बुधवार, 23 अप्रैल 2014

यहाँ जहाँ हम रहते हैं ...



पृथ्वी, सौर मंडल का एक मात्र ग्रह जहाँ जल है, वायु है, वनस्पति है, जीव है, जीवन है। सूर्य से सही दूरी पर मौजूद, अपनी धुरी पर घूमती पृथ्वी अलग-अलग ऋतुओं, फल-फूलों, धन-धान्य द्वारा प्रकृति के सर्वोत्तम उपहार हम पर लुटाती रही है। हमने साधिकार उन्हें स्वीकारा ही नहीं बल्कि जहाँ मौका मिला नोच-खसोट कर अधिक लेने से भी नहीं चूके। स्नेहवत्सला पृथ्वी ने जितना हमने माँगा उतना हमें दिया। पर समय के साथ हमारी मांगे भी सुरसा के मुख की तरह बढ़ती चली गयी हैं।

गौर करें तो स्पष्ट सुनी जा सकती है प्रकृति की चीत्कार, जिसका हम दो हाथों से दोहन कर रहे हैं। धसकते हिमालय, सूखती नदियां,  सूनामी, बढ़ता तापमान, पेड़ों के काटने से प्रायः निर्वस्त्र प्रतीत होते पहाड़ों की मिट्टी का लगातार कटान इसका सबूत है कि प्रकृति बार-बार हम से कुछ कहने की कोशिश कर रही है।

महात्मा गांधी ने कहा था, पृथ्वी के पास प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता मिटा सकने का पर्याप्त सामर्थ्य है, किन्तु प्रत्येक व्यक्ति का लालच मिटा सकने का नहीं, " The world has enough for everyone's need, but not enough for everyone's greed ."

ये हमारा लालच ही तो है जो नए-नए हथियार ईजाद किये जा रहे हैं। इतिहास से कोई सबक न लेते हुए हम बनाये जा रहे हैं तरह-तरह के अणु, परमाणु, रासायनिक हथियार, जो बटन दबाते ही एक पूरी सभ्यता को नष्ट कर सकते हैं। दूसरों से ताकतवर बने रहने का हमारा लालच इन्हें बनाने की प्रमुख वजह है  … रक्षा-प्रतिरक्षा तो बहाना मात्र है।
प्रसिद्द वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, " I know not with what weapons World War III will be fought, but World War IV will be fought with sticks and stones ."

सोचा जाये तो चतुर्थ विश्व युद्ध की संभावना शायद ही बचे। पृथ्वी को मृतप्राय कर कहीं हम ही डायनासोर की तरह विलुप्त न हो जाएं।
हम हैं , क्योंकि  .... पृथ्वी है।

- मीता  .
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छोटी-सी दुनिया

यही जो छोटी-सी दुनिया हमें मिली है
सच है, सुन्दर है
और असह्य भी-
यही सम्हाले नहीं सम्हलती है
यही भरी है इतने हर्ष से, यही द्रवित है इतने विषाद से।

अपने बगल में टुकुर-टुकुर ताकती गिलहरी से
कहा फूल ने-
एक बुढ़िया अपनी गुदड़ी से निकालकर
एक तोता खाया फल अपनी नातिन को देते हुए
यही बोली।

छोटी सी है तितलियों और मधुमक्खियों की दुनिया,
छोटी सी दुनिया तोतों और बगुलों की,
आम और अमरुद की, इमलियों और बेरों की।

बड़ा सपना देखती
बड़ी सचाई को संक्षिप्त करती
सूरज और चाँद को
नक्षत्रों और अंतरिक्ष को
हथेली पर अक्षत की तरह
पवित्र रखती
यही
छोटी-सी दुनिया
हमें मिली है
सच है
सुन्दर है।

- अशोक वाजपेयी .
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भरोसे के तंतु 

ऐसा क्या है कि लगता है
शेष है अभी भी
धरती की कोख में
प्रेम का आखिरी बीज

चिड़ियों के नंगे घोंसलों तक में
नन्हे-नन्हे अंडे
अच्छे दिनों की प्रार्थना में लबरेज़ किंवदंतियां
चूल्हे में थोड़ी सी आग की गंध
घर में मसाले की गंध
और जीवन में
एक शर्माती हुई हँसी

क्या है कि लगता है
कि विश्वास से
एक सिरे से उठ जाने पर
नहीं करना चाहिए विश्वास
और हर एक मुश्किल समय में
शिद्दत से
खोजना चाहिए एक स्थान
जहाँ से रोशनी के कतरे
बिखेरे जा सकें
अँधेरे मकानों में

सोच लेना चाहिए
कि हर मुश्किल समय ले कर आता है
अपने झोले में
एक नया राग
बहुत मधुर और कालजयी
कोई सुन्दर कविता

ऐसा क्या है कि लगता है
कि इतने किसानों के आत्महत्या करने के बाद भी
कमी नहीं होगी कभी अन्न की
कई-कई गुजरातों के बाद भी
लोगों के दिलों में
बाकी बचे रहेंगे
रिश्तों के सफ़ेद खरगोश

क्या है कि ऐसा लगता है
और लगता ही है   …
एक  ऐसे भयावह समय में
जब उम्मीदें तक हमारी
बाजार के हाथ गिरवी पड़ी हैं
कितना आश्चर्य है
कि ऐसा लगता है
कि पूरब से एक सूरज उगेगा
और फ़ैल जाएगी
एक दूधिया हंसी
धरती के इस छोर से उस छोर तक  …

और हम एक होकर
साथ-साथ
खड़े हो जायेंगे
इस पृथ्वी पर धन्यवाद की मुद्रा में

- विमलेश त्रिपाठी .
__________________________________________

पृथ्वी

पृथ्वी धीरे-धीरे नष्ट हो रही है
जैसे नष्ट हो रहा है घर
जैसे नष्ट हो रहा है जंगल
जैसे नष्ट हो रही है तन्मयता
जैसे नष्ट हो रही है समझदारी

नष्ट हो रहा है साधारण का प्रकाश
नष्ट हो रहा है बीत चुका युग
नष्ट हो रहा है प्रेम के लिए एकांत
नष्ट हो रहा है सारा समर्थ-असमर्थ

बढ़ रहा है सिर्फ झूठ
बढ़ रहा है सिर्फ छल
बढ़ रहा है सिर्फ सुनसान
बढ़ रहा है सिर्फ प्रश्न-चिन्ह

पृथ्वी धीरे-धीरे नष्ट हो रही है
जैसे नष्ट हो रही है दोपहर
जैसे नष्ट हो रही है नाव
जैसे नष्ट हो रही है सांस

जैसे नष्ट हो रहा है बढ़िया स्वभाव
जैसे नष्ट हो रहा है सच
जैसे नष्ट हो रहा है बचपन
जैसे नष्ट हो रहा है चिड़िया का गाना इस पृथ्वी से।

- शहंशाह आलम  .
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कैसा पानी कैसी हवा 

किस तरह होती जा रही है दुनिया
कैसे छोड़ कर जाऊंगा मैं
बच्चों तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को
इस कांटेदार भूल-भुलैया में

किस तरह और क्या सोचते हुए
मरूंगा मैं कितनी मुश्किल से
सांस लेने के लिए भी जगह होगी या नहीं
खिड़की से क्या पता
कब दिखना बंद हो हरी पत्तियों के गुच्छे

हरी पत्तियों के गुच्छे नहीं होंगे
तो मैं कैसे मरूंगा
मैं घर में पैदा हुआ था
घर पेड़ का सगा था
गाँव में बड़ा हुआ
गाँव खेत-मैदान का सगा था
पर अब किस तरह रंग बदल रही है दुनिया
मैं कारखानों में फंसी आवाज़ों के बिस्तर पर
नहीं मरूंगा

कारखाने ज़रूरी हैं
कोई अफ़सोस नहीं
आदमी आकाश में सड़कें बनाये
कोई दिक्कत नहीं

पर वह शैतान
उसके नाखून   … भयानक जबड़े  …
वह शहरों गावों पर मंडरा रहा है
और हमारी परोपकारी संस्थाएं
हर घर से उस के लिए
जीवित मांस की व्यवस्था कर रही हैं।

