सोमवार, 26 दिसंबर 2011

उन्मुक्त हवा - As free as wind .





उन्मुक्त हवा ... ये शब्द पढ़ते ही मन में अनेकों बिम्ब उभरने लगते हैं ....सावन में भीगी भीगी प्रेम में पगी हुई बयार , जो मगन है झूला झूलती किशोरियों के बालों से खेलने में .... एक कागज़ का टुकड़ा जिसे गलियों में बेतरतीब उडाती हवा ....( जाने क्या लिखा हो उस कागज़ पर , ये अलग विचार-श्रंखला का विषय हो सकता है ) या फिर मई जून में गात तपाती लू के थपेड़े ... झील की सतह पर लहरों से ठिठोली करती हवा ... या रेगिस्तान में धूल के कपडे पहने आँखों को ढक जाते अंधड़ .... बरसात की एक शाम को खिड़की पर भीगी दस्तक देती हवा ....और नीरज के शब्दों में कहें तो कारवां गुज़र जाने के बाद बाकी रह गए गुबार की शक्ल में घूमती हवा ...ये हवा जो हमारे भीतर , बाहर , चारों ओर फैली है ... एक अल्हड षोडसी सी नए नए रूप धर आती है सामने .... कुछ उसी तरह अलग अलग अंदाज़ में ख्यालों के झोंकों पर तैरती कुछ कवितायेँ इस बार आ पहुंची हैं चिरंतन में ...


                            - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .


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                           उड़ान .

एक बार
बस एक बार
कल्पनाओं के पंखो पर सवार हो
उन्मुक्त उड़ना चाहती हूँ ...
मै रोज सूरज के पीछे भागती हूँ
एक दिन उससे आगे दौड़ना चाहती हूँ .


उस हसियें से चाँद पर झूला डालना चाहती हूँ .
पहाड़ों के शीर्ष पर बैठ कर
ऊपर पहुचने वालों के
जीत से उल्लासित चेहरे देखना चाहती हूँ .


कभी नदी के साथ कलकल बहना ,
कभी बादलों में बैठ कर
घाटियों में उतरना चाहती हूँ .
जब स्थितिया हाथ से फिसलने लगे...
तब छुप जाना चाहती हूँ .


'वर्षा वनों ' में जाकर
ना मेरी बोली कोई समझे
ना मै किसी की बात
बस एक बार उड़ना चाहती हूँ .


उन्मुक्त उड़ान ऐसी हो
कि फिर वापस ना आना हो
बस गुम हो जाऊं बादलों के लिबास में
मैं सबको देख सकूँ
मुझे कोई ना देख सके .


राहतें नेमते बरसाऊँ 
मानव होने का अर्थ समझाऊँ .
क्यूँ चाहती हूँ पता नहीं !
उड़ान का कोई तर्क नहीं
ना ही अनुभव का वृतांत ...
ये अदम्य इच्छा है बरसों की
उड़ना चाहती हूँ
बस एक बार ...
उन्मुक्त .....


      - रश्मि प्रिया .


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                  उन्मुक्त हवाओं के झोंकों .





मन की कोमल घाटी में तुम शूलों से चुभ जाते हो,
उन्मुक्त हवाओं के झोंकों क्यों तन सुलगाने आते हो।


मेरे उजड़े उपवन की भी कली कली मुसकाई थी।
बीत गये वो दिन मेरे अधरों पर आशा आई थी,
पत्र टूटता शाखों से मैं चाहूँ धरती में मिलना,
किंतु वायुरथ से तुम मेरे जीवाश्म उड़ाते हो।


उन्मुक्त हवाओं के झोंकों क्यों तन सुलगाने आते हो।


तन मन आशा यहाँ तलक मेरा हर रोम जला डाला,
एक अगन ने मेरा जीवन काली राख बना डाला,
पीड़ा का अम्बार लगाकर दिवा रात्रि बीत गये,
ढेर तो यूँ ही रहने दो क्यों यत्र तत्र बिखराते हो।


उन्मुक्त हवाओं के झोंकों क्यों तन सुलगाने आते हो।


                     - इमरान .


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            उन्मुक्त हवा सा बहने दो .

मानव था
मैं जन्मा 
बिन गूढ़ कोई, बिन ज्ञान .
सच उन वर्षों में था 
जीवन कितना आसान !
ना सोच थी कोई ,
ना कोई समझ थी ,
ना कोई पहचान .
प्यार से जो भी मिलता 
लगता एक सामान .

देकर मुझको तुमने नाम 
कैसा आंखिर किया ये काम ...
कि मानव को मुझ से काट दिया ,
हिन्दू - मुस्लिम में बाँट दिया ,
मंदिर - गिरजों में छाँट दिया .

फैंके रीत -रिवाज के जाल ,
चली जात - पात की चाल ,
अपने रंग में रंगने को 
उढाई धर्म की खाल .
जीवन से प्रेम सिखलाया ...
मृत्यु का भय दिखलाया .
नियति को कारक मान  
सोच - तर्क को पिघलाया .
भूत गढ़े, भगवान् गढ़े 
कर्म- कांड के पाठ पढ़े .
पाप- पुण्य का स्वांग रचा ...
किया वही जो तुम्हें जंचा .

