शुक्रवार, 8 मार्च 2013

स्त्री - तुम / The Mystery


फ्रेंच लेखिका और दार्शनिक सीमोन द बोउवार अपनी चर्चित पुस्तक ' द सेकंड सेक्स ' में कहती हैं "स्त्री , पुरुष प्रधान समाज की एक कृति है। वह अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिए स्त्री को जन्म से ही अनेक नियमों के ढाँचे में ढालता गया है।"
 
दुनिया की इस आधी आबादी , अर्थात स्त्री के विषय में पुरुष के भिन्नाभिन्न मत रहे हैं। वह उसकी रचनाशीलता का केंद्रीय स्रोत रही है , उसकी कविता है , उसका बनाया हुआ चित्र है , उसकी संगिनी है , प्रेरणा भी है , उदाहरणार्थ तुलसीदास की पत्नी रत्नावली , कवि कुलगुरु कालिदास की पत्नी विद्योत्तमा , संत कबीर की सहधर्मिणी लोई , चैतन्य महाप्रभु की विष्णुप्रिया। और , क्या सिद्धार्थ के बोधिसत्व में यशोधरा का त्याग उल्लेखनीय नहीं ?

किन्तु , इन सभी स्वरूपों में वह पुरुष के सन्दर्भ में ही परिभाषित होती रही है। उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं दीखता। अरस्तू ने स्त्री को "अपरिपक्व पुरुष "की उपमा दी और उसे सर्वथा पुरुष के अधीन ठहराया है। वहीँ प्लेटो ने स्त्री को शारीरिक रूप से पुरुष के बराबर सामर्थ्यवान न मानते हुए भी , समाज में उसकी भूमिका को स्वीकारा है।

फ़्रांसिसी दार्शनिक स्टेनडाल कहते हैं , "स्त्री विलक्षण बौद्धिकता ले कर जन्मती है , वह समाज के स्वार्थ में ख़त्म हो जाती है।" किर्केगार्द ने नारी को एक जटिल रहस्यमय सृष्टि कहा है।

शेक्सपियर ने लगभग ऐसा ही कुछ कहा है जब वे क्लेओपेट्रा के लिए कहते हैं -
"Age cannot wither her, nor custom stale
Her infinite variety .... she makes hungry
Where most she satisfies; for vilest things
Become themselves in her: ..."

एक अबूझ विरोधाभास , एक अनसुलझा रहस्य , एक अनाम भय ... कि स्त्री जो है , शायद वह नहीं है। यही भय हैमलेट के इन शब्दों में व्यक्त होता है , जब वह बरबस कह उठता है ," Fraility, thy name is woman." और , उसके ये शब्द एक स्त्री विशेष के लिए न रह कर , स्त्री जाति को इंगित करते से प्रतीत होते हैं। 

अल्फ्रेड टेनीसन अपनी कृति यूलेसस में कहते हैं -
" Man for the field and woman for the hearth,
man for the sword and for the needle she, 
man with the head and woman with the heart, 
man to command and women to obey..." 

ये तो रही सामाजिक सीमा , एक मानसिक सीमा इन पंक्तियों में भी है - 
"नारी तुम केवल श्रद्धा हो 
विश्वास रजत नग पग तल में 
पीयूष स्रोत सी बहा करो 
जीवन के सुन्दर समतल में।"
- जयशंकर प्रसाद .

किन्तु , पीयूष स्रोत सा बहने के लिए स्त्री को जीवन का सुन्दर समतल चाहिए। स्त्री अब 'आँचल में दूध और आँखों में पानी' लिए नहीं रहना चाहती है। पाकिस्तानी कवियत्री सारा शागूफ्ता के शब्दों में -
"औरत का बदन ही उस का वतन नहीं होता ,
वह कुछ और भी है ... "
परिवर्तन की धार के साथ बहते हुए वह अपना स्वतंत्र अस्तित्व रच रही है। वह पुरुष के साथ इस यात्रा की सहभागिनी और मित्र बन कर चलना चाहती है अपने पृथक व्यक्तित्व और आत्मसम्मान के साथ।

युवा कवि पवन करण की कुछ पंक्तियाँ यों हैं -
"मेरे भीतर स्त्री का होना मेरे भीतर स्त्री का होना है 
मेरा स्त्री होना नहीं मैं स्त्री होना चाहता हूँ 
मैं सदा के लिए अपने पुरुष होने की तरफ 
कभी न लौटने के लिए स्त्री होना चाहता हूँ 
मैं बस स्त्री हो कर देखने के लिए 
स्त्री नहीं होना चाहता मैं हमेशा के लिए 
स्त्री की देह दिमाग 
दिल और दुनिया होना चाहता हूँ ...."