घरों की पसलियों पर
कारखानों की कुहनियों का बोझ
गलत बात है
स्याह रास्ता अंतहीन अंत जैसा
और जुगनुओं सी टिमटिमाती
भली आत्माओं के दो-चार शब्द

हरी पत्तियों का गुच्छा होगा
तब भी दिक्कत आएगी
सोच-सोच कर
तुम्हारे बच्चों के बच्चे किस तरह
रास्ता बनाएंगे
कैसा पानी कैसी हवा
ईंधन का पता नहीं क्या करेंगे ?
सच मरते वक़्त अपने को माफ़ नहीं
कर पाऊंगा मैं।

- चंद्रकांत देवताले  .
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सब्ज़ लम्हे 

सफ़ेदा चील जब थक कर कभी नीचे उतरती है
पहाड़ों को सुनाती है 
पुरानी दास्तानें पिछले पेड़ों की  … 

वहां देवदार का इक ऊंचे कद का पेड़ था पहले 
वो बादल बाँध लेता था कभी पगड़ी की सूरत अपने पत्तों पर 
कभी दोशाले की सूरत उसी को ओढ़ लेता था  … 
हवा की थाम कर बाहें 
कभी जब झूमता था, उस से कहता था,
मेरे पाँव अगर जकड़े नहीं होते,
        मैं तेरे साथ ही चलता। 

उधर शीशम था, कीकर से कुछ आगे 
बहुत लड़ते थे वह दोनों 
मगर सच है कि कीकर उसके ऊंचे कद से जलता था 
सुरीली सीटियां बजती थीं जब शीशम के पत्तों में 
परिंदे बैठ कर शाखों पे, उसकी नकलें करते थे  … 

वहां इक आम भी था 
जिस पे एक कोयल कई बरसों तलक आती रही  … 
जब बौर आता था  … 
उधर दो-तीन थे जो गुलमुहर, अब एक बाकी है,
वह अपने जिस्म पर खोदे हुए नामों को ही सहलाता रहता है। 

उधर एक नीम था 
जो चांदनी से इश्क करता था  … 
नशे में नीली पड़ जाती थीं सारी पत्तियां उसकी। 

ज़रा और उस तरफ परली पहाड़ी पर,
बहुत से झाड़ थे जो लम्बी-लम्बी सांसें लेते थे,
मगर अब एक भी दिखता नहीं है उस पहाड़ी पर !
कभी देखा नहीं, सुनते हैं, उस वादी के दामन में,
बड़े बरगद के घेरे से बड़ी एक चम्पा रहती थी,
जहाँ से काट ले कोई, वहीँ से दूध बहता था,
कई टुकड़ों में बेचारी गयी थी अपने जंगल से  … 

सफ़ेदा चील इक सूखे हुए से पेड़ पर बैठी 
पहाड़ों को सुनाती है पुरानी दास्तानें ऊंचे पेड़ों की,
जिन्हें इस पस्त क़द इन्सां ने काटा है, गिराया है,
कई टुकड़े किये हैं और जलाया है  !!

- गुलज़ार .
___________________________________________

पृथ्वी का सामान्य ज्ञान 

पृथ्वी-
घोर अंधकार में घूमती हुई पृथ्वी
देख रही है
भय और विस्मय-भरी नज़रों से
अपनी धुरी को
उसे अब पता चला है
वह नाच रही है
एक मिसाइल की नोक पर।

- नोमान शौक़ .
_____________________________________________

ओ पृथ्वी !

छाती फाड़ कर दिखा सकता तो बताता
तुम्हारे लिए मेरे भीतर कितना प्यार है ओ पृथ्वी !

जो तुम्हें ध्वस्त कर, अपनी शक्ति का अनुमान लगाते हैं
दूसरों के मन में भय जगाते हुए
निर्भय और सुरक्षित होने का डंका बजाते हैं
क्षमा करो उन्हें, क्षमा करो पृथ्वी !

क्षमा करो और नए मनुष्य के शीश पर हाथ रख
आशीर्वाद दो कि वह इन आतताइयों के विरुद्ध
युद्ध में विजयी हो !
विजयी हो और
वनस्पतियों-पक्षियों-पशुओं और मनुष्यों के लिए
तुम्हारी शंकालु दृष्टियाँ ममतामय हो उठें एक बार फिर !
एक बार फिर तुम्हें सूर्यार्थ मिले !
फिर तुम्हें नया मनुष्य
शस्यात्मा और जीवन देही कह कर प्रणत हो !
एक नया श्रम
एक नयी शक्ति
एक नयी मनीषा
तुम्हारी कोख में जन्म ले ओ सृष्टि माध्यमे !
विनाश का सृजन के सम्मुख समर्पण अनिवार्य है अब।

छाती फाड़ कर दिखा सकता तो बताता
तुम्हारे लिए कितना  … कितना प्यार है
मेरे भीतर ओ पृथ्वी !

- शलभ श्रीराम सिंह  .
___________________________________________

यह पृथ्वी रहेगी

मुझे विश्वास है
यह पृथ्वी रहेगी
यदि और कहीं नहीं तो मेरी हड्डियों में
यह रहेगी जैसे पेड़ के तने में
रहते हैं दीमक
जैसे दाने में रह लेता है घुन
यह रहेगी प्रलय के बाद भी मेरे अंदर
यदि और कहीं नहीं तो मेरी ज़बान
और मेरी नश्वरता में
यह रहेगी

और एक सुबह मैं उठूंगा
मैं उठूंगा पृथ्वी-समेत
जल और कच्छप-समेत मैं उठूंगा
मैं उठूंगा और चल दूंगा उस से मिलने
जिस से वादा है
कि मिलूंगा ।

- केदारनाथ सिंह .
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भरोसे के तंतु

ऐसा क्या है कि लगता है
शेष है अभी भी
धरती की कोख में
प्रेम का आखिरी बीज

चिड़ियों के नंगे घोंसलों तक में
नन्हे-नन्हे अंडे
अच्छे दिनों की प्रार्थना में लबरेज़ किंवदंतियां
चूल्हे में थोड़ी सी आग की गंध
घर में मसाले की गंध
और जीवन में
एक शर्माती हुई हँसी

क्या है कि लगता है
कि विश्वास से
एक सिरे से उठ जाने पर
नहीं करना चाहिए विश्वास
और हर एक मुश्किल समय में
शिद्दत से
खोजना चाहिए एक स्थान
जहाँ से रोशनी के कतरे
बिखेरे जा सकें
अँधेरे मकानों में

सोच लेना चाहिए
कि हर मुश्किल समय ले कर आता है
अपने झोले में
एक नया राग
बहुत मधुर और कालजयी
कोई सुन्दर कविता

ऐसा क्या है कि लगता है
कि इतने किसानों के आत्महत्या करने के बाद भी
कमी नहीं होगी कभी अन्न की
कई-कई गुजरातों के बाद भी
लोगों के दिलों में
बाकी बचे रहेंगे
रिश्तों के सफ़ेद खरगोश

क्या है कि ऐसा लगता है
और लगता ही है   …
एक  ऐसे भयावह समय में
जब उम्मीदें तक हमारी
बाजार के हाथ गिरवी पड़ी हैं
कितना आश्चर्य है
कि ऐसा लगता है
कि पूरब से एक सूरज उगेगा
और फ़ैल जाएगी
एक दूधिया हंसी
धरती के इस छोर से उस छोर तक  …

और हम एक होकर
साथ-साथ
खड़े हो जायेंगे
इस पृथ्वी पर धन्यवाद की मुद्रा में

- विमलेश त्रिपाठी . 

ओ पृथ्वी

छाती फाड़ कर दिखा सकता तो बताता
तुम्हारे लिए मेरे भीतर कितना प्यार है ओ पृथ्वी !

जो तुम्हें ध्वस्त कर, अपनी शक्ति का अनुमान लगाते हैं
दूसरों के मन में भय जगाते हुए
निर्भय और सुरक्षित होने का डंका बजाते हैं
क्षमा करो उन्हें, क्षमा करो पृथ्वी !

