शुक्रवार, 8 मार्च 2013

प्रेम में डूबी स्त्रियाँ

प्रेम में डूबी स्त्रियाँ
प्रेम पर अक्सर कविता नहीं लिखतीं
दो सौ गजों के मकानों में
भैसों के लिए , जगह नहीं है
सिर्फ इसलिए छूट गयी हैं वे
सान बुहारने और चारा देने से
पर डेरी से दूध
अब भी वही लाती हैं।

प्रेम के प्रतिफलों को
कंघी कर , काजल लगा
स्कूल भेजती हैं और
सोये पति को जगाने से पहले
एक बार आइना देखती हैं
चाय के प्याले , और भीगे होंठों से
सोये पति को जग , उलझा देती हैं
पहले क्या पियें ?

दिन लगा देती हैं
मकान को घर बनाने में
अकेली हों तो औरतें
खाना नहीं बनातीं अपने लिए
घर निपटा
रात को रख देती हैं , लपेट कर
सिन्दूर वाली डिब्बी में और
खुद लिपट जाती हैं , अपने
प्रथम पुरुष से सालों
फैले गृहस्थ के बाद भी
चाहती हैं , बत्ती बंद हो जाये
कंचुकी का आखरी बांध खुलने से
पहले - पहले

ऐसा सुना है मैंने !

- दीपक अरोड़ा .

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...