प्रकृति और पुरुष , एक दूसरे के बिना अपूर्ण , निस्तेज , निस्सार , अव्यक्त हैं। एक दूसरे में विलय हो कर ही पाते हैं दोनों अपना पूर्णत्व। इस सत्य को जानते बूझते भी वे एक दूसरे के आमने - सामने खड़े रहते हैं , एक साथ नहीं।

आज बदलते हुए समय के साथ , स्त्री विषयक कुछ रचनायें , पुरुषों के दृष्टिकोण से , उनकी कलम से प्रस्तुत कर रहे हैं चिरंतन में ...

- मीता .

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इनकी कलम से -
नियति चक्र
समाज की
ठिठुरती ठंढ मे
फूट पड़ते हैं
लड़कियों के फूल
मटियाली
हरी डंडियों पर
कोमल
पीले सरसों के से
कन्या पुष्प,

महकने लगता है
पूरा सीवान
खेत खलिहान
गमक उठते हैं,

आसमान से बरसती ठंढ
और
गहरे कुहासों के बीच
खिलखिलाती
रहती है
लड़कियों की
पौध,

कुछ
नन्हे फूल
रौंद दिए जाते हैं
आवारा जंगली जानवरों के खुर तले
कुछ को मार जाता है
विपत्तियों का पाला,

फिर भी
कुछ फूल
अपनी ही जिद पर
अडिग हो
गदरा जाते हैं
अपनी जड़ों पर उगा लेते हैं
अपने स्वप्न फल!

पर
नियति...
उनके
शेष रहे जिद्दी सपने
देर ही सही
पीस दिए जाते हैं
गृहस्थी के कोल्हू मे...

निकले हुए
तेल से
मंदिर का दीया
जलता है!!

आखिर नियति चक्र
लड़कियों को
बार-बार
"छलता है"
---------- और -----------

कसौटी
कुलच्छिनी / बाँझ
डायन
कलंकिनी

बार बार के आरोप
 प्रत्यारोप

मत लगाओ / लांछन

मुझे
कसौटी पर तब उतारना
"प्रिय पुरुष"

जब तुम खोज लो
कोई और राह

स्वयं को "प्रसवित " करने की!
---------- और -------------

स्त्री

स्त्री!

तुम ................

संबोधनों के पार हो / सरल हो सलिल सी
गूढ़ कविता सी जटिल भी

स्त्री तुम
आरती के दीये का रहस्य हो / अजान हो तुम मगरिब की।

***********

स्त्री !
तुम -भोग्या / चंचला /रमणी
हाँ पर तुम्ही -आराध्या / शक्ति और लक्ष्मी भी

स्त्री !
तुम ही उठो

जाग्रत होवो
निकल आओ आपने आत्म्केंद्रन से

और
बताओ
क्या हो तुम

आकुल सृष्टि आतुर हो तुम्हे व्यक्त होते देखना चाहती है!

(सृष्टि भी स्त्री ही शेष है अब तक )


 - अमित आनंद .
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स्त्री - तुम 
        
          १ .

तुम तोड़ी गयी हो
काटी-छीली गयी हो
घिसी गयी हो बेतरह
तुम्हारी आत्मा छेद दी गयी है ...

यों ही नहीं उमड़ता हवा के झोंकों से
बांसुरी में संगीत .

        २ .

जिस रोज
तुमने सूरज को
आंख मिचमिचा कर देखा ,
और पैरों के नीचे ज़मीन महसूसी ,
उसी रोज़
रास्ता ईजाद हुआ ...
तुम खुद बन गयी मुसाफिर भी , मंजिल भी .

            ३ .

ठण्ड में ठिठुरते शिशु सा
मैं
तुम्हारी गंध में लिपट
तुम्हारी बाहों में सिमट
जाना चाहता हूँ
और ,
तुम्हारे ताप से
चाहता हूँ मिटा देना
आत्मा में कुंडली मारे बैठे शिशिर को .

--------------- और -----------------

     बारिश 

उमड़ती घुमड़ती हो
मुझमें तुम
बरसाती बादलों की तरह
बरस कर
लौट जाने के बाद भी

मेरी मट्टी में से
उठती है
देर तक
सौंधी
तुम्हारी देह गंध
तुम्हारी नेह गंध  .

