सोमवार, 14 जनवरी 2013

तुझको सोचा है .

तुझको सोचा है
तो अकसर यों हुआ
किसी अलमारी में कपड़ों तले दबी रक्खी
कोई पुरानी एल्बम खुल गयी है ,
तेरी तस्वीर निकल आई है .

तेरा चेहरा , वो धूप सा चेहरा ,
तेरी बातें , वो गुनगुनाती हवा ,
तेरा होना कि मौसम ए बहार का होना .
तेरी तस्वीर का रंग
अब भी धुन्धलाया नहीं है .

वक़्त की सभी हदों से परे ,
जिस्म की सारी सरहदों से परे ,
धडकनों के मुसलसल शोर से दूर ,
दिमाग की तनी नसों से परे ...
अजब सुकून तेरी कुर्बत है .
सोचना तुझको इक इबादत है .

    - मीता .

1 टिप्पणी:

मदन मोहन सक्सेना ने कहा…

बहुत सुंदर ! शुभकामनायें !

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