जीवन के रंग दिखाये 
जीने के ढंग सिखाये 
पर तुम न समझ ये पाए 
कि साँसों पर पहरे बिठाये 
कोई जान कहाँ से लाये ?

नहीं चाहिए नाम तुम्हारा 
पहचान ये अपनी रहने दो ...
बस बन कर के इंसान मुझे 
उन्मुक्त हवा सा बहने दो .


                                         - स्कन्द .

( Pic : Painting by Mrs Raina Swaroop
www.reinart.co.in )

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आज फिर से

जाल किस तरह मैं तोडूं !
जीवन किस डगर पर मोडूं !
हर मोड़ पर वह है खड़ा 
नज़रें भला किस और मोडूं ?

भेद जाता है अन्दर तक 
एक नज़र भी जब वो देखे 
कैसे छुपाऊँ हाल अपना 
मुझको वो भीतर तक घेरे .

बंद कर लेता हूँ किवाड़ 
कि कहीं दिख न जाऊं उस को ,
झिर्री भी कहीं मिल जाये तो 
उन्मुक्त हवा सा आ घेरता है मुझ को 

रौंद जाता है , छील देता है 
कहता है अब तो बाहर निकल .
झोंका हवा का हूँ मैं देख 
अब तो बह , मेरे साथ चल .

कब तक खुद से लडेगा तू !
सच से कब तक बचेगा तू !
काली रातें अब तो छोड़ दे 
रौशनी से अब तो रिश्ता जोड़ ले .

देख पवन भी गीत है गाती ,
सन्देश कानों में है छोड़ जाती .
अंधेरों में सफ़र नहीं होता .
धोखा कोई ज़हर नहीं होता .

अंधेरों के बाद उजाला है आता 
बाँहों को फैला उस ओर .
जाल है ये इसको तोड़ ...
गुज़रे कल को पीछे छोड़ .

मुहब्बत के समंदर में चल 
खुद को इस में बहने दे .
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी में 
आज फिर से मिलने दे .  

                      - विनय मेहता .   

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                                                    LIBERATION  .



Tied with prayer beads
That wished for a boy
She emerged into a world
Knotted by the cord
Of bondage to honour
Hissing customs
Whispering rituals
Murmuring reminders
Of secure existence
In silent acquiescence
To incestuous touches
And family yokes
Presented like trophies
Pure marble white
No spark of life
Speech tethered to the cog
Where free will resides
Mind strung to spokes
Of the wheel of destiny

YET----

No more will she be
A bonded apparition
A festering obligation
For the gift of education
Has shone in her vision
Her sense of worth
Emerges from hibernation
Her mind is free
To live its decision
A life of her own
Is no more an illusion
As free as the wind
With dignity her direction  


_ Sadhana  .


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वाघा पर .

वाघा पर
जो हिन्दुस्तान और पकिस्तान की सरहद पर
एक बाड़ लगी है
वो कच्ची है...

गर्म हवा के पागल झोंके
कई बार यह ज़मीनी सरहद टाप कर
इस पार चले आते हैं
इन्फिल्त्रैटर यह भी तो कहलाते हैं...

ये बाड़ें कहाँ रोक पाती हैं
लाहौर में बैठी बूढी अम्मी की पुचकारों को
मौसी की तरह यह सबा 
सहला जाती है बालों को
ईदों पर सरहद के इस पार भी दिखता है
और उधर की छत्त पर भी टंगता है चाँद

पंछी कितने आकर
सिंध की रोटियां गिरा जाते हैं इस तरफ
तोते उड़ कर रोज़ शाम को
पाकिस्तान की सरहद छू आते हैं
हिंदुस्तान के मंदिर से उड़ कर
उस पार के मस्जिद की आज़ानो को दोहराते हैं

वाघा पर
जो हिन्दुस्तान और पकिस्तान की सरहद पर
एक बाड़ लगी है
वो कच्ची है...

सुबह सुबह सेवईं की खुशबू
कहाँ रुकी हैं तारों से
ज़मी बटी है
आसमान तो बचा हुआ है बट्वारों से

सरहद पर जो घास उगी वो किसकी है ...
रावी दोनों पार बहे वो किसकी है...
आसमान के तारों पर कब्ज़ा किसका है...
इस मिटटी पर उगा हुआ सब्ज़ा किसका है ?

वाघा की सरहद पर आज़ाद हवाएं चलती हैं
एक ही माँ के दो टुकड़ों की सांसें साझा चलती हैं

आज़ाद हवाएं कहाँ बटी हैं
सरहद की दीवारों से

वाघा पर
जो हिन्दुस्तान और पकिस्तान की सरहद पर
एक बाड़ लगी है
वो कच्ची है...


                                - देव .


