे जा सकते, यहाँ सब आपस में गड्ड-मड्ड है. इसलिए तरतीब से लिखना भी मुश्किल है बचपन के बारे में. खैर छोडिये, और बहुत कुछ है इस बार चिरंतन के अंक में बचपने से भरा हुआ - जो आप को आवाज लगा रहा है.
                            - पुष्पेन्द्र वीर साहिल.
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मेरा नया बचपन.

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥

दिल में एक चुभन-सी भी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

मैंने पूछा 'यह क्या लायी?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'॥

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥

            - सुभद्रा कुमारी चौहान.
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यह बच्चा कैसा बच्चा है 

यह बच्चा कैसा बच्चा है 
यह बच्चा काला-काला-सा
यह काला-सा, मटियाला-सा
यह बच्चा भूखा-भूखा-सा
यह बच्चा सूखा-सूखा-सा
यह बच्चा किसका बच्चा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है
जो रेत पर तन्हा बैठा है
ना इसके पेट में रोटी है
ना इसके तन पर कपड़ा है
ना इसके सर पर टोपी है
ना इसके पैर में जूता है
ना इसके पास खिलौना है
कोई भालू है कोई घोड़ा है
ना इसका जी बहलाने को
कोई लोरी है कोई झूला है
ना इसकी जेब में धेला है
ना इसके हाथ में पैसा है
ना इसके अम्मी-अब्बू हैं
ना इसकी आपा-खाला है
यह सारे जग में तन्हा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है

2.

यह सहरा कैसा सहरा है
ना इस सहरा में बादल है
ना इस सहरा में बरखा है
ना इस सहरा में बाली है
ना इस सहरा में खोशा है
ना इस सहरा में सब्ज़ा है
ना इस सहरा में साया है

यह सहरा भूख का सहरा है
यह सहरा मौत का सहरा है

3.

यह बच्चा कैसे बैठा है
यह बच्चा कब से बैठा है
यह बच्चा क्या कुछ पूछता है
यह बच्चा क्या कुछ कहता है
यह दुनिया कैसी दुनिया है
यह दुनिया किसकी दुनिया है

4.

इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में
कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है
कहीं बादल घिर-घिर आते हैं
कहीं चश्मा है कहीं दरिया है
कहीं ऊँचे महल अटरिया हैं
कहीं महफ़िल है, कहीं मेला है
कहीं कपड़ों के बाज़ार सजे
यह रेशम है, यह दीबा है
कहीं गल्ले के अम्बार लगे
सब गेहूँ धान मुहय्या है
कहीं दौलत के सन्दूक़ भरे
हाँ ताम्बा, सोना, रूपा है
तुम जो माँगो सो हाज़िर है
तुम जो चाहो सो मिलता है
इस भूख के दुख की दुनिया में
यह कैसा सुख का सपना है ?
वो किस धरती के टुकड़े हैं ?
यह किस दुनिया का हिस्सा है ?

5.

हम जिस आदम के बेटे हैं
यह उस आदम का बेटा है
यह आदम एक ही आदम है
वह गोरा है या काला है
यह धरती एक ही धरती है
यह दुनिया एक ही दुनिया है
सब इक दाता के बन्दे हैं
सब बन्दों का इक दाता है
कुछ पूरब-पच्छिम फ़र्क़ नहीं
इस धरती पर हक़ सबका है

6.

यह तन्हा बच्चा बेचारा
यह बच्चा जो यहाँ बैठा है
इस बच्चे की कहीं भूख मिटे
{क्या मुश्किल है, हो सकता है)
इस बच्चे को कहीं दूध मिले
(हाँ दूध यहाँ बहुतेरा है)
इस बच्चे का कोई तन ढाँके
(क्या कपड़ों का यहाँ तोड़ा[3] है ?)
इस बच्चे को कोई गोद में ले
(इन्सान जो अब तक ज़िन्दा है)
फिर देखिए कैसा बच्चा है
यह कितना प्यारा बच्चा है

7.

इस जग में सब कुछ रब का है
जो रब का है, वह सबका है
सब अपने हैं कोई ग़ैर नहीं
हर चीज़ में सबका साझा है
जो बढ़ता है, जो उगता है
वह दाना है, या मेवा है
जो कपड़ा है, जो कम्बल है
जो चाँदी है, जो सोना है
वह सारा है इस बच्चे का 
जो तेरा है, जो मेरा है

यह बच्चा किसका बच्चा है ?
यह बच्चा सबका बच्चा है

-इब्ने इंशा

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सूरत भोली बचपन में...

