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गुरुवार, 21 मार्च 2013

फागुन राग

   

 अनेक अर्थों के रंगों से सराबोर इन्द्रधनुषी छटा को बिखेरती हुई, अमीर गरीब के भेद को ख़त्म करती आखिर होली आ ही गयी. मन-तन-वस्त्र-मुख-गात सब के सब रंग से भीगे हुए ... कहते हैं, "आई होली की पाँचें, नाचें मिल के डोकरियां". होली की मदमस्त तरंग , डोकरी यानि बूढी औरतों के ह्रदय में भी अनुराग के रंग का संचार कर देती है.

         संस्कृत कालीन काव्य 'मृच्छिकटिकम' एवं 'स्वप्नवासवदत्तम ' में यही उत्सव मदनोत्सव के नाम से जाना जाता है. 'रत्नावली' नाटिका में भी इस उत्सव का बहुत ही सरस चित्रण हुआ है. यहाँ तक कि हमारा लोक साहित्य तो होली के लोकगीतों से तर ब तर है. हर भाषा में होली के लोक गीतों का रस रंग बिखरा पड़ा है. जिस तरह प्रकृति अपनी केंचुली को त्याग कर नवीनता को धारण करती है, ठीक उसी तरह मानव मन भी अपनी पुरानी बुक्कल को फेंक कर उन्मत्त भाव से नव रंगों में अपने को समाहित कर लेता है. होली ही एक मात्र ऐसा त्यौहार है जो हमारे वर्गभेद को समाप्त कर सब कुछ एकमेव कर देता है.
   
         तो आइये इस अंक में काव्य की पिचकारी से निकली हुई बहुरंगी काव्य धारा से अपने मन की चूनर को रंग डालिए.

            - दिनेश द्विवेदी .

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रीति कालीन होली -

आई खेलि होरी
आई खेलि होरी, कहूँ नवल किसोरी भोरी,
बोरी गई रंगन सुगंधन झकोरै है ।
कहि पदमाकर इकंत चलि चौकि चढ़ि,
हारन के बारन के बंद-फंद छोरै है ॥
घाघरे की घूमनि, उरुन की दुबीचै पारि,
आँगी हू उतारि, सुकुमार मुख मोरै है ।
दंतन अधर दाबि, दूनरि भई सी चाप,
चौवर-पचौवर कै चूनरि निचौरै है ॥

- पदमाकर .
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या अनुरागी चित्त की , गति समुझै नहिं कोइ
ज्यों-ज्यों बूडै स्याम रंग , त्यों-त्यों उज्जलु होइ

- बिहारी .
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मुस्लिम काव्य में होली-

होली पिचकारी

हां इधर को भी ऐ गुंचादहन पिचकारी।
देखें कैसी है तेरी रंगविरंग पिचकारी।।

तेरी पिचकारी की तकदीद में ऐ गुल हर सुबह।
साथ ले निकले हैं सूरज की किरन पिचकारी।।

जिस पे हो रंग फिशां उसको बना देती है।
सर से ले पांव तलक रश्के चमन पिचकारी।।

बात कुछ बस की नहीं वर्ना तेरे हाथों में।
अभी आ बैठें यहीं बनकर हमतंग पिचकारी।।

हो न हो दिल ही किसी आशिके शैदा का नजीर।
पहुंचा है हाथ में उसके बनकर पिचकारी।।

 नज़ीर अकबराबादी .
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छायावादी काल की होली -

नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे 

नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे,खेली होली !
जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,
दीपित दीप, कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली-              
मली मुख-चुम्बन-रोली ।

प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,
एक-वसन रह गई मन्द हँस अधर-दशन अनबोली-                    
कली-सी काँटे की तोली ।

मधु-ऋतु-रात,मधुर अधरों की पी मधु सुध-बुध खोली,
खुले अलक, मुँद गए पलक-दल, श्रम-सुख की हद हो ली-                        
बनी रति की छवि भोली ।

बीती रात सुखद बातों में प्रात पवन प्रिय डोली,
उठी सँभाल बाल, मुख-लट,पट, दीप बुझा, हँस बोली                  
रही यह एक ठिठोली ।