क्षमा करो और नए मनुष्य के शीश पर हाथ रख
आशीर्वाद दो कि वह इन आतताइयों के विरुद्ध
युद्ध में विजयी हो !
विजयी हो और
वनस्पतियों-पक्षियों-पशुओं और मनुष्यों के लिए
तुम्हारी शंकालु दृष्टियाँ ममतामय हो उठें एक बार फिर !
एक बार फिर तुम्हें सूर्यार्थ मिले !
फिर तुम्हें नया मनुष्य
शस्यात्मा और जीवन देही कह कर प्रणत हो !
एक नया श्रम
एक नयी शक्ति
एक नयी मनीषा
तुम्हारी कोख में जन्म ले ओ सृष्टि माध्यमे !
विनाश का सृजन के सम्मुख समर्पण अनिवार्य है अब।

छाती फाड़ कर दिखा सकता तो बताता
तुम्हारे लिए कितना  … कितना प्यार है
मेरे भीतर ओ पृथ्वी !

- शलभ श्रीराम सिंह  . 

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

पृथ्वी

पृथ्वी धीरे-धीरे नष्ट हो रही है
जैसे नष्ट हो रहा है घर
जैसे नष्ट हो रहा है जंगल
जैसे नष्ट हो रही है तन्मयता
जैसे नष्ट हो रही है समझदारी

नष्ट हो रहा है साधारण का प्रकाश
नष्ट हो रहा है बीत चुका युग
नष्ट हो रहा है प्रेम के लिए एकांत
नष्ट हो रहा है सारा समर्थ-असमर्थ

बढ़ रहा है सिर्फ झूठ
बढ़ रहा है सिर्फ छल
बढ़ रहा है सिर्फ सुनसान
बढ़ रहा है सिर्फ प्रश्न-चिन्ह

पृथ्वी धीरे-धीरे नष्ट हो रही है
जैसे नष्ट हो रही है दोपहर
जैसे नष्ट हो रही है नाव
जैसे नष्ट हो रही है सांस

जैसे नष्ट हो रहा है बढ़िया स्वभाव
जैसे नष्ट हो रहा है सच
जैसे नष्ट हो रहा है बचपन
जैसे नष्ट हो रहा है चिड़िया का गाना इस पृथ्वी से।

- शहंशाह आलम  . 

यह पृथ्वी रहेगी

मुझे विश्वास है
यह पृथ्वी रहेगी
यदि और कहीं नहीं तो मेरी हड्डियों में
यह रहेगी जैसे पेड़ के तने में
रहते हैं दीमक
जैसे दाने में रह लेता है घुन
यह रहेगी प्रलय के बाद भी मेरे अंदर
यदि और कहीं नहीं तो मेरी ज़बान
और मेरी नश्वरता में
यह रहेगी

और एक सुबह मैं उठूंगा
मैं उठूंगा पृथ्वी-समेत
जल और कच्छप-समेत मैं उठूंगा
मैं उठूंगा और चल दूंगा उस से मिलने
जिस से वादा है
कि मिलूंगा ।

- केदारनाथ सिंह . 

पृथ्वी का सामान्य ज्ञान

पृथ्वी-
घोर अंधकार में घूमती हुई पृथ्वी
देख रही है
भय और विस्मय-भरी नज़रों से
अपनी धुरी को
उसे अब पता चला है
वह नाच रही है
एक मिसाइल की नोक पर।

- नोमान शौक़ . 

कैसा पानी कैसी हवा

किस तरह होती जा रही है दुनिया
कैसे छोड़ कर जाऊंगा मैं
बच्चों तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को
इस कांटेदार भूल-भुलैया में

किस तरह और क्या सोचते हुए
मरूंगा मैं कितनी मुश्किल से
सांस लेने के लिए भी जगह होगी या नहीं
खिड़की से क्या पता
कब दिखना बंद हो हरी पत्तियों के गुच्छे

हरी पत्तियों के गुच्छे नहीं होंगे
तो मैं कैसे मरूंगा
मैं घर में पैदा हुआ था
घर पेड़ का सगा था
गाँव में बड़ा हुआ
गाँव खेत-मैदान का सगा था
पर अब किस तरह रंग बदल रही है दुनिया
मैं कारखानों में फंसी आवाज़ों के बिस्तर पर
नहीं मरूंगा

कारखाने ज़रूरी हैं
कोई अफ़सोस नहीं
आदमी आकाश में सड़कें बनाये
कोई दिक्कत नहीं

पर वह शैतान
उसके नाखून   … भयानक जबड़े  …
वह शहरों गावों पर मंडरा रहा है
और हमारी परोपकारी संस्थाएं
हर घर से उस के लिए
जीवित मांस की व्यवस्था कर रही हैं।

घरों की पसलियों पर
कारखानों की कुहनियों का बोझ
गलत बात है
स्याह रास्ता अंतहीन अंत जैसा
और जुगनुओं सी टिमटिमाती
भली आत्माओं के दो-चार शब्द

हरी पत्तियों का गुच्छा होगा
तब भी दिक्कत आएगी
सोच-सोच कर
तुम्हारे बच्चों के बच्चे किस तरह
रास्ता बनाएंगे
कैसा पानी कैसी हवा
ईंधन का पता नहीं क्या करेंगे ?
सच मरते वक़्त अपने को माफ़ नहीं
कर पाऊंगा मैं।

- चंद्रकांत देवताले  . 

सब्ज़ लम्हे

सफ़ेदा चील जब थक कर कभी नीचे उतरती है 
पहाड़ों को सुनाती है 
पुरानी दास्तानें पिछले पेड़ों की  … 

वहां देवदार का इक ऊंचे कद का पेड़ था पहले 
वो बादल बाँध लेता था कभी पगड़ी की सूरत अपने पत्तों पर 
कभी दोशाले की सूरत उसी को ओढ़ लेता था  … 
हवा की थाम कर बाहें 
कभी जब झूमता था, उस से कहता था,
मेरे पाँव अगर जकड़े नहीं होते,
        मैं तेरे साथ ही चलता। 

उधर शीशम था, कीकर से कुछ आगे 
बहुत लड़ते थे वह दोनों 
मगर सच है कि कीकर उसके ऊंचे कद से जलता था 
सुरीली सीटियां बजती थीं जब शीशम के पत्तों में 
परिंदे बैठ कर शाखों पे, उसकी नकलें करते थे  … 

वहां इक आम भी था 
जिस पे एक कोयल कई बरसों तलाक आती रही  … 
जब बौर आता था  … 
उधर दो-तीन थे जो गुलमुहर, अब एक बाकी है,
वह अपने जिस्म पर खोदे हुए नामों को ही सहलाता रहता है। 

उधर एक नीम था 
जो चांदनी से इश्क करता था  … 
नशे में नीली पड़ जाती थीं सारी पत्तियां उसकी। 

ज़रा और उस तरफ परली पहाड़ी पर,
बहुत से झाड़ थे जो लम्बी-लम्बी सांसें लेते थे,
मगर अब एक भी दिखता नहीं है उस पहाड़ी पर !
कभी देखा नहीं, सुनते हैं, उस वादी के दामन में,
बड़े बरगद के घेरे से बड़ी एक चम्पा रहती थी,
जहाँ से काट ले कोई, वहीँ से दूध बहता था,
कई टुकड़ों में बेचारी गयी थी अपने जंगल से  … 

सफ़ेदा चील इक सूखे हुए से पेड़ पर बैठी 
पहाड़ों को सुनाती है पुरानी दास्तानें ऊंचे पेड़ों की,
जिन्हें इस पस्त क़द इन्सां ने काटा है, गिराया है,
कई टुकड़े किये हैं और जलाया है  !!

- गुलज़ार . 


छोटी-सी दुनिया

यही जो छोटी-सी दुनिया हमें मिली है
सच है, सुन्दर है
और असह्य भी-
यही सम्हाले नहीं सम्हलती है
यही भरी है इतने हर्ष से, यही द्रवित है इतने विषाद से।

अपने बगल में टुकुर-टुकुर ताकती गिलहरी से
कहा फूल ने-
एक बुढ़िया अपनी गुदड़ी से निकालकर
एक तोता खाया फल अपनी नातिन को देते हुए
यही बोली।

छोटी सी है तितलियों और मधुमक्खियों की दुनिया,
छोटी सी दुनिया तोतों और बगुलों की,
आम और अमरुद की, इमलियों और बेरों की।

बड़ा सपना देखती
बड़ी सचाई को संक्षिप्त करती
सूरज और चाँद को
नक्षत्रों और अंतरिक्ष को
हथेली पर अक्षत की तरह
पवित्र रखती 
यही
छोटी-सी दुनिया 
हमें मिली है
सच है
सुन्दर है।

- अशोक वाजपेयी .

