मंगलवार, 4 सितंबर 2012

पगडण्डी / The Road Less Travelled .


Roads...Immediately conjures up a long stretch of tarmac...with people travelling both sides on the way to somewhere which they can't fathom most of the time . Then what is it that makes us leave these well known roads and venture into lanes and bylanes ? Sometimes the memory of a hurt , sometimes a zing of laughter that rang out in another life, or may be it is just a need to slow down and think ...is there another way to reach where the road carries us ?
     A way in which we have time to turn the pebbles that are strewn on the lanes and reminisce on an old memory ? Or linger on for a while to gaze upon the fascinating old edifices there ? Or may be come across something which has laid there in wait for us for eons- waiting to be discovered ?
     Whatever the reason , lets meander our way through the lanes and bylanes created in this edition , to share the joy of poetry as it walks through the road less travelled .
     As the song says ...इन रेशमी राहों में , एक राह तो वो होगी , तुम तक जो पहुँचती है ...

           - Sadhana .
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पारे की तरह .


तुम्हारे साथ यात्रा करने पर 
छूटी वासना की पगडण्डी 
समझा मैंने 
समझाया तुमने 
सप्तपदी की तरह सात बरस 
मीलों फैले रेगिस्तान में 
जाना मैंने तुमसे 
प्रेम की गर्म रेत में भुनो
प्रेम के असीम तापमान 
में , पारे की तरह बढ़ो 
देह के माया सरोवर से 
तब तोड़ पाओगे 
" प्रेम कमल ".

          - दिनेश द्विवेदी . 

(  कविता संग्रह 'पारे की तरह' से )

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सब ठीक है .

हमारे मेहमान में प्रस्तुत है संगीता गुप्ता जी की ये कविता . संगीता जी के कई काव्य संग्रह ' अंतस से ', ' इस पार उस पार ', ' समुद्र से लौटती नदी ', '   प्रतिनाद ' और एक उपन्यास ' नागफनी के जंगल ' छप  चुके हैं . वे एक प्रतिभावान चित्रकार भी हैं और देश विदेश में एकल चित्र प्रदर्शनियां दे चुकी हैं .
सम्प्रति - आयकर आयुक्त , भारत सरकार , नयी दिल्ली .


अलग अलग पगडंडियों पर 
चलते हुए भी 
पहुंचना तो एक ही जगह है 
हमसफ़र , हमक़दम , हमराज़ 
नहीं न सही 
अब फर्क भी कहाँ पड़ता 
सब ठीक है 
ऐसा ही होना था 
शिकायत करने की इच्छा भी 
कहाँ बची 
जीवन से .

 - संगीता गुप्ता .

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समानांतर ...


बड़े बड़े रास्तों की चमक   
अक्सर सहमा देती है मुझे .

तेज रौशनी और गाड़ियों का शोर 
मशीन से चलते मानव वृन्द
मै चुन लेती हूँ स्वभाव के अनुरूप 
एक अपनेपन से भीगी छोटी पगडण्डी ...

जहाँ पीली सी धूल 
मेरे पाँव पखारती है ...
नन्ही नन्ही वनस्पतियाँ 
मेरे पथ बुहारती हैं ...
कोई भूला हुआ गीत 
मेरे साथ गुनगुनाती है .

अल्हड सी राहें .
बेतरतीब सी दिखती हैं ...
पर हर गुजरी यादों को 
कितना संजो कर रखती हैं .
पहले राहगीर से लेकर ,
आज तक चले 
सारे क़दमों का हिसाब ले 
उस बड़ी चौड़ी पक्की सड़क के समानांतर
धीरे धीरे आगे सरकती है .

            - राजलक्ष्मी शर्मा .

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अनिर्णय: शब्‍द तो कुली हैं .

अलग-अलग आँखों का
अलग-अलग सुख-सपना,
किसको मैं बन्द रखूँ
किसको मैं खोलूँ?


अलग-अलग पर्दों के
अलग-अलग कान हैं,
इधर फुसफुसा दूँ मैं
या उधर बोलूँ?


अलग-अलग हाथों में
अलग-अलग पलड़े हैं,
इस पर बिठाऊँ तुम्हें
या उस पर तौलूँ?


- सरोज कुमार .

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जहाँ से चले थे ...

आज गाँव जाने  वाली इस पगडंडी  पर 
अकेले खड़ी हूँ ...

याद आता है जब इसकी दहलीज पार कर 
निकली थी 
यही पगडण्डी थी 
जो शहर को जाने वाली बस तक 
खींच गयी थी मेरे साथ,
और कोई नहीं था।

बमुश्किल 
हाथ छुड़ा कर 
सारे सपने बटोर कर 
बैठ गयी थी शहर ले जाने वाली 
उस गाड़ी  में ..