सूरत भोली बचपन में,
मीठी बोली बचपन में.
छूना तितली बचपन में,
आँख-मिचोली बचपन में,
मज़े की टोली बचपन में,
हंसी ठिठोली बचपन में.

सूरत भोली बचपन में
मीठी बोली बचपन में.

पीपल चश्मा लट्टू फिरकी,
कंचे बालू कागज़ किश्ती,
हर-दम करते धक्का-मुक्की,
रहती थी बस मस्ती मस्ती
डंडा डोली बचपन में,
रुत अलबेली बचपन में,

सूरत भोली बचपन में
मीठी बोली बचपन में.

बाग़ बगीचे आम के नीचे,
माली भागे पीछे पीछे,
कंकर धेले चप्पल जूते,
ऊपर फेंके जामुन नीचे,
सखा सहेली बचपन में,
थे हमजोली बचपन में.

सूरत भोली बचपन में,
मीठी बोली बचपन में.

चाट समोसे चूरन गुल्ले,
हरदम खाते फिर भी फूले,
खुदी पकायें हांड़ी चावल,
खुदी बनायें छोटे चूल्हे,
मीठी गोली बचपन में,
भरी थी झोली बचपन में,

सूरत भोली बचपन में,
मीठी बोली बचपन में.

          - इमरान खान 'ताईर'.
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बचपन... :)


तितलियों के पीछे भागते देख नन्ही को 
मन कितने पीछे दौड़ जाता है...
मुझे मेरा बचपन याद आता है। 

कितनी शैतानी, कितने उधम 
सारा दिन बदमाशी, और कूदें नाचे हम 
मम्मा का नाराज़ होना, पापा का डपटना 
मनमानी करना ढेर सी 
और किसी की ना सुनना 
हार कर माँ कहती "ये इतवार क्यों आता है!
सारी मुसीबतें ये छुट्टी का दिन लाता है."

लगता था माँ हमे प्यार नहीं करती 
इसीलिए इतवार का इंतजार नहीं करती 
अब मै माँ हूँ,वही माँ का कहा दोहराती हूँ। 
माँ से शिकायत थी, पर माँ जैसी बन जाती हूँ।
जैसे ही माँ याद आये, मन मुस्काता है 
मुझे मेरा बचपन याद आता है। 

          - राजलक्ष्मी शर्मा .
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Childhood.


Childhood, sweet and sunny childhood,
With its careless, thoughtless air,
Like the verdant, tangled wildwood,
Wants the training hand of care.

See it springing all around us --
Glad to know, and quick to learn;
Asking questions that confound us;
Teaching lessons in its turn.

Who loves not its joyous revel,
Leaping lightly on the lawn,
Up the knoll, along the level,
Free and graceful as a fawn?

Let it revel; it is nature
Giving to the little dears
Strength of limb, and healthful features,
For the toil of coming years.

He who checks a child with terror,
Stops its play, and stills its song,
Not alone commits an error,
But a great and moral wrong.

Give it play, and never fear it --
Active life is no defect;
Never, never break its spirit --
Curb it only to direct.

Would you dam the flowing river,
Thinking it would cease to flow?
Onward it must go forever --
Better teach it where to go.

Childhood is a fountain welling,
Trace its channel in the sand,
And its currents, spreading, swelling,
Will revive the withered land.

Childhood is the vernal season;
Trim and train the tender shoot;
Love is to the coming reason,
As the blossom to the fruit.

Tender twigs are bent and folded --
Art to nature beauty lends;
Childhood easily is moulded;
Manhood breaks, but seldom bends. 
                           -David Bates.
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तारे.

मन में मेरे 
रहता है
एक छोटा बच्चा।
कहता है -
"तारे तोडूंगा !"

कितनी बार इसे समझाया
दूर बहुत हैं चाँद सितारे .
उन तक कौन पहुँच पाया है !!
तू पहुंचेगा ?!

मेरी बात समझता है .
थोड़ी देर संभल जाता है .
पल भर मेरी आँख लगी तो 
बस...
कहीं दूर निकल जाता है।

कभी मांगता इन्द्र धनुष है,
कभी धूप, 
कभी तितलियाँ !
और फूल जो दिख जाएँ 
तो कहता है -
"सारे तोडूंगा !"