बुधवार, 5 मार्च 2014

संवेदना - The Thread that Binds


मानवीय सुख-दुःख निरंतर अभिव्यक्ति का मार्ग तलाशते हैं। सुख का वह एक क्षण जब मनुष्य को लगता है धूप का सोना बिखरा है तो मानो उसी के लिए, बारिश यदि होती है तो बस उसे ही भिगोने के लिए, तारों से भरा-पूरा आसमान उस से ही बातें करना चाहता है, दुनिया का हर फूल उसे देख कर मुस्कुराता है  … जैसे सब कुछ स्पंदित है उसके ह्रदय की गति से, चारों ओर सौंदर्य और स्फूर्ति भरी है उसकी ही विस्मित दृष्टि की तरह। तब वह अपने से बाहर आ कर जुड़ जाता है प्रकृति से, अपने इर्द-गिर्द के संसार से, उसे रचने, उस में बसने वालों से। कवि इसे अपना 'हरापन' कहता है। और यही हरापन उसकी अभिव्यक्ति को जीवित रखता है। ये हरापन वो संवेदना का तार है जो उसकी जड़ों से टहनियों तक रक्त संचार करता है और झुलसती हुई गरमी में भी उसे सघन, छायादार रखता है। कवि कह उठता है
" मेरा गीत न गा पाया यदि दर्द आदमी का
अगर नहीं कर पाया थमे पसीने का टीका
भाषा बोल न पायी हारी-थकी झुर्रियों की …
 … कुछ नहीं "
यही संवेदना मनुष्य को जोड़ती है अपने जैसों से, उनके सुख-दुःख से, हार-जीत से, उनके और अपने बीच के उस तंतु से 'जो आदमी को पेड़ों से अलग करता है।' किन्तु वह इस सत्य से अनभिज्ञ भी नहीं कि
"कहने पर भी कहीं
कही जाती है पीड़ा
पीड़ा की भूमि पर उगाता हूँ
फूल, वृक्ष, लताएं
सींचकर संचित अनुभवों से अपने। "
- केशव .
 कटु ही सही, जीवन की तेज़ बहती हुई धारा में गहरे उतर कर निकाला हुआ कवि का सत्य जिस वेदना को अभिव्यक्ति दे रहा है, वह उस संवेदना की ही तो कड़ी है जिसे वह जीवित रखना चाहता है, जब वह कह उठता है -
" वेदना में दूसरे की
वेदना जो है दिखाता
वेदना से मुक्ति का
निज हर्ष ही वह है छिपाता  … "
इसी लिए वह शब्दों से जूझता है कि सत्य को परिभाषित कर सके।  इसी लिए बार-बार रचता है कि उसके भीतर के मनुष्य का संवाद बाहर के मनुष्य से चलता रहे जिस से वह उस अदेखी डोरी से बंधा है जिसे संवेदना कहते हैं।
" खुदा को पा गया वाइज़ मगर है
ज़रुरत आदमी को आदमी की "
फिराक़ गोरखपुरी के इस शेर के साथ , चिरंतन का यह अंक आप सब के लिए -

- मीता .
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क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

मैं दुखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा,
रीति दोनो ने निभाई,
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी;
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

एक भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा?
सत्य को मूंदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?क्या करूँ?

कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरे से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का रहे व्यापार जारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

क्यों न हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुख नहीं बंटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ ?

- हरिवंश राय बच्चन
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संयोगवश 

मैंने एक दिन सड़क पर
एक आदमी को देखा
और मुझे लगा मैं इसे जानता हूँ।

'गलत'- मेरे मन ने कहा
तुम इसे नहीं जानते।

जानता हूँ - मैंने कहा
यह वही आदमी है
जो मुझे ट्रेन में मिला था

एकदम गलत - मेरे मन ने फिर कहा
यह वह नहीं है !

है !
नहीं है -
मैं देर तक सोचता रहा
कि तभी मुझे दीखा
उसके धूप भरे चेहरे पर वह चिकना सा द्रव
जो आदमी को पेड़ों से अलग करता है।

वही - वही
यह वही आदमी है -
मैंने खुद से कहा
और बहुत दिनों बाद
मुझे एक ऐसी खुशी हुई
जिसके बारे में किताबों में
मैंने कहीं कुछ नहीं पढ़ा है !

- केदारनाथ सिंह  .
________________________________________

मेरा चेहरा 

मेरा चेहरा
अगर नहीं बन पाया मेरा गीत
कुछ नहीं  …

चेहरा जिस पर धूल पड़ी है झीनी-झीनी सी
जिसके नीचे आग दबी है नयी रौशनी की
खाकर मार समय की मेरी बोझल पेशानी
अगर नहीं गा पायी मेरी टूटन का संगीत
कुछ नहीं

मेरा गीत न गा पाया यदि दर्द आदमी का
अगर नहीं कर पाया थमे पसीने का टीका
भाषा बोल न पायी हारी-थकी झुर्रियों की
लाख मिले मुझको बाज़ारू जीत
कुछ नहीं।

-------------- और ------------
हरापन नहीं टूटेगा 

टूट जायेंगे
हरापन नहीं टूटेगा

कुछ गए दिन
शोर को कमज़ोर करने में
कुछ बिताए
चाँदनी को भोर करने में
रोशनी पुरज़ोर करने में

चाट जाये धूल की दीमक भले ही तन
हरापन नहीं टूटेगा

लिख रही हैं वे शिकन
जो भाल के भीतर पड़ी हैं
वेदनाएँ जो हमारे
वक्ष के ऊपर गढ़ी हैं

बन्धु! जब-तक
दर्द का यह स्रोत-सावन नहीं टूटेगा

हरापन नहीं टूटेगा

- रमेश रंजक  .
___________________________________

उसने मेरा हाथ देखा 

उसने मेरा हाथ देखा और सर हिला दिया
"इतनी भाव प्रवणता
दुनिया में कैसे रहोगे !
इस पर अधिकार पाओ , वरना
लगातार दुःख दोगे
निरंतर दुःख सहोगे। "

यह उधड़े मांस सा दमकता अहसास
मैं जानता हूँ , मेरी कमज़ोरी है
हलकी सी चोट इसे सिहरा देती है
एक टीस है जो अंतरतम तक दौड़ती चली जाती है
दिन का चैन और रातों की नींद उड़ा देती है
पर यही एहसास तो मुझे ज़िंदा रखे है
यही तो मेरी शहज़ोरी है !
वरना मांस जब मर जाता है
जब खाल मोटी हो कर ढाल बन जाती है
हल्का सा कचोका तो दूर , आदमी गहरे वार
बेशर्मी से हंस कर सह जाता है ;
जब उसका हर आदर्श दुनिया के साथ
चलने की शर्त में ढल जाता है
जब सुख सुविधा और सम्पदा उसके पाँव चूमते हैं -
वह मज़े से खाता-पीता और सोता है
तब यही होता है ; सिर्फ
कि वह मर जाता है।
वह जानता नहीं, लेकिन
अपने कन्धों पर अपना शव
आप ढोता है।

- उपेन्द्रनाथ अश्क  .
___________________________________

कोई नहीं उसके साथ 

क्या दुःख कविता में धुंधला हो जाता है
या कभी-कभी चमकीला भी
जीवन में पछाड़े खाती उस औरत का
तार-तार होता विलाप
पराये शब्दों में जाकर क्या से क्या हो जायेगा
कहना कितना मुश्किल है

तहस-नहस कर दी गयी उसकी झोपड़ी
चिथड़ों-बरतन भांडों समेत
बेदखल कर दी गयी जो विधवा
डरते-कांपते अधनंगे तीनों बच्चे खड़े
तकते उसे जैसे वह कोई खौफनाक दृश्य

