रविवार, 10 मार्च 2013

कम खुदा न थी परोसने वाली




चार जने बैठे जीमने रात का भोजन
सब बच-बच कर खा रहे
तीनों बच्चे तक समझदार
पीते बीच-बीच में पानी
पिता लेते नकली डकार
माँ थी
सबके बाद खाने वाली .

जिसके लिए दाना नहीं
देगची में बची थी हलचल
चुल्लू भर पानी की
और कटोरदान में
भाप के चन्द्रमा जैसी छाया थी

पर कम खुदा न थी
परोसने वाली
बहुत है अभी इसमें
मैंने तो देर से खाया है
कहते परोसते जाती .

- चंद्रकांत देवताले .

3 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह !

Tushar Raj Rastogi ने कहा…

आपकी यह पोस्ट आज के (०६ मार्च, २०१४) ब्लॉग बुलेटिन -ईश्वरीय ध्यान और मानव पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

meeta ने कहा…

aabhaar .

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