मन में मेरे 
रहता है
एक छोटा बच्चा।
कहता है -
"तारे तोडूंगा !"

             - मीता .
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सात बरस की बिटिया .

सातवें महीने के सातवें दिन
याद आई वो सात बरस की बिटिया
शायद उस साल ही उस अंक से
कुछ अलग सा लगाव हो गया
याद आया जब माँ रोज कहती थी
सबसे  प्यारी मेरी सात बरस की बिटिया

मैं पांचवां बच्चा , तीसरी लड़की
और बीच में यह सात की गिनती
कुछ माँ के बोलने का वोह तरीका
कि लगे मैं सबसे वांछित बच्चा
एक राजा का बेटा लेकर उड़ने  वाला घोड़ा
गाते पिता ने वो चित्र बना के छोड़ा
कि सच में मैं एक राजकुमारी
हमेशा बन के रही उनकी प्यारी
किसी से समझा कभी न कम अपने को
इतना  आत्मविश्वास दिया उन्होने मुझको

माँ के साथ सिर्फ दो का ही सो सकना
जानते हुए भी रोज रात को झगड़ना
मुझे मनाने के लिए उनका सुझाना
अगली सर्दियाँ एक लिहाफ चौड़ा  बनाना
सब साथ सो सकें उनकी खुशबु के संग
आज कहाँ खो गए वो गर्माहट के रंग

कुछ काम से भागने के लिए
उनकी आवाज अनसुना कर देना
और अपनी कोई पुरानी किताब
में छिपा के कॉमिक्स पढना
सर्दियों की गुनगुनी सी धूप में
लेटे लेटे अखबार पे सो जाना
और गालों पे छपे शब्दों पर
सबके हंसने से गुस्सा हो जाना

कितनी छोटी बातें याद आती हैं
बचपन के नाम से टीस जगा जाती हैं
दिल करता है कोई उस लोक से वापस आये
फिर से सब वो छोटे छोटे काम करवाए
उनकी कही बातें को तब सुन के अनसुना किये
एक मौका फिर से मुझे आज वो मिल जाये

आज फिर कोई गीले गालों को सहलाये
सात बरस की बिटिया हूँ यह बात दोहराए
यादों के उलझे हुऎ से ताने बाने से
रंग बिरंगे ऊन के कुछ गोले बनाये
उनसे फिर एक ऐसा नया चित्र बुनूं मैं
 कि बचपन की वो दुनिया फिर से जी जाये

- साधना .
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बचपन.

वो खो गया है...
दूर हो गया है।

नन्हे नन्हे,
प्यारे प्यारे,
अँधेरी काली रात में
जब टिमटिमाते हैं तारे

तो वहीँ कहीं
झलक अपनी दिखलाता है,
स्मृतियों के आकाश पर
धीरे से आता है,

कितने ही
खेल खिलौने याद दिलाने...
रूठे पलों को
फिर से मनाने।

वो था, तो सपने थे
वो था, तो सब अपने थे

एक मुस्कान ही
जग जीतने को पर्याप्त थी,
खुशियों की चाभी
जो प्राप्त थी।

सुन्दर मनोहर
भोला भाला था मन।
फिर जाने कब
विदा हो गया बचपन !

अब तो बस
तारे टिमटिमाते रहते हैं
यदा-कदा
हम दोहराते रहते हैं-

उसकी महिमा उसका गान
काश! मिल जाए वो किसी शाम

फिर, पूछेंगे उससे
कि क्यूँ नहीं छोड़ गया?
कुछ मासूमियत के रंग...
मिल जाए,
तो सीख लें फिर उससे
जीवन का वो बेपरवाह ढ़ंग...

बोलो बचपन
मिलोगे न?
फिर से हृदय कुञ्ज में
खिलोगे न!

- अनुपमा पाठक .
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हमारे मेहमान में आज हम स्वागत करते हैं सुनीता सनाढ्य पाण्डेय जी का, और आप के साथ साझा करते हैं उनकी यह रचना ...
दोमुंहा बचपन !

कहीं झूलों की पींगें बढाता; 
कहीं थाली की जूठन हटाता ...

कहीं हवा में पतंगें लहराता;
कहीं सड़कों से कचरा उठाता ...