तीसरे जो भी बांचेंगे
विस्थापन की यह हिंसा
दिखाई देगा क्या उन्हें
ऐसे ही किसी हड़कम्प में ध्वस्त होता हुआ अपना घर
बीसवीं के पटाक्षेप के बाद भी धरती पर
कितनी जगह है खाली बसने-बसाने के लिए
फिर भी पुश्तैनी कब्ज़ों को छोड़
घास-पात को निशाना बनाता है
हत्यारों का अंधा बुल्डोज़र
बसाने के बदले उजाड़ने की इस क्रूरता को
रचते हुए कितना कुछ टूट रहा है भीतर ही भीतर
और आस-पास की दुनिया में कोई फर्क नहीं पड़ रहा
कुछ नहीं हुआ जैसे चुप नदी नर्मदा
सुबह और पहाड़ चुप
वैसे ही मुंह बंद लोगों कि परछाइयाँ।

विपदा के सिवा कोई नहीं है
फिलवक़्त उस औरत के साथ
जब कि पूरा देश है चारों तरफ
हज़ारों शब्द हैं आंसू पोंछने
और कमज़ोरों के साथ खड़े होने के बारे में
पर एक भी शब्द उसके साथ
ऐसा कुछ नहीं कर रहा।

- चंद्रकांत देवताले  .
_____________________________________

नदी पार करते हुए 

मैं नहीं देख पाता
अपनी ओर बढ़ती हुई लहरों को
डरकर दूर भागती मछलियों को
किनारे से कटती हुई मिट्टी को

कैसे जान पाता नदी का दुःख
अगर गुज़र जाता मैं भी पुल से
औरों की तरह !

- नोमान शौक़  .
'रात और विषकन्या' से  .
______________________________________

The Little Boy and The Old Man .


Said the little boy, "Sometimes I drop my spoon."
Said the old man, "I do that too."

The little boy whispered, "I wet my pants."
"I do that too," laughed the little old man.

Said the little boy, "I often cry."
The old man nodded, "So do I."

"But worst of all," said the boy, "it seems
Grown-ups don't pay attention to me."

And he felt the warmth of a wrinkled old hand.
"I know what you mean," said the little old man.

- Shel Silverstein .

कोई नहीं उसके साथ


क्या दुःख कविता में धुंधला हो जाता है
या कभी-कभी चमकीला भी
जीवन में पछाड़े खाती उस औरत का
तार-तार होता विलाप
पराये शब्दों में जाकर क्या से क्या हो जायेगा
कहना कितना मुश्किल है

तहस-नहस कर दी गयी उसकी झोपड़ी
चिथड़ों-बरतन भांडों समेत
बेदखल कर दी गयी जो विधवा
डरते-कांपते अधनंगे तीनों बच्चे खड़े
तकते उसे जैसे वह कोई खौफनाक दृश्य

तीसरे जो भी बांचेंगे
विस्थापन की यह हिंसा
दिखाई देगा क्या उन्हें
ऐसे ही किसी हड़कम्प में ध्वस्त होता हुआ अपना घर
बीसवीं के पटाक्षेप के बाद भी धरती पर
कितनी जगह है खाली बसने-बसाने के लिए
फिर भी पुश्तैनी कब्ज़ों को छोड़
घास-पात को निशाना बनाता है
हत्यारों का अंधा बुल्डोज़र
बसाने के बदले उजाड़ने की इस क्रूरता को
रचते हुए कितना कुछ टूट रहा है भीतर ही भीतर
और आस-पास की दुनिया में कोई फर्क नहीं पड़ रहा
कुछ नहीं हुआ जैसे चुप नदी नर्मदा
सुबह और पहाड़ चुप
वैसे ही मुंह बंद लोगों कि परछाइयाँ।

विपदा के सिवा कोई नहीं है
फिलवक़्त उस औरत के साथ
जब कि पूरा देश है चारों तरफ
हज़ारों शब्द हैं आंसू पोंछने
और कमज़ोरों के साथ खड़े होने के बारे में
पर एक भी शब्द उसके साथ
ऐसा कुछ नहीं कर रहा।

- चंद्रकांत देवताले  . 

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

The Little Boy and the Old Man

Said the little boy, "Sometimes I drop my spoon."
Said the old man, "I do that too."


The little boy whispered, "I wet my pants."
"I do that too," laughed the little old man.


Said the little boy, "I often cry."
The old man nodded, "So do I."


"But worst of all," said the boy, "it seems
Grown-ups don't pay attention to me."


And he felt the warmth of a wrinkled old hand.
"I know what you mean," said the little old man.

- Shel Silverstein .

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

मैं दुखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा,
रीति दोनो ने निभाई,
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी;
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

एक भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा?
सत्य को मूंदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?क्या करूँ?

कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरे से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का रहे व्यापार जारी?
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?

क्यों न हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुख नहीं बंटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ ?

- हरिवंश राय बच्चन 

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

मेरा चेहरा

मेरा चेहरा
अगर नहीं बन पाया मेरा गीत
कुछ नहीं  …

चेहरा जिस पर धूल पड़ी है झीनी-झीनी सी
जिसके नीचे आग दबी है नयी रौशनी की
खाकर मार समय की मेरी बोझल पेशानी
अगर नहीं गा पायी मेरी टूटन का संगीत
कुछ नहीं

मेरा गीत न गा पाया यदि दर्द आदमी का
अगर नहीं कर पाया थमे पसीने का टीका
भाषा बोल न पायी हारी-थकी झुर्रियों की
लाख मिले मुझको बाज़ारू जीत
कुछ नहीं

- रमेश रंजक  . 

उसने मेरा हाथ देखा

उसने मेरा हाथ देखा और सर हिला दिया
"इतनी भाव प्रवणता
दुनिया में कैसे रहोगे !
इस पर अधिकार पाओ , वरना
लगातार दुःख दोगे
निरंतर दुःख सहोगे। "

यह उधड़े मांस सा दमकता अहसास
मैं जानता हूँ , मेरी कमज़ोरी है
हलकी सी चोट इसे सिहरा देती है
एक टीस है जो अंतरतम तक दौड़ती चली जाती है
दिन का चैन और रातों की नींद उड़ा देती है
पर यही एहसास तो मुझे ज़िंदा रखे है
यही तो मेरी शहज़ोरी है !
वरना मांस जब मर जाता है
जब खाल मोटी हो कर ढाल बन जाती है
हल्का सा कचोका तो दूर , आदमी गहरे वार
बेशर्मी से हंस कर सह जाता है ;
जब उसका हर आदर्श दुनिया के साथ
चलने की शर्त में ढल जाता है
जब सुख सुविधा और सम्पदा उसके पाँव चूमते हैं -
वह मज़े से खाता-पीता और सोता है
तब यही होता है ; सिर्फ
कि वह मर जाता है।
वह जानता नहीं, लेकिन
अपने कन्धों पर अपना शव
आप ढोता है।

- उपेन्द्रनाथ अश्क  .


हरापन नहीं टूटेगा

टूट जायेंगे
हरापन नहीं टूटेगा

कुछ गए दिन
शोर को कमज़ोर करने में
कुछ बिताए
चाँदनी को भोर करने में
रोशनी पुरज़ोर करने में

चाट जाये धूल की दीमक भले ही तन
हरापन नहीं टूटेगा

लिख रही हैं वे शिकन
जो भाल के भीतर पड़ी हैं
वेदनाएँ जो हमारे
वक्ष के ऊपर गढ़ी हैं

बन्धु! जब-तक
दर्द का यह स्रोत-सावन नहीं टूटेगा

हरापन नहीं टूटेगा

- रमेश रंजक  . 

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

नदी पार करते हुए

मैं नहीं देख पाता
अपनी ओर बढ़ती हुई लहरों को
डरकर दूर भागती मछलियों को
किनारे से कटती हुई मिट्टी को

कैसे जान पाता नदी का दुःख
अगर गुज़र जाता मैं भी पुल से
औरों की तरह !

- नोमान शौक़  .
'रात और विषकन्या' से  . 

संयोगवश


मैंने एक दिन सड़क पर
एक आदमी को देखा
और मुझे लगा मैं इसे जानता हूँ।

'गलत'- मेरे मन ने कहा
तुम इसे नहीं जानते।

जानता हूँ - मैंने कहा
यह वही आदमी है
जो मुझे ट्रेन में मिला था

एकदम गलत - मेरे मन ने फिर कहा
यह वह नहीं है !