-  एकलव्य .
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हमारे मेहमान -

जिंदा है अभी औरत .

बावजूद इसके कि
दी गयी अफीम उसे पैदा होते ही
कंठ पर धर दिया अंगूठा बाप ने
दादी और बुआ ने गालियां दीं
माँ को पत्थर जनने की .

नहीं बजी थाली
नहीं गाये गए सौहर के गीत
आ पड़ी बाप की छाती पर
अयाचित मातम सी

बिना किसी घुट्टी , ब्रांडी या दूध के
झेल गयी जाड़े कितने
चढ़ आई बेल सी
बाप की आँखों में काँटों सी गड़ती रही

जली , जला दी गयी
कूद पड़ी कुएं में
भरी जवानी में

फिर भी करामाती ये फीनिक्स
जिंदा है अपनी ही राख से
मौजूद है ये नखलिस्तान
ज़िन्दगी के बियाबान में

खारे तूम्बे सी साँसों को चुभलाते हुए
घीया सुपारी सी
मौजूद रहती है मुंह में
किरच किरच हो कर भी
जिंदा है
हाँ , जिंदा है अभी औरत .

----------- और --------------------

जहाँ जीती है औरत .

वो औरत
जहाँ पैदा हुई
वहां रहती नहीं है
जहाँ रहती है
वहां बहती नहीं है
जहाँ बहती है
वहां ढहती नहीं है
जहाँ ढहती है
वहां कहती नहीं है
जहाँ कहती है
वहां सहती नहीं है
जहाँ सहती है
वहां जीती नहीं है
जहाँ जीती है ...
...  वहां जीती है .

- अश्वनी शर्मा .

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तुम पर प्रेम कविता लिखना इतना आसान 'भी' नहीं .

तुम पर प्रेम कविता लिखना इतना आसान तो नहीं

घटनाक्रम जुड़ता ही नहीं
और शर्त यह कि नहीं हो कोई बात पुरानी
स्वाभाविक बाध्यता कि दुहराव न हो 

तुमपर कविता का प्रारम्भ तुम्हारी हंसी से हो
फिर बात हो तुम्हारी हथेलियों की
इरेज कर दिया जाए तुम्हारी हथेली का शुक्र पर्वत
प्रेम को देह के दायरे से खेंच लूँ सायास
कनिष्ठा के नीचे एक गहरी लकीर खींच दूँ 

कविता में लाया जाए तुम्हारे आंसुओं का बहाव
आँखों के ठीक नीचे एक मिट्टी बाँध जोड़ दूँ
तिर्यक मोड़ से जब जब गुजरे नदी
बात तुम्हारे अल्हडपन की हो
अपने होठों में दबाकर तुम्हारे सीत्कार के शब्द 
कविता में ही हो बात उस अंगडाई की भी 

तुम पर प्रेम कविता लिखना इतना आसान तो नहीं 

इस कविता के मध्य में बादलों की बात हो 
तुम्हारे आँचल की गंध और आवश्यकता से बड़े उस चाँद का बिम्ब हो 
खूब जोर से बहाई जाये ठंडी तेज हवा 
तुम्हारे सिहरने को शब्दों में दर्ज किया जाए 
मध्य में ही लाई जाए तीन तारों की कहानी 
कम्पास से मापकर 
अक्षरों में एक समबाहु त्रिभुज बनाया जाए 
अंगुली के पोर से

अंत नहीं होगा कोई इस कविता का 
अधूरी ही रखी जाये यह पूरी अभिव्यक्ति 
अतृप्त ही रहे तमाम ख्वाहिशें 
लबों का गीलापन वाष्पित न हो 
हवा में तैरने का सिलसिला शब्द जारी रखें 
क्षितिज की नींव पर ढाई पदचिन्ह टांकती रहेगी यह कविता 
फिन्गर्ज़ क्रोस्स्ड !! 

तुम पर प्रेम कविता में करूँगा 
'भी' निपात का खुलकर प्रयोग 
तुम पर प्रेम कविता लिखना इतना आसान 'भी' नहीं .

- शायक आलोक .

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एक कविता 


उस नारी-देह से
अपने मतलब के हिस्से
घर उठा लाया था ,
सिर और पैर
बाहर ही छोड़ आया था !
सिर की जगह एक खाली डिब्बा
और पैरों की जगह पहिये लगाने के बाद
मुझे लगा कि
अब मैं चैन से रह सकता हूँ !
लेकिन गाहे-ब-गाहे सिर की ताक-झाँक ने
मेरी चिंता बढ़ा दी ,
अक्सर पैर चहारदीवारी से बाहर
लटके मिलते !
मैंने खिड़कियाँ बंद कर दी और -
चहारदीवारी ऊंची कर दी !
इस बीच उस नारी-देह ने
एक बच्ची को जन्म दिया ,
मैंने देखा
उसके दो सिर और चार पैर थे !