-------------- और ---------------------------------

रँग गई पग-पग धन्य धरा

रँग गई पग-पग धन्य धरा,
हुई जग जगमग मनोहरा ।

वर्ण गन्ध धर, मधु मरन्द भर,
तरु-उर की अरुणिमा तरुणतर
खुली रूप - कलियों में पर भर        
स्तर स्तर सुपरिसरा ।

गूँज उठा पिक-पावन पंचम
खग-कुल-कलरव मृदुल मनोरम,
सुख के भय काँपती प्रणय-क्लम      
वन श्री चारुतरा ।

 सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
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छायावादोत्तर कालीन होली -

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी,

तन के तार छूए बहुतों ने
मन का तार न भीगा,
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

अंबर ने ओढ़ी है तन पर
चादर नीली-नीली,
हरित धरित्री के आँगन में
सरसों पीली-पीली,

सिंदूरी मंजरियों से है
अंबा शीश सजाए,

रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

- हरिवंशराय बच्चन .

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नवगीत में होली -

कौन रंग फागुन रंगे ...

कौन रंग फागुन रंगे,रंगता कौन वसंत?
प्रेम रंग फागुन रंगे,प्रीत कुसुंभ वसंत।

चूड़ी भरी कलाइयाँ,खनके बाजू-बंद,
फागुन लिखे कपोल पर,रस से भीगे छंद।

फीके सारे पड़ गए,पिचकारी के रंग,
अंग-अंग फागुन रचा,साँसें हुई मृदंग।

धूप हँसी बदली हँसी, हँसी पलाशी शाम,
पहन मूँगिया कंठियाँ, टेसू हँसा ललाम।

कभी इत्र रूमाल दे, कभी फूल दे हाथ,
फागुन बरज़ोरी करे, करे चिरौरी साथ।

नखरीली सरसों हँसी, सुन अलसी की बात,
बूढ़ा पीपल खाँसता, आधी-आधी रात।

बरसाने की गूज़री, नंद-गाँव के ग्वाल,
दोनों के मन बो गया, फागुन कई सवाल।

इधर कशमकश प्रेम की, उधर प्रीत मगरूर,
जो भीगे वह जानता, फागुन के दस्तूर।

पृथ्वी, मौसम, वनस्पति, भौरे, तितली, धूप,
सब पर जादू कर गई, ये फागुन की धूल।

- दिनेश शुक्ल .

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सखी री फागुन आया है 

सरस नवनीत लाया है,
सखी री फागुन आया है!!

बरगद ठूँठ भयो बासंती,चँहु ओर हरियाली,
चंपा, टेसू, अमलतासके भी चेहरे पे लाली,
पीली सरसों के नीचे मनुहारी छाया है!
सखी री, फागुन आया है!!

तन पे, मन पे साँकल देकर द्वार खड़ी फगुनाहट,
मन का पाहुन सोया था फ़िर किसने दी है आहट,
पनघट पे प्यासी राधा के सम्मुख माया है!
सखी री, फागुन आया है!!

हाथ कलश लेकर के चन्द्रमा देखे राह तुम्हारी,
सूरज डूबा, हुई हवा से पाँव निशा के भारी,
बूँद-बूँद कलसी में भरके रस छलकाया है!
सखी री, फागुन आया है!!

ठीक नहीं ऐसे मौसम में मैं तरसूँ-तू तरसे,
तोड़ के सारे लाज के बन्धन आजा बाहर घर से,
क्यों न पिचकारी से मोरी रंग डलवाया है!

सखी री, फागुन आया है!!

- रवीन्द्र प्रभात .