कहीं चमकीली कारों में घूमता; 
कहीं बड़ा बन बच्चे घुमाता ...

कहीं रंग बिरंगी पोशाकों के रंग ढंग निराले;
कहीं तन ढंकने को भी पड़ते हैं लाले ...

कहीं एयर कंडीशंड स्कूलों में बहकता; 
कहीं स्लेट और दरी को तरसता ...

तूने तो बनाये थे एक जैसे ही बच्चे; 
फिर किसने बनाया ये दोमुंहा बचपन !

              - सुनीता सनाढ्य पाण्डेय .
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आत्मकथ्य सा कुछ ....

मुझे मालूम है 
तुम भी नहीं भूले 'भैयु '
वो बरसात में कागज की नाव चलाना
तुम्हे रोता देख अपनी नाव हटाना
'रथ' के मेले के लिए मिली
अठान्नी में से पूरे तीस पैसे
तुम पर खर्च करते 
बड़प्पन का बोध होता था।

स्कूल के रास्ते में चलते चलते
तुम्हारी स्लेट में दस तक के पहाड़े 
कई बार लिखे हैं
शायद किसी रविवार ही
मै तुम बिन सहेलियों के घर गयी
तुम्हे साइकिल सिखाते 
कई बार कोहनियाँ छिल्वाई
कई बार 'टीप -रेस ' खेलते
तुम्हारे बदले 'दाम ' दिए
देर से आने पर 
'पापा' से छुप कर रात को दरवाजा खोला
कितनी यादों के पाखी है
पन्ने खोलते ही चारों ओर विचरते हैं

आज देखो रहने मिलने और
साथ बैठ कर खाना खाने को
मन बस तरस जाता है
ना रहा मिटटी का चूल्हा
ना मम्मी की रसोई
सब तो पक्का हो गया
जमे हुए मन की तरह


'राखी' और भैयादूज' की नेग के लिए
तुम फ़िर छोटे से हो जाते हो
अपना मनचाहा ले कर ही मानते हो
इसके अलावे भी कभी कभी मिलते हो

सारे दिन जैसे जादूगर की छड़ी से गायब हो गए
कभी ना लौट आने के लिए
सब वही है.
माँ,पापा, दीदी, तुम और छुटकी भी
बस नहीं है 
तो वो निश्छल बचपन
आखिर हम बड़े ही क्यों हुए ...

          - राजलक्ष्मी शर्मा .

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खामियाजा .


बड़े होने के बहुत से खामियाज़े हैं,
मसलन
ख़तम हो जाना उस बेफिक्री का 
जब आप जानते हों 
कि कोई और 
सब सम्हाल लेगा...
चाहे न चाहे 
सर पर आ बैठना जिम्मेदारियों का,
वक़्त की बंदिशें,  
उम्मीद के नर्म पैरों को 
काटती, रगडती  
कायदों की कड़ी ठंडी जंजीरें ...

कब जाने 
जाड़ों की कुनकुनी धूप जैसे दिन 
बन जाते हैं 
जेठ की कड़ी दुपहरी।

दर्दनाक होता है  
किन्तु 
मन के अन्दर 
किसी कोने में 
बचपन का जिंदा रह जाना।

जहाँ इतना कुछ 
अनचाहे ही 
छूट जाता है हाथों से ...
वो भी -
जो मुट्ठियों में भींच रखा था, 
वो भी -
जिसे कभी खोना नहीं चाहा था,
पता नहीं फिर 
ये नालायक 
क्यूँ मर खप नहीं जाता !!

अरसे बाद 
ज़िन्दगी ने समझाया 
बड़े होने की 
सबसे पहली शर्त होती है 
बचपन का मर जाना ...

अब भी सड़क किनारे 
मिचमिची आँखों वाले
झबरे कुत्ते को 
गोद में उठा लेता है ...
अब भी 
किसी बच्चे को देख 
बेवजह मुस्कुराने लग पड़ता है,
किसी और को होती तकलीफ में 
उफन पड़ता है 
सारी रिवायतें तोड़ ...