 - अरुण मिश्रा .

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पत्नी के लिए .

वह आंच नहीं हमारे बीच
जो झुलसा देती है
वह आवेग भी नहीं जो कुछ और नहीं देखता
तुम्हारा प्रेम जलधार जैसा

तुम्हारा प्रेम बरसता है
और कमाल की जैसे खिली हो धूप

तुम्हारा घर
प्रेम के साथ साथ थोड़ी दुनियावी जिम्मेदारियों से बना है
कभी आटे का खाली कनस्तर बज जाता है
तो कभी बिटिया के इम्तेहान का रिपोर्ट कार्ड बांचने बैठ जाती हो

तुम्हारे आँचल से कच्चे दूध की गंध आती है
तुम्हारे भरे स्तनों पर तुम्हारे शिशु के गुलाबी होंठ हैं
अगाध तृप्ति से भर गया है उसका चेहरा
मुझे देखता पाकर आँचल से उसे ढक लेती हो
और कहती हो नज़र लग जाएगी
शायद तुमने पहचान लिया है मेरी ईर्ष्या को

बहुत कुछ देखते हुए भी नहीं देखती तुम
तुम्हारे सहेजने से है यह सहज
तुम्हारे प्रेम से ही हूँ इस लायक कि कर सकूं प्रेम

कई बार तुम हो जाती हो अदृश्य जब
भटकता हूँ किसी और स्त्री की कामना में
हिंस्त्र पशुओं से भरे वन में

लौट कर जब आता हूँ तुम्हारे पास
तुम में ही मिलती है वह स्त्री
अचरज से भर उसके नाम से तुम्हें पुकारता हूँ
तुम विहंसती हो और कहती हो यह क्या नाम रखा तुमने मेरा .

- अरुण देव .   

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औरत .


वे जो चूल्हे के खिलाफ थी 
चूल्हे के पीछे मिली 
और जो चूल्हे के साथ थी 
वे चूल्हे के आगे मिली 

इस देश में 
करीबन हर औरत की लाश 
चूल्हे के आस-पास मिली 

- अहर्निशसागर .

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रुको स्त्री , अभिमन्यु मत बनो .


रुको स्त्री
मात्र साह्स से नहीं तोड़ सकोगी तुम
द्रोण रुपी गुरु समाज का रचा चक्रव्यूह
द्रोण को जानती हो ना तुम
सरकार ने जिसे अधिकारिक गुरु का दर्जा दे दिया है
स्मरण करो उस द्रोण को
की एकलव्य का हुनर छीन लेने वाला
कैसा गुरु रहा होगा
और द्रोपदी चीरहरण पर
कैसे खामोश रह सकता था कोई गुरु
उसी गुरु ने खड़े कर रखे हैं
खापी योद्धा
अपनी व्यूह रचना के हर मुहाने पर
वे नहीं हिलने देंगे तिल भर भी
तुम्हारे संगी और अंगी भीम तक को भी
ना ही उसके भाईयों को
तुम अकेले ही
कैसे पार कर पाओगी
एक कुटिल गुरु की सम्पूरण व्यूह रचना
सब जानते हैं बेशक
की तुम खुद में ही हो अद्भुत साह्स का नमूना
वे भी जो बाहर रह गये हैं
और वे तो निश्चित ही जो भीतर तुम्हे घेरने को खड़े हैं मुस्तैद
मगर साह्स किस पर आजमाओगी स्त्री
जब खुद ही घिर जाओगी दूसरे घेरे में
की भीतर भी तो अपने ही हैं
छोड़ दो अभिमन्यु बनना हे स्त्री
अब तुम भी एक गीता रचो
कि घेरो के घेरे से
अपनों के फेरे से
कैसे पार पाए स्त्री .

- वीरेंद्र भाटिया .

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बाजी के जन्म पर कुछ वाक्य .

तुम आयीं तब दरवाज़े बंद थे
और गलियों में सन्नाटा था 
अन्धकार की चौखट पर 
कल रात जलाए गए दिए बुझ चुके थे 
और सूर्योदय में अभी देर थी .