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आधुनिक कालीन होली -

गाल गुलाबी हुए धूप के


इस मौसम में
आज दिखा है
पहला-पहला बौर आम का।

गाल गुलाबी
हुए धूप के
इन्द्रधनुष सा रंग शाम का।

साँस-साँस में
महक इतर सी
रंग-बिरंगे फूल खिल रहे,
हल्दी अक्षत के
दिन लौटे
पंडित से यजमान मिल रहे,
हर सीता के
मन दर्पण में
चित्र उभरने लगा राम का।

खुले-खुले
पंखों में पंछी
लौट रहे हैं आसमान से
जगे सुबह
रस्ते चौरस्ते
मंदिर की घंटी अजान से।
बर्फ पिघलने
लगी धूप से
लौट रहा फिर दिन हमाम का।

खुली-बन्द
ऑंखों में आते
सतरंगी सपने अबीर के।
द्वार-द्वार गा रहा
जोगिया मौसम
पद फगुआ कबीर के
रूक-रूक कर चल रहा बटोही
इंतजार है किस मुकाम का .

- जयकृष्ण राय तुषार .

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रंग बोलते हैं .

तुम्हारे अहसास से अछूती होती
तो
सचमुच मै सफ़ेद होती ...
किसी ख़ाली केनवास की तरह .

कई रंग मचलते हैं
जब तुम गुनगुनाते हो ,
मंद पड़ते हैं
जब एक
अनकहा अबोला खिंच जाता है ...
कुछ तो कहो
प्रियतम
तुम्हारे इशारे पर
सूरज का लाल रंग देह में उछलता है .
तुम्हारे ख्यालों
के नीले पीले हरे से मेरा एकांत
महकता है .

तुम्हारी
एक हलकी गुलाबी मुस्कुराहट
के लिए नैन रास्ता ताकते हैं .
कभी अनमने रहो
तो
अन्तरमन से भूरे काले रंग झांकते हैं .
उस विराट समंदर का
काही और गहरा नीला रंग
याद दिलाते है उस गंभीरता की
जिसमे मै सिमट कर इस भीड़ में
खुद को महफूज़ समझती हूँ .

सारे रंग
मुझे तुम्हारी ही याद दिलाते हैं
तुम्हे पता है ना..
मेरे सारे रंग तुमसे हैं ,
तुम न होते
सचमुच मै सफ़ेद होती
किसी ख़ाली केनवास की तरह .

              - रश्मि प्रिया

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होली 

गाल गुलाल हुए मौसम के ,
चाल भंग की झूम हुई ,
तन भी भीगा, मन भी भीगा
होली की जब धूम हुई .

पायल छनकी हलकी-हलकी ,
रस की मटकी छलकी-छलकी ,
छिप-छिप सब से फिरती गोरी -
चूनर कोरी ले मलमल की .

कान्हा के हाथों पिचकारी -
रंगने की पूरी तैय्यारी ,
सारा बरसाना रंग डाला ,
अब आई राधा की बारी .

- मीता .
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जीवन का हर दिन होली है

कहीं एक नन्हा सा बिरवा उपज रहा है, धीरे-धीरे
सोख  रहा है  थोड़ा पानी,  थोड़ी  मिट्टी, धीरे-धीरे
बड़ा एक दिन होगा, उसकी शाखों पर होंगे पत्ते
भर  देगा  हरियाली  मेरी  आँखों  में,  धीरे-धीरे 
जीवन का हर दिन होली है

जिसकी चादर में सिमटे, ये सूरज, तारे हैं सारे
जिसके आँचल में आ सिमटे बादल, अपना सब कुछ वारे
जिसका  विस्तार, निमंत्रण  पाखी को  देता है, उड़  जा रे
उस नीले अम्बर का नीलापन, मेरी आँखों के धारे
जीवन का हर दिन होली है

दिनभर जलकर,थककर, दिनकर का स्वर्णिम-ओज हुआ खाली
ठंडी बयार के मंद - मंद झोंकों ने थपकी दे डाली
मानस-मन की सारी पीड़ा,ज्यों अपने अंतस में पाली
ढलती शामों ने आकर मेरी आँखों में भर दी लाली
जीवन का हर दिन होली है

पीली-राखी, पीली-हल्दी, पीली सरसों, पीली चादर
सिन्दूर सुहागन मांगों में, धानी-धानी लहरी चूनर 
प्रेम-पिपासु नयनों में बिखरा-बिखरा दूध और केसर
रंगों का उत्सव मनता है पल-पल में देखो जीवन भर   
जीवन का हर दिन होली है .

 - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .
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लोक गीतों में होली-

आज बिरज में होरी है रे रसिया

आज बिरज में होरी है रे रसिया
होरी है रे रसिया, बरजोरी है रे रसिया | 
आज बिरज में ...

आज बिरज में होरी है रे रसिया
कहूँ बहुत कहूँ थोरी है रे रसिया |
आज बिरज में ...

इत तन श्याम सखा संग निकसे
उत वृषभान दुलारी है रे रसिया | 
आज बिरज में ...

उड़त गुलाल लाल भये बदरा
केसर की पिचकारी है रे रसिया | 
आज बिरज में ...

बाजत बीन, मृदंग, झांझ ओ डफली
गावत दे -दे - तारी है रे रसिया | 
आज बिरज में ...

श्यामा श्याम संग मिल खेलें होरी,
तन मन धन बलिहारी है रे रसिया | 
आज बिरज में ...

होरी है रे रसिया, बरजोरी है रे रसिया | 
आज बिरज में ...
आज बिरज में होरी रे रसिया !
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मैं तो कोसूंगी कुञ्ज बिहारी 

मैं तो कोसूंगी कुञ्ज बिहारी
मोरी नवल चुनरिया फारी

बरज यशोदा तू अपने लाल को
वो तो तोडत हार हजारी
मोती बिखर गए रंग महल में
चुन रही सखियाँ सारी।
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होरी खेलन आयो श्याम

होरी खेलन आयो श्याम, आज याए रंग में बोरो री
आज याए रंग में बोरो री, आज याए रंग में बोरो री
याकी हरे बाँस की बाँसुरिया, याए तोरि मरोरो री ....
होरी खेलन आयो श्याम...

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डार गयो मो पे रंग की गागर

डार गयो मो पे रंग की गागर 
मैं जो भूले से देखन लागी उधर .
बिन होरी खेरे जाने न दूँगी
जाते कहाँ हो , जरा ठहरो इधर .
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अब तो तिहारी बन आयी 

अब तो तिहारी बन आयी रे छयलवा
बहियां पकड़ मुख मलत गुललवा  

संग के सहेली सब दूर निकस गयीं 
हमहूँ अकेली धर पाई रे छयलवा 
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राधे नन्द कुंवर समझाय रही 

राधे नन्द कुंवर समझाय रही 
होरी खेलो फागुन ऋतू आय रही
अब के होरिन मैं घर से न निकसूं
चरनन सीस नवाय रही
बेला भी फूली , चमेली भी फूली 
सरसों रही सरसाय रही .

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आई अचानक होरी 

आई अचानक होरी 
पिया परदेस गयो री
आई अचानक होरी ...

सब सखियाँ मिल होरी खेलें
केसर रंग बनो री
बिन पिया फाग मोहे आग सा लागे
कासे करूं बरजोरी .

आई अचानक होरी .
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सरगम 

चलचित्र होली गीतों की परंपरा में यह गीत एक विशेष महत्व रखता है ... अपनी सादगी, मिठास और गहराई की वजह से. प्रस्तुत है शकील बदायुनी जी का लिखा हुआ, शमशाद बेगम का गाया, नौशाद साब के सुरीले संगीत से सजा, मदर इंडिया का यह मधुर गीत सरगम में.
 शुभकामनाओं के साथ, कि होली का यह त्यौहार आप सब के जीवन को खुशियों के रंगों से सराबोर कर दे .


सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

आयो ऋतुराज वसंत ...