पर क्यूंकि ये मुमकिन नहीं 
कि आप उस दुनिया मे 
बात करें खुशबू की 
जहाँ गुलदानों में 
कागज़ के फूल सजाये जाते हों,
जहाँ स्नेह 
विद्रूप मुस्कानों में परिभाषित होता हो, 
संवेदना 
मौकापरस्ती का दूसरा नाम हो, 
और भावुकता ...
निरा पागलपन !
तो नितांत आवश्यक है 
बड़ा होने के लिए 
बचपन को मार डालना।

आसार दीखते तो हैं 
धीरे धीरे 
अपनी ही मौत मर जायेगा ...
नहीं तो शायद  
किसी तरह घोटना पड़ेगा गला।
आखिर 
पत्थरों के इस शहर में 
कब तक कांच का पुराना, 
फ़िज़ूल ...
खिलौना ढोते फिरेंगे !!

सरदर्द हटे... 
बेहतर है, टूट ही जाए। 
बड़े होने का 
एक खामियाजा और सही ...
बचपन पीछे छूट ही जाए।

                - मीता .
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ये पुरानी बातें हैं,
                  जब मैं छोटा बच्चा था। 



आसमान के दामन पे 
   मोतियों की शक्लों में 
     जितने भी सितारे थे 
        एक-एक कर मैंने 
          सबके-सब उतारे थे।
 और बंद हाथों को 
    घर के एक कोने में 
       (जो मुझे डराता था 
          रात के अंधेरों में )
             पहरेदार रक्खा था 
                ये पुरानी बातें हैं
                  जब मैं छोटा बच्चा था। 
घर का कोई भी कोना 
  रात के अँधेरे में 
   अब डरा नहीं सकता 
     क्या हुआ मुझे लेकिन 
       अपने नन्हे बच्चे की 
          मासूम एक ख्वाहिश पे 
            तारे ला नहीं सकता।

अक्ल के अंधेरों ने 
  मुझको ऐसे जकड़ा है 
    चाह कर भी अब मेरा 
      आसमाँ के तारों तक 
        हाथ जा नहीं सकता।
तुम तो हो बड़े पापा 
  क्यूँ ये कर नहीं सकते ?
    गोल गोल आँखें कर 
      उसने मुझसे पूछा है 
        साथ उम्र बढ़ने के 
          होश के असर में यूँ 
            आदमी क्यूँ अपने ही 
              दायरों में जीता है -
                ये बता नहीं सकता।
ये बता नहीं सकता।

          - पुष्पेन्द्र वीर साहिल. 

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This ode reflects the glorification of childhood, belief in the immortality of the human soul, transmigration of soul from one world to another and the influence of worldly experiences or earthly pleasures. It deals philosophically the gradual loss of innocence, purity and sublimity of childhood and the advance of years. It also brings out the sweet benediction of the philosophic mind and lastly the sights and sounds of nature. The poet shows his passion for the company of nature, his contemplative mind and his great faith in the sacredness of the human soul. We find in this ode more of Wordsworth as a philosopher than as a poet. For the Master's Category , we present 'The Immortality Ode' by William Wordsworth, which is rendered as his greatest masterpiece by modern critics .



Intimations of Immortality From Recollections of Early Childhood                     
                         - William Wordsworth (1807)


                             I

There was a time when meadow, grove, and stream,
 The earth, and every common sight,
            To me did seem
      Apparelled in celestial light,
The glory and the freshness of a dream.
 It is not now as it hath been of yore;--
          Turn wheresoe’er I may,
               By night or day,
       The things which I have seen
             I now can see no more.

                            II

          The Rainbow comes and goes,
             And lovely is the Rose,
          The Moon doth with delight
   Look round her when the heavens are bare,
          Waters on a starry night
            Are beautiful and fair;
      The sunshine is a glorious birth;
        But yet I know, where’er I go,
That there hath past away a glory from the earth.

                            III

Now, while the birds thus sing a joyous song,
      And while the young lambs bound
              As to the tabor’s sound,
To me alone there came a thought of grief:
A timely utterance gave that thought relief,
              And I again am strong:
The cataracts blow their trumpets from the steep;
No more shall grief of mine the season wrong;
I hear the Echoes through the mountains throng,
The Winds come to me from the fields of sleep,
          And all the earth is gay;
               Land and sea
      Give themselves up to jollity,
           And with the heart of May
      Doth every Beast keep holiday;--
                  Thou Child of Joy,
Shout round me, let me hear thy shouts, thou happy
                    Shepherd-boy!