भोर के पहले पक्षी की आवाज़ की तरह 
तुम्हारी पहली आवाज़ 
रात्रि  के अंतिम पहर के सुनसान में .

पतझर बस अभी गया था 
बसंत बस अभी आया था 
दो ऋतुओं के बीच 
तीसरी ऋतू की तरह तुम्हारा शुरू होना था 

तुम आयीं पवन के अनंत स्वरों में 
शामिल करने अपना भी स्वर 
तुम आयीं धरती के अनंत कपास से 
बुनने अपने भी धागे 

भोर के किवाड़ में 
सांकल की तरह बजी 
तुम्हारी पहली आवाज़ 

तुम आयीं तब दरवाज़े बंद थे .

- एकांत श्रीवास्तव .

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प्रेम में डूबी स्त्रियाँ


प्रेम में डूबी स्त्रियाँ
प्रेम पर अक्सर कविता नहीं लिखतीं
दो सौ गजों के मकानों में
भैसों के लिए , जगह नहीं है
सिर्फ इसलिए छूट गयी हैं वे
सान बुहारने और चारा देने से
पर डेरी से दूध
अब भी वही लाती हैं।

प्रेम के प्रतिफलों को
कंघी कर , काजल लगा
स्कूल भेजती हैं और
सोये पति को जगाने से पहले
एक बार आइना देखती हैं
चाय के प्याले , और भीगे होंठों से
सोये पति को जग , उलझा देती हैं
पहले क्या पियें ?

दिन लगा देती हैं
मकान को घर बनाने में
अकेली हों तो औरतें
खाना नहीं बनातीं अपने लिए
घर निपटा
रात को रख देती हैं , लपेट कर
सिन्दूर वाली डिब्बी में और
खुद लिपट जाती हैं , अपने
प्रथम पुरुष से सालों
फैले गृहस्थ के बाद भी
चाहती हैं , बत्ती बंद हो जाये
कंचुकी का आखरी बांध खुलने से
पहले - पहले

ऐसा सुना है मैंने !

- दीपक अरोड़ा .
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सुनो स्त्री .

मैं तुमको
किसी एक दिन तक नहीं समेटना चाहता
कि तुम तो हो निस्सीम
उतना जितना स्वयं हो सकता है परमात्मा
जिसने रचा है हमको तुमको बिना भेद किये
बिना कोई विशेष दिन निर्धारित किये
तुम न कोई उपलब्धि हो
न कोई त्रासदी,
बस तुम हो...
जैसे मैं हूँ,
जैसे है दिन-रात, नदियाँ, आकाश, पहाड़ और पेड़
जैसे है यह दुनिया और इसमें वो बहुत सारी चीज़े
जिनके बारे मे मैं जरा भी नहीं जानता
मैं देखना चाहता हूँ तुम्हारे होने को
एक पृकृति की तरह
मैं जीना चाहता हूँ तुम्हारे साथ को
एक साथी की तरह
बिना तुम्हें महिमामंडित किये
बिना तुम्हारी सहजता को खतरा पैदा किये।
मैं चाहता हूँ तुम देखो
इस महिमामंडन के पीछे का सच,
देखो !
ये वही लोग हैं
जो तुम्हारे हिस्से के निर्णय भी स्वयं लेते हैं
तुम्हें महान बताकर
खुद महान बन जाते हैं
फिर ...एक दिन
ये ही निर्धारित करते हैं तुम्हारे लिये अच्छा और बुरा ।

- आनंद कुमार द्विवेदी .

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She made that mouth

She made that mouth

that she makes when she says
the i love yous

and put all her vulnerable
into it

how, she said, can i be true
to myself
if i am true to you?

yeah, i nodded,
beats me. you
got a point .

- Arvind Joshi .
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Master's ( हिंदी ) -

तुम आयीं

तुम आयीं
जैसे छीमियों में धीरे- धीरे
आता है रस
जैसे चलते - चलते एड़ी में
काँटा जाए धँस
तुम दिखीं
जैसे कोई बच्चा
सुन रहा हो कहानी
तुम हँसी
जैसे तट पर बजता हो पानी
तुम हिलीं
जैसे हिलती है पत्ती
जैसे लालटेन के शीशे में
काँपती हो बत्ती !
तुमने छुआ
जैसे धूप में धीरे- धीरे
उड़ता है भुआ
और अन्त में
जैसे हवा पकाती है गेहूँ के खेतों को
तुमने मुझे पकाया
और इस तरह
जैसे दाने अलगाये जाते है भूसे से
तुमने मुझे खुद से अलगाया ।

केदारनाथ सिंह .