रात जब नींद नहीं आती थी 
ख्यालों में आती थी यही पगडण्डी 
और विपरीत से मौसम में 
उठ खड़े होने का साहस देती थी।

आज मैं हूँ फ़िर गाँव के रास्ते 
और स्वागत में वही पगडण्डी 
मेरे सपने पूरे हुए या अधूरे 
इसे नहीं पता 
ये आतुर है 
किसी ''माँ' की तरह 
बस स्नेहाशीष बरसाने को 
खुश है ...

मै भी सफ़र के बाद लौट आयी हूँ 
वहीँ ..
जहाँ से जड़ें जुड़ीं हैं .

     - राजलक्ष्मी शर्मा .

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उमसती गर्मियों में .

चटकती दुपहरियों मे
धूल उडाती
बौराई पछुआ के साथ
चले आते हैं
बीते पल.....

सूनी अमराइयां
कास के झुरमुट
गुलेल
एक अल्हड सा बच्चा और कल....

चला आता है
गीत गाता पनघट
चुचुआती पनचक्की
मीलों दूर जाती हुयी
सूनी पगडण्डी
और
रुनझुनाती पायल..

उमसती गर्मियों मे
याद आती है-
जामुनी आँखों वाली एक लड़की
और जेठ के बादल!

- अमित आनंद पाण्डेय .

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पगडंडियाँ .


कई रास्तों से गुज़र लेने के बाद,
फिर ढूँढ़े है मन-
वही पगडंडियाँ
जहां से शुरू किया था सफ़र...

वैसे तो लौट पाना नहीं होता है कभी,
पर लौटना गर मुमकिन भी हो-
तो भी संभव नहीं कि
पगडंडियाँ मिल जायेंगी यथावत...

समय के साथ लुप्त होते अरण्य में,
खो जाती है पगडण्डी भी
बिसर जाते हैं राही भी
विराम ले लेती है जीवन की कहानी भी

चल रहे हैं जिनपर आज,
उन पगडंडियों ने...
मुड़ने से पहले कहा अभी!
चल रही है राह,
जहां तक ले जाए...
तन्मयता से चलते जाओ सभी!

- अनुपमा पाठक .
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ये मेरे खेत की पगडंडी .




खुशियों तक ले आती है ये मेरे खेत की पगडंडी।
कितनी प्यारी प्यारी है ये मेरे खेत की पगडंडी,

मेन सड़क से थोड़ा हटके, वहीं नहर से पीछे को।
जहाँ मील का पत्थर दायें वहीं से मुड़कर आगे को।
आ जाओ तो पाओगे ये मेरे खेत की पगडंडी,
कितनी प्यारी प्यारी है ये मेरे खेत की पगडंडी।

घास लगी है हरी औ कोमल और किनारे पानी है।
गेंहूँ गन्ने और धान की घनी फसल लहराती है,
मेरे दिल को भाती है ये मेरे खेत की पगडंडी,
कितनी प्यारी प्यारी है ये मेरे खेत की पगडण्डी।

आम अमरूद के मीठे फल तुम भूख लगे तो खा लेना,
थक जाओ तो पगडण्डी की घास पे थोड़ा सो लेना।
नर्म नर्म गद्दों सी है ये मेरे खेत की पगडण्डी,
कितनी प्यारी प्यारी है ये मेरे खेत की पगडण्डी।

           - इमरान खान ताइर . 

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कनुप्रिया - आम्र-बौर का गीत .




यह जो मैं कभी-कभी चरम साक्षात्कार के क्षणों में
बिलकुल जड़ और निस्पन्द हो जाती हूँ

इस का मर्म तुम समझते क्यों नहीं मेरे साँवरे!

तुम्हारी जन्म-जन्मान्तर की रहस्य्मयी लीला की
एकान्त संगिनी मैं
इन क्षणों में अकस्मात

तुम से पृथक नहीं हो जाती हूँ मेरे प्राण,
तुम यह क्यों नहीं समझ पाते कि लाज
सिर्फ जिस्म की नहीं होती
मन की भी होती है

एक मधुर भय
एक अनजाना संशय,

एक आग्रह भरा गोपन,
एक निर्व्याख्या वेदना, उदासी,

जो मुझे बार-बार चरम सुख के क्षणों में भी
अभिभूत कर लेती है।


भय, संशय, गोपन, उदासी
ये सभी ढीठ, चंचल, सरचढ़ी सहेलियों की तरह

मुझे घेर लेती हैं,
और मैं कितना चाह कर भी तुम्हारे पास ठीक उसी समय

नहीं पहुँच पाती जब आम्र मंजरियों के नीचे
अपनी बाँसुरी में मेरा नाम भर कर तुम बुलाते हो!