                             IV

Ye blessed Creatures, I have heard the call
      Ye to each other make; I see
The heavens laugh with you in your jubilee;
      My heart is at your festival,
         My head hath its coronal,
The fulness of your bliss, I feel--I feel it all.
         Oh evil day! if I were sullen
        While Earth herself is adorning,
          This sweet May-morning,
      And the Children are culling
                On every side,
      In a thousand valleys far and wide,
      Fresh flowers; while the sun shines warm,
And the Babe leaps up on his Mother’s arm:--
      I hear, I hear, with joy I hear!
      --But there’s a Tree, of many, one,
A single Field which I have looked upon,
Both of them speak of something that is gone:
            The Pansy at my feet
          Doth the same tale repeat:
Whither is fled the visionary gleam?
Where is it now, the glory and the dream?

                           V

Our birth is but a sleep and a forgetting:
The Soul that rises with us, our life’s Star,
      Hath had elsewhere its setting,
        And cometh from afar:
      Not in entire forgetfulness,
      And not in utter nakedness,
But trailing clouds of glory do we come
      From God, who is our home:
Heaven lies about us in our infancy!
Shades of the prison-house begin to close
      Upon the growing Boy,
But He beholds the light, and whence it flows,
      He sees it in his joy;
The Youth, who daily farther from the east
      Must travel, still is Nature’s Priest,
      And by the vision splendid
      Is on his way attended;
At length the Man perceives it die away,
And fade into the light of common day.

                             VI

Earth fills her lap with pleasures of her own;
Yearnings she hath in her own natural kind,
And, even with something of a Mother’s mind,
              And no unworthy aim,
      The homely Nurse doth all she can
To make her Foster-child, her Inmate Man,
      Forget the glories he hath known,
And that imperial palace whence he came.

                             VII

Behold the Child among his new-born blisses,
      A six years’ Darling of a pigmy size!
See, where ’mid work of his own hand he lies,
Fretted by sallies of his mother’s kisses,
With light upon him from his father’s eyes!
See, at his feet, some little plan or chart,
Some fragment from his dream of human life,
Shaped by himself with newly-learned art;
          A wedding or a festival,
          A mourning or a funeral;
          And this hath now his heart,
          And unto this he frames his song:
          Then will he fit his tongue
To dialogues of business, love, or strife;
           But it will not be long
           Ere this be thrown aside
           And with new joy and pride
The little Actor cons another part;
Filling from time to time his "humorous stage"
With all the Persons, down to palsied Age,
That Life brings with her in her equipage;
          As if his whole vocation
          Were endless imitation.

                          VIII

Thou, whose exterior semblance doth belie
      Thy Soul’s immensity;
Thou best Philosopher, who yet dost keep
Thy heritage, thou Eye among the blind,
That, deaf and silent, read’st the eternal deep,
Haunted for ever by the eternal mind,--
      Mighty Prophet! Seer blest!
      On whom those truths do rest,
Which we are toiling all our lives to find,
In darkness lost, the darkness of the grave;
Thou, over whom thy Immortality
Broods like the Day, a Master o’er a Slave,
A Presence which is not to be put by;
Thou little Child, yet glorious in the might
Of heaven-born freedom on thy being’s height,
Why with such earnest pains dost thou provoke
The years to bring the inevitable yoke,
Thus blindly with thy blessedness at strife?
Full soon thy Soul shall have her earthly freight,
And custom lie upon thee with a weight
Heavy as frost, and deep almost as life!

                         IX

      O joy! that in our embers
      Is something that doth live,
      That nature yet remembers
      What was so fugitive!
The thought of our past years in me doth breed
Perpetual benediction: not indeed
For that which is most worthy to be blest--
Delight and liberty, the simple creed
Of Childhood, whether busy or at rest,
With new-fledged hope still fluttering in his breast:--
      Not for these I raise
      The song of thanks and praise;
   But for those obstinate questionings
   Of sense and outward things,
   Fallings from us, vanishings;
   Blank misgivings of a Creature
Moving about in worlds not realised,
High instincts before which our mortal Nature
Did tremble like a guilty Thing surprised:
      But for those first affections,
      Those shadowy recollections,
   Which, be they what they may,
Are yet the fountain light of all our day,
Are yet a master light of all our seeing;
   Uphold us, cherish, and have power to make
Our noisy years seem moments in the being
Of the eternal Silence: truths that wake,
      To perish never;
Which neither listlessness, nor mad endeavour,
      Nor Man nor Boy,
Nor all that is at enmity with joy,
Can utterly abolish or destroy!
      Hence in a season of calm weather
      Though inland far we be,
Our Souls have sight of that immortal sea
      Which brought us hither,
      Can in a moment travel thither,
And see the Children sport upon the shore,
And hear the mighty waters rolling evermore.