वसंत अब शहर में नहीं आता , घर के आँगन में नहीं आता , दो दिलों में नहीं आता .... जिस कंक्रीट के जंगल में हम रहते हैं , वहां वसंत के आने के सारे दरवाज़े बंद हैं .... लेकिन वसंत आया तो होगा , अभी भी ... खेतों में , जंगलों में कहीं , तो चलें उसे बुला लायें , क्योंकि स्वागत तो करना है वसंत का .... और फिर वसंत का आना सिर्फ एक मौसम भर बदलने की बात नहीं है ..... ये तो प्रतीक है जीवन में एक नयी उमंग का , एक नए उत्साह का ...
                 पुराने कवियों की कविताओं में वसंत को अनेक रूपों में देखा पढ़ा है हम ने .... जिन में प्रकृति का वसंत होता था , प्रेमी प्रेमिकाओं का वसंत होता था , यहाँ तक कि वीरों का भी वसंत होता था .... एक टिटहरी प्रयास है कि वसंत न केवल उस रूप में , वरन और भी अनेक रंग बदल कर अपने पूर्ण सौंदर्य और शालीनता के साथ आप के घर , आप के मन तक आये इन कविताओं में ...
            आइये मिल कर कहते हैं , स्वागत है वसंत तुम्हारा ..!
                                   
                                          - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .
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इन दिनों .                                

मनचीता ताप है
इन धूपीले दिनों में
जिसे चाहने पर ओढना है
अनिच्छा होने पर मुख मोड़ लेना ...

भोर में खिले मयंक को देखा अदेखा किया जाता है जैसे .

जनवरी विदा हो कर , फ़रवरी को सौंप गयी
लम्बे पहरों की बागडोर
अलसुबह ही नींद में पंख फडफडा कर
साँझ तक पाँव पसारे
यहाँ वहां से अलस कर सिमटता है
उजाला अब

कैकटस पर नूर है
मिर्च के पौधे में नन्हे सफ़ेद फूल से
चमक-दमक

मैना सर्दियों की खुमारी में
इन दिनों भी टपकते नल के पास
चहलकदमी करती , भोजन तलाशती है
उसकी आँखों के गिर्द पीला काजल
लुभावना

हवा में गुड पकने की गंध है
खजूर का गुड
गले में खराश जगाता
दूर से ही

तन , आधी धूप , आधी छांह में सुस्ताता
मन , दामोदर किनारे मद्धम चाल से उसकी
मछलियों से बतियाता ,
पानी में हाथ डाल उन्हें सहलाता
सुनता विलंबित ख्याल कोई

इस नदी की रेत पर सुगमता से चलना दूर तक
गंगा की महीन बालू जैसे पैर उलझते नहीं
यहां मेरे

मनचीती धूप में देखना ....

वसंत अपनी ही छाया पर
नीम की पीली पत्तियों सा
बिखरता - डोलता , विचरता रहता है
हवा के रुख पर
इन दिनों .

                   - पारुल पुखराज.
                     
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वसंत .                              

१ .

देखो तो
इस बासंती बयार को
एक डाकिये की तरह
अनुराग के ख़त
बाँट रही है
और
विरही भावनाओं की
दुआओं की रेज़गारी
बटोर रही है .

२ .

जब
प्रतीक्षा की वासंती धूप
बहुत तीखी हो कर
तपने लगी ,
तो मैंने तुम्हारी सुधियों का
छाता तान लिया .

                    - दिनेश द्विवेदी .

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बसंत...तब..और..अब



याद है दूर से आती बांसुरी की 'विरही' सी धुन
'मांदल' की थाप में थिरक दुनिया भुलाने का गुन
आम्रकुंज में बौरा सी जाती थी काली सुरीली कोयल
जब 'सुमति' के जूड़े में खोसे फूल से 'बसंत' उतरता था
........................तब यक़ीनन वो जंगल से गुजरता था .


उस छोटी बस्ती से निकल इक टूटी पुलिया में बैठना
चाँद तले कभी हाथों में हाथ लिए बंजारों सा भटकना
बसंती बयार की छुवन, प्रकृति का स्पंदन महसूसना
'ऋतुराज' का आदिम तीर मन से देह में उतरता था
.............. यक़ीनन बसंत जंगल से गुजरता था


और अब.......


बसंत तो अब भी वहीँ है.... वायदे से मजबूर
बस ठिठक जाता है ........बेलिबास पेड़ों के बीच
जब टेसू सी दहकती आग ........आँखों में लिए
'हथियारों' से लैस एक 'दस्ता' जंगल से निकलता है ,
बसंत बस निकल जाता है .....
                     जंगलों से नहीं गुजरता है

                                           - रश्मि प्रिया .