उस दिन तुम उस बौर लदे आम की
झुकी डालियों से टिके कितनी देर मुझे वंशी से टेरते रहे

ढलते सूरज की उदास काँपती किरणें
तुम्हारे माथे मे मोरपंखों

से बेबस विदा माँगने लगीं -
मैं नहीं आयी

गायें कुछ क्षण तुम्हें अपनी भोली आँखों से
मुँह उठाये देखती रहीं और फिर
धीरे-धीरे नन्दगाँव की पगडण्डी पर
बिना तुम्हारे अपने-आप मुड़ गयीं -

मैं नहीं आयी
यमुना के घाट पर
मछुओं ने अपनी नावें बाँध दीं
और कन्धों पर पतवारें रख चले गये -

मैं नहीं आयी
तुम ने वंशी होठों से हटा ली थी
और उदास, मौन, तुम आम्र-वृक्ष की जड़ों से टिक कर
बैठ गये थे

और बैठे रहे, बैठे रहे, बैठे रहे
मैं नहीं आयी, नहीं आयी, नहीं आयी


तुम अन्त में उठे
एक झुकी डाल पर खिला एक बौर तुम ने तोड़ा
और धीरे-धीरे चल दिये
अनमने तुम्हारे पाँव पगडण्डी पर चल रहे थे
पर जानते हो तुम्हारे अनजान में ही तुम्हारी उँगलियाँ
क्या कर रही थीं!

वे उस आम्र मंजरी को चूर-चूर कर
श्यामल वनघासों में बिछी उस माँग-सी उजली पगडण्डी पर
बिखेर रही थीं .....

यह तुमने क्या किया प्रिय!
क्या अपने अनजाने में ही
उस आम के बौर से मेरी क्वाँरी उजली पवित्र माँग
भर रहे थे साँवरे?


      - धर्मवीर भारती .

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पगडंडियाँ 


रास्ते उन के- मंजिलों का पास हो जिनको ... 
रास्ते उन के- जो गिनते हों मील के पत्थर ...
रास्ते उन के- जिन्हें इसकी ख़बर होती हो 
शहर की कौन सी गली में है उनका घर .

जिन्हें जुनूं हो भटकने का, यों ही शाम ओ सहर ...
जिन्हें उनके कदम ले जाते हों क्या जाने कहाँ ...
जिन्हें मंजिल से भी ज्यादा हसीं लगता हो सफ़र ...
उन चंद सरफिरों के वास्ते - पगडंडियाँ .

              - मीता .
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ये डरी डरी सी पगडण्डी ...

ये डरी डरी सी पगडण्डी,
इन खेतों में अनजानी सी,

निकली है राह बनाने को,
इक ठौर यहीं इक ठौर कहीं।

नदिया सी दिखती ये बहती,
पर नहीं कहीं मिट जाने को,

ये राह है ढूंढें बड़ी राह,
और भटकों को घर लाने को।

मिट्टी में लिपटी धूल धूल,
उबड़ खाबड़ दुबले तन सी,

बस आशाएं लेकर चलती,
बल रखती है अपनी माँ सी।

अपने हों या हों अनजानें,
आते हों या फिर हों जाते,

घर के चौबारों से निकले,
ये ढोती स्वप्न हजारों की,

फिर भी डरती सी पगडण्डी,
अपनी सी लगती पगडण्डी।

               आभार - आशीष .
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देह के उपसर्ग हैं कुछ .


देह तो 
एक नैसर्गिक 
सुगंध 
अनुपम गंध 
एक शीतल आग 
एक आवारा हवा 
एक अनाम रागिनी 
एक सम्पूर्ण पूजा 
एक मीठा विष 
एक कड़वा अमृत 
एक कंकरीला मार्ग 
एक रेशमी पगडण्डी 
भोग की स्याही से लिखी 
योग की एक दिव्य व्याख्या .

            - दिनेश द्विवेदी .

पुस्तक संग्रह ' देह के उपसर्ग हैं कुछ ' से
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छोटी छोटी पगडंडियाँ



खुशियों के ...
सारे बड़े रास्तों पर 
पहरा था ना तुम्हारा
देखो मैंने 
छोटी छोटी 
पगडंडियाँ बना ली 
उन तक पहुचने की .

           - राजलक्ष्मी शर्मा .
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पगडण्डी में ...