                              X

Then sing, ye Birds, sing, sing a joyous song!
      And let the young Lambs bound
      As to the tabor’s sound!
We in thought will join your throng,
      Ye that pipe and ye that play,
      Ye that through your hearts to-day
      Feel the gladness of the May!
What though the radiance which was once so bright
Be now for ever taken from my sight,
      Though nothing can bring back the hour
Of splendour in the grass, of glory in the flower;
      We will grieve not, rather find
      Strength in what remains behind;
      In the primal sympathy
      Which having been must ever be;
      In the soothing thoughts that spring
      Out of human suffering;
      In the faith that looks through death,
In years that bring the philosophic mind.

                          XI

And O, ye Fountains, Meadows, Hills, and Groves,
Forebode not any severing of our loves!
Yet in my heart of hearts I feel your might;
I only have relinquished one delight
To live beneath your more habitual sway.
I love the Brooks which down their channels fret,
Even more than when I tripped lightly as they;
The innocent brightness of a new-born Day
                  Is lovely yet;
The Clouds that gather round the setting sun
Do take a sober colouring from an eye
That hath kept watch o’er man’s mortality;
Another race hath been, and other palms are won.
Thanks to the human heart by which we live,
Thanks to its tenderness, its joys, and fears,
To me the meanest flower that blows can give
Thoughts that do often lie too deep for tears.


             
                        - William Wordsworth .

____________________________________________________________________

बच्चे मन के सच्चे.

इस बार सरगम में इस से बेहतर प्रस्तुति नहीं हो सकती थी। कहते हैं, हर नन्हे शिशु का जन्म इस बात का पुख्ता सबूत है कि ईश्वर मानव से अभी पूरी तरह हताश नहीं हुआ है। हर बच्चा मानवता के लिए उम्मीद की एक नयी कोंपल है। ये मीठा सा गीत बचपन के नाम ...

2 टिप्‍पणियां:

अनुपमा पाठक ने कहा…

Beautiful Presentation!!!
Going through the issue was wonderful:)

Vinay Mehta ने कहा…

बचपन की यादे और उनमे डूबना बड़ा ही सुखद विषय लिए चिरंतन ने सारी परतों से धुल को झाड़ के खुद को खुद के समक्ष ला खड़ा किया है .............. बहुत सुंदर संकलन ............
बचपन को समर्पित मेरे कुछ भाव ........ जिसको मेने पहले भी सभी मित्रों के साथ साँझा किया था ...
आज फिर से आप के समक्ष प्रस्तुत करता हु ...

बचपन खो गया है.....

परतों को खोलोगे तो सब वही पाओगे
जो समेटा था तिनका तिनका
छोटे छोटे वोह सब सपने
जो कभी बुने थे बैठ.. साथ अपने
पतली पख-डंडियों पे.. यु ही उछलते
पकड़ा था जुगनुओं को मुठियों में भींचे
लिए थे जो सपने.. बिना आंख मींचे
झील पे वोह पथरों को उछालना
उनका छल्ले बनना फिर बिखरना
घंटों यु ही रात.. तारों को गिनना
कल की ही तो लगती सी वोह बात है
जिंदगी कैसी पहेली सी किताब है
गुड्डे गुड्डियों के लिए वोह लड़ना
लड़ के भी ..साँझ फिर मिलने को तडपना
कैसा वोह मंजर.. कैसी पहेली
याद आती है.. हर वोह सहेली
जाने कहाँ होंगे सब.. मेरे वोह अपने
बुने जिनके संग, वोह मस्त मीठे से सपने
आजा की बचपन, फिर लौट के आ
मीठे वोह पल फिर आज.. झोली में भर जा
की तरसु हर पल को में.. आज बैठा अकेला
काश पुरवाई में होता .. वापिस जा बहता
लिप्पटती जा आंगन से, बाँहों में भर लेता
बचपन खो गया है , सब ढल सा गया है
परतों में धूल सा वोह जम सा गया है ......
विनय जाने बचपन कही खो सा गया है ...
बचपन ना जाने कहाँ ग़ुम सा गया है ..
ग़ुम सा गया है ...

..... विनय .....

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