है !
नहीं है -
मैं देर तक सोचता रहा
कि तभी मुझे दीखा
उसके धूप भरे चेहरे पर वह चिकना सा द्रव
जो आदमी को पेड़ों से अलग करता है।

वही - वही
यह वही आदमी है -
मैंने खुद से कहा
और बहुत दिनों बाद
मुझे एक ऐसी खुशी हुई
जिसके बारे में किताबों में
मैंने कहीं कुछ नहीं पढ़ा है !

- केदारनाथ सिंह  . 

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

नया दिन .











"साल दर साल वही किस्सा है
कुछ न बदला है न बदलेगा, मगर
फिर भी इस साल से उम्मीदें हैं
ये गए साल से बेहतर होगा   … "
हर नया साल, पुराने साल की टूटी किरचों पर पाँव रखता आता है। साल गुज़र जाता है जाने कितने विश्वास, न जाने कितने ही भ्रम तोड़ता, आस्थाओं पर उंगलियां उठाता, यकीनों में दरार पैदा करता हुआ। अपने भीतर की इस टूटन से कराह कर, कह बैठती है लेखनी -
"जैसे सोच की कंघी में से
एक दंदा टूट गया
जैसे समझ के कुर्ते का
एक चीथड़ा उड़ गया
जैसे आस्था की आँखों में
एक तिनका चुभ गया  …
जैसे विश्वास के कागज़ पर
सियाही गिर गयी …
और जैसे धरती ने आसमान का
एक बड़ा उदास सा ख़त पढ़ा
नया साल कुछ ऐसे आया  …"
- अमृता प्रीतम .
अपने इर्द-गिर्द के हालात से तड़प कर चीख उठता है शायर -
"भूखे, ज़र्द, गदागर बच्चे
कार के पीछे भाग रहे हैं  …
जश्न मनाओ साल-ए-नौ के"
- साहिर लुधियानवी.
मगर फिर भी हर साल, हम नए साल का स्वागत करते ही हैं, क्योंकि भीतर कहीं एक उम्मीद लगातार रौशन रहती है, कि बदलाव ज़रूर आयेगा, बेहतरी होगी, सुकून औ सुकूत मिलेगा। कहाँ पढ़ा था याद नहीं, मगर ये उद्धरण दिलचस्प लगा -
"I believe in looking forward and moving ahead. Even a car has it's windscreen larger than it's rearview mirror."
मनुष्य अनास्था से आस्था की तरफ बार-बार जाता है। यही तो है जिजीविषा, कि गिरता है तो फिर हौसला बटोर कर उठता है। वैसे ही, जैसे डूब चुका सूरज नए दिन के साथ फिर उगता है और अँधेरे में डूबी धरती हुलस कर धूप के लिए अपना आँचल फैला लेती है।
वही अमृता कह उठती हैं -
"… इंसान के इख्तियार में सिर्फ इतना है -
कि जिबह हुए टुकड़े को
वह घबरा के फेंक दे, और डरे,
या निडर उसे कबाब की तरह भूने, खाये
और साँसों की शराब पीता
वह अगले टुकड़े का इंतज़ार करे …"

नहीं मिटती ज़िन्दगी से उम्मीद, नहीं टूटता आदमी का आदमी पर से भरोसा  … 

श्रद्धापूर्वक नमन उन सभी को जो गए वर्ष हमारा साथ छोड़ गए, और जिन की लेखनी का यकायक चुप हो जाना स्तब्ध कर गया। उन की कमी हमेशा खलती रहेगी। 

नया वर्ष मंगलमय हो इसी कामना के साथ,
- मीता . 
_________________________

Masters (हिंदी)-

आज फिर शुरू हुआ जीवन

आज फिर शुरू हुआ जीवन
आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी
आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा
जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया
आज एक छोटी-सी बच्ची आयी, किलक मेरे कन्धे चढ़ी
आज मैंने आदि से अन्त तक पूरा गान किया
आज फिर जीवन शुरू हुआ।

-  रघुवीर सहाय  . 
_______________________________________
ज़िन्दगी 

ज़िन्दगी को
गन्ने की तरह
चूसने में मुझे मज़ा आता है।

मुझे अच्छा लगता है
तेज़ कुल्हाड़ी से
बहुत पक्की लकड़ी काटना।

मुझे अच्छा लगता है
गाँव की तंग कीचड भरी गली को
ईंट-पत्थर के टुकड़ों से पाटना।

अच्छा लगता है मुझे
हर सुबह
साफ़ दाढ़ी बना लेना।

गर्मी के दिनों में
सूख गयी नदियों की रेत में
झिरिया खना लेना।

अच्छा लगता है
अगर मेरी रात में भी
कोई चिड़िया चहके।

ज़िन्दगी आस-पास की अगर
किसी जड़ी-बूटी की तरह 
महके।

अच्छा लगता है अगर मैं
अपनी रात को सिरहाने या पैताने
गुडी-मुड़ी करके चाहे जैसा घर पाऊँ !

अच्छा लगता है अगर
नए आये दिन को मैं
आगे बढ़ कर भुजाओं में भर पाऊँ !

-------------------- और ------------------

सूरज का गोला

सूरज का गोला
इसके पहले ही कि निकलता
चुपके से बोला, 
हमसे - तुमसे, इससे - उससे
कितनी चीजों से
चिडियों से पत्तों से
फूलो - फल से, बीजों से-
"मेरे साथ - साथ सब निकलो
घने अंधेरे से
कब जागोगे, अगर न जागे, मेरे टेरे से ?"
आगे बढकर आसमान ने
अपना पट खोला
इसके पहले ही कि निकलता
सूरज का गोला
फिर तो जाने कितनी बातें हुईं
कौन गिन सके इतनी बातें हुईं
पंछी चहके कलियां चटकी
डाल - डाल चमगादड लटकी
गांव - गली में शोर मच गया
जंगल - जंगल मोर नच गया
जितनी फैली खुशियां
उससे किरनें ज्यादा फैलीं
ज्यादा रंग घोला
और उभर कर ऊपर आया
सूरज का गोला
सबने उसकी आगवानी में
अपना पर खोला ।
- भवानी प्रसाद मिश्र  .
_______________________________________

मैं सुबह का गीत हूँ !

नए नए विहान में
असीम आसमान में 
        मैं सुबह का गीत हूँ !
मैं गीत की उड़ान हूँ 
मैं गीत की उठान हूँ 
मैं दर्द का उफान हूँ 
        मैं उदय का गीत हूँ 
        मैं विजय का गीत हूँ 
        सुबह-सुबह का गीत हूँ 
        मैं सुबह का गीत हूँ। 
चला रहा हूँ छिप के 
रौशनी के लाल तीर मैं 
जगा रहा हूँ पत्थरों के 
दिल में आज पीर मैं 
        गुदगुदा के फूल को 
        हंसा रहा हूँ आज मैं 
        ये सूना-सूना आसमां 
        बसा रहा हूँ आज मैं 
सघन तिमिर के बाद फिर 
मैं रौशनी का गीत हूँ 
मैं जागरण का गीत हूँ 
मैं सुबह का गीत हूँ। 
        बादलों की ओट से मैं 
        छिप के मुस्कुरा उठूँ 
        मैं ज़मीन से उड़ूँ 
        कि आसमां पे छा उठूँ 
मैं उड़ूँ कि आसमां के 
होश संग उड़ चलें 
मैं मुडूं कि ज़िन्दगी की 
राह संग मुड़ चलें 
        मैं ज़िन्दगी की राह पर 
        मुसाफिरों की जीत हूँ 
        मैं सुबह का गीत हूँ। 
स्वर्ण गीत ले 
विहग कुमार-सा चहक उठूँ 
मैं ख़िज़ाँ की डाल पर 
बहार-सा महक उठूँ 
         कंटकों के बंधनों में 
         फूल का उभार हूँ 
         मैं पीर हूँ, मैं प्यार हूँ 
         बहार हूँ, खुमार हूँ 
भविष्य मैं महान हूँ 
अतीत, वर्तमान हूँ 
मैं युग-युगों का गीत हूँ 
        युग-युगों का गीत हूँ 
        मैं सुबह का गीत हूँ। 