पगडण्डी में मुझे भटकता वक़्त मिला,
जैसे मंदिर में कोई अज्ञानी भक्त मिला।

वही हौंसला जिससे थी परवाज़ कभी,
टूटा-फूटा फिर मुझको निःशक्त मिला।

दिल ने तो बस गीत,ग़ज़ल और शेर चुने,
बाकी तो ख़ुद में सब विरक्त मिला।

कई सिरफिरे अफ़साने भी लिख बैठे,
अफ़सानों के पीछे उबला रक्त मिला।

वो जिसपे कुछ उम्मीदें थीं ‘अनमोल’,
दुनिया के उन्माद में आसक्त मिला।।

- करीम पठान ‘अनमोल’.

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धीमी मौत .


जो बन जाते हैं आदत के गुलाम 
चलते रहते हैं हर रोज़ 
उन्हीं पगडंडियों पर 
बदलती नहीं जिनकी कभी रफ़्तार 
जो अपने कपड़ों के रंग बदलने 
का जोखिम नहीं उठाते 
और बात नहीं करते अनजान लोगों से 
वे मरते हैं धीमी मौत .

जो रहते हैं दूर आवेगों से 
भाती है जिन्हें स्याही , उजाले से ज्यादा 
जिनका " मैं " बेदखल कर देता है 
उन भावनाओं को ,
जो चमक भरती हैं तुम्हारी आँखों में 
उबासियों को मुस्कान में बदल देती हैं 
गलतियों और दुखों से उबारती हैं ह्रदय को 
वे मरते हैं धीमी मौत .

जो उलट पुलट नहीं देते सब कुछ 
जब काम हो जाये बोझल और उबाऊ 
किसी सपने के पीछे भागने की खातिर 
चल नहीं पड़ते अनजान राहों पर 
जो ज़िन्दगी में कभी एक बार भी 
समझदारी भरी सलाह से बच कर भागते नहीं 
वे मरते हैं धीमी मौत .

जो निकलते नहीं यात्राओं पर 
जो पढ़ते नहीं , नहीं सुनते संगीत 
ढूंढ नहीं पाते अपने भीतर की लय 
वे मरते हैं धीमी मौत .

जो ख़त्म कर डालते हैं खुद अपने प्रेम को 
थामते नहीं मदद के लिये बढे हाथ 
जिनके दिन बीतते हैं अपनी बदकिस्मती -
या कभी न रुकने वाली बारिशों की शिकायतों में 
वे मरते हैं धीमी मौत .

जो कोई परियोजना शुरू करने से पहले ही 
छोड़ जाते हैं , अपरिचित विषयों के बारे में 
पूछते नहीं सवाल , और चुप रहते हैं 
उन चीज़ों के बारे में पूछने पर 
जिन्हें वे जानते हैं 
वे मरते हैं धीमी मौत .

किश्तों में मरते चले जाने से बचना है 
तो याद रखना होगा हमेशा 
कि जिंदा रहने के लिए -
काफी नहीं बस सांस लेते रहना  
कि एक प्रज्ज्वल धैर्य ले जायेगा हमें 
एक ज्वाज्वल्यमान सुख की पगडण्डी की ओर .
                
                    - पाब्लो नेरुदा .

          प्रस्तोता - दिनेश द्विवेदी .   
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The Road Not Taken...




Two roads diverged in a yellow wood,
And sorry I could not travel both
And be one traveler, long I stood
And looked down one as far as I could
To where it bent in the undergrowth;

Then took the other, as just as fair,
And having perhaps the better claim
Because it was grassy and wanted wear,
Though as for that the passing there
Had worn them really about the same,

And both that morning equally lay
In leaves no step had trodden black.
Oh, I marked the first for another day!
Yet knowing how way leads on to way
I doubted if I should ever come back.

I shall be telling this with a sigh
Somewhere ages and ages hence:
Two roads diverged in a wood, and I,
I took the one less travelled by,
And that has made all the difference .


             
                            - Robert Frost .

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रास्ते ... कुछ जाने हुए से और कुछ अनजाने ... कहाँ लिए जा रहे हैं ...पता नहीं . रास्तों की भी एक चाल होती है ... ये चलनेवाले के क़दम जानते हैं . प्रस्तुत है सरगम में गुलज़ार साब का लिखा , आर . डी . बर्मन जी के संगीत से सजा , लता जी और किशोर कुमार जी की आवाज़ में ये बहुत सुना सुनाया और उतना ही नया लगता सा गीत - ' इस मोड़ से जाते हैं '.

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3 टिप्‍पणियां:

Reena Pant ने कहा…

अरे वाह!इतना सुंदर संकलन.........सबको बधाई और हाँ चिरंतन धन्यवाद् ....इतना कुछ पढवाने के लिए....रचनाकारों को साधुवाद.......

Na ने कहा…

Reena ji , aapka dhayawaad .har issue mein aap ki saraahna hamara sabka hausala badhati hai

रश्मि प्रभा... ने कहा…

http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/10/blog-post_15.html

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