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कामायनी से -
यह आज समझ तो पाई हूँ
मैं दुर्बलता में नारी हूँ
अवयव की सुन्दर कोमलता
लेकर मैं सबसे हारी हूँ

पर मन भी क्यों इतना ढीला
अपने ही होता जाता है
घनश्याम खंड सी आँखों में
क्यों सहसा जल भर आता है

सर्वस्व समर्पण करने को
विश्वास महातरु छाया में ?
चुपचाप पड़ी रहने की क्यों
ममता जगती है माया में ?

नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास रजत नग पग तल में
पियूष स्रोत सी बहा करो
जीवन के सुन्दर समतल में .

- जयशंकर प्रसाद .
    
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Master's ( English ) -
She walks in Beauty.

She walks in Beauty, like the night
Of cloudless climes and starry skies;
And all that's best of dark and bright
Meet in her aspect and her eyes:
Thus mellowed to that tender light
Which Heaven to gaudy day denies.

One shade the more, one ray the less,
Had half impaired the nameless grace
Which waves in every raven tress,
Or softly lightens o'er her face;
Where thoughts serenely sweet express,
How pure, how dear their dwelling-place.

And on that cheek, and o'er that brow,
So soft, so calm, yet eloquent,
The smiles that win, the tints that glow,
But tell of days in goodness spent,
A mind at peace with all below,
A heart whose love is innocent! 
अनुवाद -


टिप्पणी .

बोझ से झुकती है वह
पत्थरों के कठोर बोझ से
मैदान की आँखों में
और धरती की आँखों में
समूचे दृश्य में घूमती है वह
सीमेंट और गारे को
मालिक के मकान तक धोती हुई

वह बोझ से झुकती है
ज़िन्दगी के सूखते
आंसुओं के बोझ से

अपने कपड़ों से बाँध कर
ढोती है वह अपने बच्चे को
मालिक के मकान तक
गुनगुनाती हुई .

- ज़ोओ अबेल .
लुआंडा, अंगोला के कवि .

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आभार -

उन सभी मित्रों का जिनकी फेस बुक वाल से कवितायेँ मिली हैं। कुछ कवितायेँ बोधि प्रकाशन की चुनिन्दा प्रकाशित पुस्तकों से ली गयी हैं , जिनमें उल्लेखनीय हैं " स्त्री हो कर सवाल करती है "और " लिखनी ही होगी एक कविता "। कुछ कवितायेँ सदानीरा एवं आधारशिला आदि पत्र पत्रिकाओं से ली गयी हैं।
पुनः धन्यवाद। 

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सरगम - 

आज का ये विशेषांक कैफ़ी आज़मी साहब की इस नज़्म के बगैर बेमानी है . शायद ही इतने ज़ाहिरी और खुले दिल से औरत को अपना हमसफ़र किसी ने माना होगा ... याद नहीं पड़ता . सरगम में उन्हीं की आवाज़ में उनकी नज़्म "औरत ".

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़ल्ब-ऐ-माहौल में लरजाँ शरर-ऐ-जंग है आज
हौसले वक़्त के और जीस्त के यकरंग हैं आज
आबगीनों में तपाँ वलवले ऐ संग हैं आज
हुस्न और इश्क हमआवाज़ औ हमाहंग हैं आज
जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

ज़िन्दगी जेहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़ ऐ हस्ती का लहू कांपते आंसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नकहत ख़म ऐ गेसू में नहीं
जन्नत एक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

कद्र अब तक तेरी तारीख ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हकीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है एक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

गोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए
कहर है तेरी हर एक नर्म अदा तेरे लिए
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ कर रस्म के बुत बारे कदामत से निकल
ज़ोफ़ ऐ इशरत से निकल , वहम ऐ नजाकत से निकल
नफ़्स के खींचे हुए हलक ऐ अज़मल से निकल
ये भी एक क़ैद ही है , क़ैद ऐ मोहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

तू फलातून औ अरस्तू है , तू जोहरा परवीन
तेरे कब्जे में है गर्दूँ , तेरी ठोकर में ज़मीन
हाँ उठा जल्द उठा पाए मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं , वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ायेगी कहाँ तक कि संभालना है तुझे

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

      - कैफ़ी आज़मी .  

3 टिप्‍पणियां:

शिवनाथ कुमार ने कहा…

सुन्दर संकलन ....
आभार !

दिनेश पारीक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ !
सादर

आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
अर्ज सुनिये

mark rai ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति....

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