- धर्मवीर भारती  . 
_______________________________________________

 हम जो सोचते हैं। 

न रास्ता कहीं मुड़ता है
   न सड़कें कहीं जाती हैं।

'हम'-
  एक जयघोष है
      जिसे हवा
      घर से चौराहे तक
      दिन भर भटकाती है।

हर नया दिन
   एक समझौता है
   जो हमें जोड़ता है
   पर घंटे की हर चोट
   कहीं न कहीं अलगाती है।

एक गति है
   जो हमसे छूट कर
   नगर की तमाम घड़ियों से परे
   कहीं चलती चली जाती है।

हर जेब के भीतर
   कुछ दबे हुए फूल हैं
   और हर फूल के नीचे
   एक सुलगती हुई भाषा
   जिसे सूरज समझता है।

एक वाद्य है
   जो देर-देर तक
   हमारे नृत्य और लयों के बाद
   कहीं सूने में बजता है।

समुद्र
   वहाँ नहीं है
   जहाँ दिन के सतरंगे घोड़े
   उतरते हैं
वह हमारे आस पास,
   हमारी छाती में,
   हमारी हड्डियों के भीतर है
   जहाँ रात के सन्नाटे में
        हम सोचते-से रहते हैं।

सूर्योदय
   चाहे एक
      खाली गुलदस्ता हो
चाहे एक आघातहीन
      ताज़ा समाचार
पर बेशक हर बार
      वह एक हल्का सा उत्तर है

हम चुप हों
   पर वह चुप्पी
       बच्चे सुनते हैं
और यों
   हमारा हर शब्द
   किसी नए ग्रहलोक में
        एक जन्मान्तर है।

- केदारनाथ सिंह  . 
___________________________________________

 एक दृष्टिकोण 

सूरज को सारे खून माफ़ हैं।
दुनिया के हर इंसान का
वह रोज़ एक दिन कतल करता है
और हर एक उम्र का एक टुकड़ा
रोज़ जिबह होता है
इंसान के इख्तियार में सिर्फ इतना है -
कि जिबह हुए टुकड़े को
वह घबरा के फेंक दे, और डरे,
या निडर उसे कबाब की तरह भूने, खाये
और साँसों की शराब पीता
वह अगले टुकड़े का इंतज़ार करे …

- अमृता प्रीतम  .
_____________________________________________

हमारे मेहमान -

पुराना दिन 

तुम वहाँ कैसे हो गुज़रे हुए दिन और साल ?
यह पूछते हुए पुरानी एल्बम के भुरभुरे पन्ने  नहीं पलट रहा हूँ

तुम्हारी आवाज़ आज के नए घर में गूंजती है
और हमारी आज की भाषा को बदल देती है

एक समकालीन वाक्य उतना भी तो समकालीन नहीं है
वह पुरानी लय का विस्तार है
और इतिहास की शिराओं का हमारी ओर खुलता घाव

वह तुम्हारे विचारों का निष्कर्ष है हमारी आज की मौलिकता
पुराने आंसुओं का नमक आज की हंसी का सौंदर्य

मरा नहीं है वह कोई भी पुराना दिन
राख, धूल और कुहासे के नीचे वह प्रतीक्षा की धड़कन है
गवाही के दिन वह उठ खड़ा होगा
और खिलाफ गवाही के दस्तावेज़ के नीचे दस्तखत करेगा।

- महेश वर्मा  .
________________________________________________

सुबह-सुबह उठ जाऊंगी

कल सुबह मैं
अवश्य सुबह-सुबह
उठ जाऊंगी
नहीं, पड़ी नहीं रहूंगी
औंधी बिस्तर में
यह कह कि मुझको
उठकर ही क्या
करना है

कल सुबह मैं
अवश्य सुबह-सुबह
उठ जाऊंगी और
बाहर जा कर
दोनों बाहों को
एक बड़े द्वार सा
खुलने दूँगी
ताकि सूरज
भीतर आये
तब मैं उस आ गयी धूप को
आसन दे कर
बहुत देर तक
माथे पर उसकी
गर्म हथेली रख लूंगी

कल सुबह मैं
सुबह-सुबह
खड़ी रहूंगी पार्क की
रेलिंग पकडे
देखूंगी उस कबाड़
बटोर रहे बूढ़े को
जो हमारी फेंकी
इतनी बड़ी कूड़े की ढेरी में
ढूंढ रहा होगा
चिथड़े जो गुदड़ी बन जाएं,
पुराने प्लास्टिक की थैलियां
जो गल कर चप्पल बन जाएं

नहीं, मैं उसे यह सब करते देख
अन्य दिनों की तरह
घिनाऊंगी नहीं
क्योंकि तब तक धूप
बीन चुकी होगी
मुझमें से वह सब
जो रह जायेगा कहीं
बाद मेरे भी

मैं कल सुबह
अवश्य सुबह-सुबह
उठ जाऊंगी।

- सुनीता जैन   .
_____________________________________________

इनकी कलम से -

नया दिन !

हर दिन
एक सा होता है...
वही दोहराव देख
मन कितना रोता है...

वैसे ही
चलता जाता है क्रम...
बढ़ते ही जाते हैं
अन्यान्य भ्रम...

कितनी तो
विवश हैं राहें...
कोई नहीं थामता
किसी की बाहें...

ज़िन्दगी हर दिन
ढलती शाम हो जाती है...
गम की आंधियां
बहुत सताती हैं...

प्रेम कहीं कोहरे में
ओझल होता है...
मैं तुम के द्वन्द में
मन बोझल होता है...

बादल
नए गगन की तलाश में
नयी राह पकड़ते हैं...
अजीब स्थिति है,
एक दूसरे के पूरक होकर
मन-मस्तिष्क आपस में खूब झगड़ते हैं...

ये सब
दिन भर
चलता रहता है...
पर ये भी सच है
हर रात के बाद
एक नया दिन निकलता है...

नए दिन की देहरी पर
नए विश्वास के साथ
चरण धरना है...
आसमान के
सूरज का स्वागत
धरा के अनगिन सूर्यों को करना है...

अपना तेज़
पहचान कर...
अपनी क्षमताओं को
जान कर...

जब हम
सूरज सम
लोककल्यान की खातिर जलेंगे...
तब देखना
नए दिन की आँखों में
सुनहरे स्वप्न पलेंगे...

"सर्वे भवन्तु सुखिनः"
वाली प्रार्थना
फलित हो जायेगी...
सुन्दर है कितनी ये धरा
हम सबके पूण्य प्रताप से
और ललित हो जायेगी...!

- अनुपमा पाठक  . 
____________________________________________

नया दिन  … 

रोज़ एक नए दिन का पार्सल दरवाज़े पर छोड़ जाता है वो
रोज़ नया, अज्ञात, मोहक एक उपहार।

रज़ाई में लिपटी
पिछले कल का कोर अपने पैरों तले और दबाती हूँ
सुस्ताते हुए, कुछ जान बूझ कर
मैं अनदेखा करती हूँ, टालती हूँ
नया दिन अपरिचित, अंजाना, भय मिश्रित कौतूहल सा …

उठूँ, न उठूँ? यह चारा है क्या?
परदे से छनती हुई किरणें, बच्चों का चहचहाना, गाड़ियों का शोर-
नये दिन का आह्वान तो हो ही गया
अब मैं इसका हिस्सा बनूँ, न बनूँ, बस इतनी सी मेरी डोर है
चलो, फिर पिछले कल को समेट कर रख ही दें ताख पर
उतरें आज की सीढ़ियां,
दरवाज़े पर पड़ा पार्सल खोलें  …

शायद कुछ अनमोल, कुछ अनूठा और अपना हो
बचपन की किसी परी कथा सा रोचक
रोमांचक किसी सफ़र की तरह
नया दिन है, कुछ उदयमान तो हो ही सकता है
कोई आसरा तो दे ही सकता है

गुज़र जायेगा तो फिर समेटते रहोगी ,
उसका कोना अपने पैरों तले दबाओगी
तो क्यूँ न आज उसे गले लगा लो,
मिल तो लो उस के हर पल से …

कौन जाने क्या छिपा है इस दिन में?