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ये बसंत का मौसम ...

                    


      बूटा बूटा जवाँ जवाँ गुन्चो गुल मुस्काया है,
      ये बसंत का मौसम अपने जीवन का सरमाया है।


जंगल जंगल तरसे तरसे आलम था बेहाली का,
सबको सामाने तसकीं खुद सूरज लेकर आया है।


मेरे दिल की सूनी धरती बिलख रही थी सदियों से,
वादी ए दिल ने अब जाकर खुला ख़ज़ाना पाया है।


भौंरा भौंरा निकल पड़ा है फिर कलियों की चाहत में,
फिर दीवानों पर मस्ती का समां नशीला छाया है।


हम जैसे ग़मगीन ग़रीबों की सुन ली है मालिक ने,
रंगो बू के मौसम ने हर ग़म को दूर भगाया है।

                                                       - इमरान .


गुन्चो गुल: पत्ते और फूल
सरमाया : संपत्ति
सामाने तसकीं : संतुष्टि का सामान
रंगो बू : रंग और खुशबू
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अब वसंत आ जाने दो ... 

            


ये जीवन पतझड़ का मौसम
                 अब वसंत आ जाने दो .
प्रियतम तेरे नेह-घटक बिन
अँखियाँ अश्रु की पनिहारिन
बिन तेरे आँचल में सिमटी
क्वांरी पीड़ा बनी अभागिन
चूनर कुम-कुम हो जाने दो,
उम्र सुहागिन हो जाने दो
ये जीवन पतझड़ का मौसम
               अब वसंत आ जाने दो .
विरह-निशा आँखों में बीती
आशा की मदिरा भी रीती
तुमको सौ-सौ बार पुकारा
फिर भी सूनी मन की वीथी
अधर-अधर से मिल जाने दो,
प्रेम-सुमन खिल जाने दो
ये जीवन पतझड़ का मौसम
                   अब वसंत आ जाने दो .

                          
                                 - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .

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फिर कैसे आये वसंत ?



अम्मा उठी सुबह सूरज निकलने से पहले
और घर को सर पर उठा लिया
कितनी देर तक सोती है "असंस्कारी"
ये कह "तुच्छ" बहू को जाता दिया
बोली बहू से अम्मा सरस्वती पूजन है आज
सास सफाई कर रही है , तुझे आती नहीं है लाज
चल उठ गरम कर पानी मुझ को अभी नहाना है
इस से पहले सूरज निकले "तुलसी माँ "को पानी चढ़ना है
बोली बहू ऑंखें मलते - माँजी थोडा जी मित्लाता है
सुबह जल्दी उठती हूँ तो चक्कर सा आता है
सोचा कर बोली अम्माजी, चलो "लड़ो" फिर तुम सो जाओ
धयान रहे कि डाक्टर से जल्दी "जांच" तुम अपनी करवाओ

पूजा पाठ ज्यों निपटी त्यौं अम्माजी गयी डाक्टर के पास
लड़का जने बहू ये मेरी मन में यही थी आस
नोट हरे जो चढ़े चढ़ाव डाक्टर थोडा सा मुस्काया
बहुत सुदर है आपकी "पोती" , अम्माजी को बतलाया
अम्माजी कि त्योरियां चढ़ गयीं , लिया चिंता ने घेर
बोली डाक्टर कोई जतन करो जो दूर हो "अंधेर"
डाक्टर बोला अम्माजी ये है थोडा मुश्किल काम
कोशिश मैं कर सकता हूँ मिले जो वाजिब दाम
एक बार अपनी बहू से भी आप पूछ ले थोडा
अगर वो मुकर गयी तो अटक सकता है रोड़ा
बोली अम्माजी उस ने जब मेरे नाक कटाई है
अब उसके इस जुर्म की कोई नहीं सुनवाई है