- अनुराधा ठाकुर  . 

____________________________________________

दिन का दिन 

बंद माचिस की डिबिया में
कई जलते दिन रखे है
सूरज में आग लगा
बुझ जाती है बारूद वाली तीली

बूढ़ा सर पर बोझ लिए
जलाता है अपना दिन...
दिन साँसे फूकता रहे
इसलिए फूँक लेता है
दो चार कश
और उड़ते धुए में दिन की तलाश करता है।

औरत जो जलते चूल्‍हे
में दिन डाल देती है
तवे पर सेक कर
अरमानो को किसी
कोने में छिपा देती है
थाली में वही सिका
हुआ दिन खट्टी चटनी से परोसती है ..

देखा है उसे नन्हे से बच्चे को
जो दिन पर लोट कर उसकी
आलस भरी अंगड़ाई तोड़ता है
नदी के उस पार गेंद की तरह फेंक देता है दिन

आकाश में ठहरा सूरज
थक जाता है तन्हा
खुद में विस्फोटक भर
पानी में छपाक से कूद जाता है
फिर एक नये दिन के आगाज़ में….

- नीलम समनानी चावला  . 
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दिन 
वही पुराना सूरज,
रोज़ आसमान के
ठीक उसी कोने से,
ऐन उसी वक़्त पर,
आँख मलता उगता है।

पास के दरख्तों के
पहचाने झुरमुट से
फूटता है चिड़ियों का
वह सुना-सुना कलरव …

दूर सड़क पर कहीं
दौड़ते शहर का
इक बदस्तूर शोर
जैसे बहती हो नदी कोई।

चाय के पहले कप की
ताज़ी गर्माहट में ,
और अखबार की बासी कड़वाहट में ,
तकरीबन
रोज़
उसी ढर्रे पर चलती है
धूल खाये लम्हों की
लम्बी फेहरिस्त जैसी
ज़िन्दगी।

ज़र्द चेहरा, पीले से …
एक सीधी रेखा में
खड़े हैं हज़ारों दिन,
धुवाँ-धुवाँ,
सीले से।

कुछ मगर
किनारे से
कुरकुरे-करारे से,
धूप में नहाये हुए,
चमचमाते, चटखे से,
इधर-उधर अटके से
दिन, जो बीच-बीच में
ताक-झाँक जाते हैं …

वो
फ़क़त वही दिन हैं
जो तुम्हारी आँखों की
रौशनी में उगते हैं …
जो तुम्हारे होठों की
धुन पे मुस्कुराते हैं।

- मीता  .
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अनुवाद - 

एक और दिन आएगा

एक और दिन आएगा , एक स्त्रियोचित दिन
अपनी उपमा में स्पष्ट, अस्तित्व में सम्पूर्ण
हीरा परख में , शोभायात्रा जैसा
धूपदार, लचीला, एक हलकी परछाईं के साथ।
किसी को भी नहीं आयेगी छोड़ कर जाने की इच्छा।
सारी चीज़ें अतीत से बाहर की ,
प्राकृतिक और वास्तविक
अपने पुराने लक्षणों की पर्यायवाची होंगी।
जैसे कि समय गहरी नींद सोया हो छुट्टी में   …

एक और दिन आएगा , एक स्त्रियोचित दिन
भंगिमा में गीत जैसा
अभिवादन और वाक्यांश में नीलम।
पानी बहेगा चट्टान के सीने से।
न धूल , न अकाल , न पराजय।
और अगर फाख्ते को प्रेमियों के बिस्तर पर नहीं मिला एक छोटा सा घोंसला
तो वह दोपहर को सोयेगा
एक परित्यक्त कॉम्बैट टैंक के भीतर   …

- महमूद दरवेश  .
( फलीस्तीनी कवि )
अनुवाद - अशोक पांडे  .

( सदानीरा से साभार )
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आशावाद 

हम सुन्दर दिन देखेंगे, बच्चो
उजली धूप वाले दिन  …
हम अपनी द्रुतगामी नावों को खुले समुद्र में ले जायेंगे, बच्चो
हम उन्हें दौड़ाएंगे चमकीले, नीले विस्तृत सागर में  …
कल्पना करो पूरी गति से जाने की
वह मोटर का घूमना !
वह मोटर का गुर्राना !

आह ! बच्चो कौन बता सकता है
कितना अद्भुत होता है
सौ मील की गति को चूम सकना !

आज के दिन की सच्चाई है
हम रोशनी से नहाई सड़कों पर
सजी दूकानों को निहारते हैं
जैसे कोई परीकथा सुन रहे हों
ये कांच की दीवारों वाली
सतहत्तर मंज़िला दुकानें।
सच्चाई यह है
जब हम चिल्ला कर जवाब मांगते हैं
हमारे लिए काली किताब खुल जाती है !
चमड़े की पेटियों से हमारे हाथ बांध दिए जाते हैं !

यह सच है हमारे खाने की मेज़ पर
हफ्ते में एक दिन गोश्त तो है
मगर हमारे बच्चे काम से घर लौटते हैं
विवर्ण कंकालों की तरह  …

यह आज की सचाई है
लेकिन मुझ पर यकीन करो
हम अच्छे दिन देखेंगे बच्चो
देखेंगे उजली धूप वाले दिन
अपनी द्रुतगामी नौकाओं को दौड़ाएंगे खुले समुद्र में
हम उन्हें दौड़ाएंगे विस्तृत, चमकीले नीले सागर में।

- नाज़िम हिकमत  .
( तुर्की कवि )
अनुवाद - शेखर जोशी

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आज, आने वाले कल का बीता हुआ कल है। 

आज -
अतीत का भविष्य है।
आज -
भविष्य का अतीत भी है।

आज
बीता हुआ कल था
आने वाले कल का।

भविष्य का आज
अतीत का आने वाला कल होगा।

अतीत का अतीत क्या है ?
वर्तमान का वर्तमान क्या है ?
क्या है भविष्य का भविष्य ?

अतीत से बना है वर्तमान।
वर्तमान बना रहा है भविष्य।
इस क्षण का आज
आने वाले कल में गुज़रा हुआ कल होगा।

किन्तु अपरिचित है आने वाला कल।

अतीत की परछाईं वर्तमान है।
अतीत को वर्तमान की छाया छूती है।

किन्तु अपरिचित रहेगा आने वाला कल।

- रोंमेल मार्क डोमिनिगुएज मार्शन  .
अनुवाद - मीता पंत
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इस साल-
इस साल
अब
मैं कितना इंतज़ार कर रहा हूँ बसंत का
नहीं
हमेशा की तरह नहीं
मैं ठण्ड से थक गया हूँ और सूरज की कामना करता हूँ
इस साल
यह अलग है
मैं बदलाव की चरम ताकत की लालसा कर रहा हूँ
मैं गवाह बनना चाहता हूँ
पृथ्वी के फटने का
लाखों तरीकों से धरती के हिलने का
मैं चाहता हूँ पुराना सब मर जाये
क्रांतियां परिणत कर दें
कविताओं को फूलों में रक्त सिक्त धूल से
इस साल
अब
मैं चाहता हूँ शांति का ही हिंसक जन्म हो
आंसुओं को गिरने दो
मृत्यु के मनमानी कर लेने के बाद
बसंत को दहाड़ने दो गरजती हुई नदी की तरह।

- लहब आसिफ अल जुंडी
( सीरियाई कवि )
अनुवाद - किरण अग्रवाल  . 

( आधारशिला विश्व कविता अंक से साभार )

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सरगम-
सरगम में आज प्रस्तुत है किशोर कुमार जी की आवाज़ में गुलज़ार साहब का लिखा ज़िन्दगी का ये खूबसूरत फलसफा, फ़िल्म है गोलमाल, और संगीत आर. डी बर्मन साहब का है।  



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आने वाला पल जाने वाला है ...

सरगम में आज प्रस्तुत है किशोर कुमार जी की आवाज़ में गुलज़ार साहब का लिखा ज़िन्दगी का ये खूबसूरत फलसफा, फ़िल्म है गोलमाल, और संगीत आर. डी बर्मन साहब का है।

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