बहू सिसकती रह गयी धुल गये उसके पाप
सुबह उठी थी जो उम्मीद शाम हुई तो साफ़
घर आकर अम्माजी ने फिर पंडित को बुलवाया
बड़े जतन से उन्होंने "सरस्वती" पूजन करवाया
मंदिर में जाकर बोली " माँ, है तूने ही बचाया
न जाने किस का श्राप बहू की कोख में आया
अब तू बेटा ही देना, मैं तेरी जोत जलाऊंगी
नवरातों को, नौ कन्या को, पञ्च भोग कराऊंगी"

सिमट गयी थी बहू खुद में , खो कर नन्ही सी जान
उस अजन्मे रिश्ते के कहीं ऋणी थे उसके प्राण
सोच रही थी की कैसे होगा इस चलन का अंत
न जन्मे जो बेटी कोई तो फिर कैसे आये वसंत

                                    - स्कन्द .

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वसंत कहाँ रुकता है .

                                                            
ठण्ड से अधमरी  
पत्तियों को
जीवन की धूप दिखा कर
तुम प्राण वायु फूंकते हो
इस तरह
बुझते दिए की लौ सा
एक बार
तेज जला कर
बसंत
तुम भी कहाँ रुकते हो

हाँ, एक बात सिखा जाते हो
हर चीज आनी जानी है
सब में
मौसम सी ही रवानी है


मेरी मानो
मै भी बसंत की तरह हूँ
जब तक मन में रहूँगा
मुस्काऊँगा
एक मुस्कुराहट
तुम्हारे होंठो पर सजा कर
और
कई मधुर यादों की
पोटली थमा कर
मै भी चला जाऊंगा .

               - रश्मि प्रिया .
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बसंत फिर आयेगा                        



हाँ , बसंत आया था
अपने पीले लिबास में
मुझे धीमे से थमाने
छोटा सा पीला रुमाल
जो माँ ने सिया था
सफ़ेद कपडे को
हल्दी से रंग के
देवताओं के सिंहासन
पे शोभित पीताम्बर
और चूल्हे से उठती
मीठे चावल की खुशबू
जब डब्बे के रेजगारी की
आवाज मंद हो चली थी
और दिल में स्नेह
बाहर छलक चला था
ऋतुराज का उल्लास
चेहरे पे दमका था
गोद में उठा मुझे
सरस्वती वंदना गाई थी
और दिल की  व्यथा
आशा में डुबाई थी




अब वसंत का रंग
कुछ मैला सा हो गया है
पीले सोने की चमक से
धूमिल सा हो गया है
मिलावट के बाज़ार से
खशबू उड़ गयी है
सरस्वती भी अब
सुप्त सी हो गयी है
पर अब मुझे खुद ही
बसंत को बुलाना होगा
अपने बच्चों को उसका
जादू दिखाना होगा
वस्त्र आभूषण से परे
छोटी बातों में ख़ुशी
समेटने का वो कौशल
फिर से सिखाना होगा
तभी फिर वसंत आयेगा
और हमें फिर से
रंग और खुशबू से
सराबोर कर जायेगा


- साधना .


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लौट आना वसंत ...
                                                                              


तुम रुकोगे नहीं .
चले जाओगे
अपनी खुशबू ,
अपने तमाम रंग
समेट कर .


आहिस्ता आहिस्ता
धूप कड़ी होने लगेगी
झुलसाने लगेगी मन- प्राण ;
तब कहीं जा कर
बारिशें होंगी .


फिर धीरे-धीरे
पतझर
इक रोज़
सिहरती ठण्ड में तब्दील हो जाएगा .


और ...
एक गहरी उदास नींद
सो जाएगी धरा .


सांसें धीरे-धीरे खर्चती ,
दर्द-दर्द जीती ,
कराहती ...
तुम्हारे जादुई स्पर्श के लिए .


तब
एक स्वप्न की तरह
तुम लौट आना वसंत ...
धरा के पास !!
भर देना उजास ...
धरा को
रहने न देना
देर तक उदास !!


- मीता .

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हमारे वसंत के इस अंक में , इस मीठे गीत के साथ आइये महसूस करते हैं धरती के अनूठे सौंदर्य को -



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