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उन्मुक्त हवा का झोंका हूँ, 
                 बाँधो न मुझे तुम बंधन में ...




उन्मुक्त हवा का झोंका हूँ, बाँधो न मुझे तुम बंधन में .

जब लगे ह्रदय हो शुष्क चला, उर में मरुथल सी अनल जले                 
जब लगे प्रेम का भाव ढला, अंतस में दुखिया पीर पले
जब मीत पुराना ठुकराए, मन एकाकी हो घबराए
जब आशाओं के दीप बुझें, चहुँ और अँधेरा छा जाये ...

उस घड़ी अचानक आऊंगा, मैं तेरा साथ निभाऊंगा 
कुछ देर तुम्हारे होंठों पे,  बन मृदुल-हँसी लहराऊंगा
दुःख के कंटक झर जाएंगें, सुख-सुमन खिलेगा मन-वन में 
तब मुझको उड़ जाना होगा, मैं कब ठहरा एक आँगन में 

उन्मुक्त हवा का झोंका हूँ,  बाँधो न मुझे तुम बंधन में .


                                 - पुष्पेन्द्र वीर साहिल .
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     और तुम
    उन्मुक्त  हवा की बात करते हो !!





लोग कहतें है ,
दुनिया बदल रही है 
धरती की सिरों पर जमीं बर्फ पिघल रही है ...
लोग कहतें हैं 
दुनिया बदल रही है .

सूरज की तपिश बढ़ी है 
बाँझ हुए हैं बादल 
सौतेले पानी को ढ़ोते
घुमड़ रहें हैं पागल ...

जाने किसको धोखा देने 
निकल पड़ें हैं घर से 
आँखे फाड़े सब देख रहें है 
अब बरसे , तब बरसे .

जब बरसे, ऐसे बरसे 
वो भटके बादल तूफानी !!
सब कुछ समेट कर ले गया 
धरती पर बहता पानी .

रोके कौन अब रूद्र इंद्र को 
धरा भी निर्वस्त्र खड़ी है 
उसका चीर हरने वालो को 
अब किसकी फ़िक्र पड़ी है ...

उनकी आँखों में सुरमा बनकर 
कालिक कहती है कहानी 
वो पोछ रहें हैं सबके आसूँ
जिनका सूख गया है आँख का पानी

स्वार्थ सर्वोपरी है 
और सब कुछ गिरवी है 
धरा , आकाश , पानी ....
आने वाली नस्लें हैं 
बीती हुए कहानी ..
    


और तुम
    उन्मुक्त हवा की बात करते हो !!      


                                           
                                       - स्कन्द .             


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                                चंचल हवा .



नदी का किनारा , तुम और मैं  ,       
आवारा बादल और रिमझिम समा
जाने कहाँ से ये चंचल हवा 
आती है 
छू कर 
बीच से हमारे गुज़र जाती है ...


लहरा जाती है आँचल मेरा ...
बिखरा देती है काजल मेरा 
मेरे गेसुओं को सहला कर 
गजरे के फूलों को बिखरा कर 
गुनगुनाती हुई 
जाती है गुज़र .


पानी में हलचल करके 
छोड़ जाती है अपनी खनक 
फैला कर फूलों कि खुशबू 
दे जाती है अपनी महक ...


आती कहाँ से है जाने ...
जाती है कहाँ को ?
छू जाती है सभी को .
और 
जाते जाते प्रेरित करती है हमें 
हमेशा चलते रहने को .


              -  शैल सुमन .


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     मन मेरे . 
                                 
 


मन मेरे 
तू सीख हवा से 
विस्तृत होना ...
बहते जाना .
पोंछ स्वेद कण ,
कड़ी धूप में 
बिना भेद 
हर राही का मस्तक सहलाना .


सुख की हरियाई कोंपल छूना ,
सरसाना .
दुःख के पीले पातों को 
कुछ दूर उड़ा कर ले जाना ,
पर 
बंधना नहीं वृक्ष से किंचित ...
बहते जाना .


मेरे मन 
पीड़ा है बंधन ,
रुक जाना मृतप्राय है बनना ;
मुक्ति मार्ग यदि है कोई ...
तो है बहना ,
है आगे बढ़ना .


तोड़ स्वयं निर्मित कारायें ,
बाहर आ .
मत रुक चाहे कैसी भी दीवार मिले ,
बस बहता जा .


नहीं सरल -
फिर भी कोशिश कर ...
बन जा तू उन्मुक्त हवा .


                          -  मीता .    


_______________________________________________

15 टिप्‍पणियां:

Na ने कहा…

Love to read the amazing outpourings of my sensitive friends. Where do you get such fluidity of ideas from?Loved reading each one of you . A very warm welcome to Shail Ji and Vinay Ji.
Will read it again and again.Blessed are we to be a part of Meeta's perseverance in bringing up this bloggy baby ..Thank you all

पुष्पेन्द्र वीर साहिल ने कहा…

Rashmi ji... aapki poem mein "Nirala" jaisa niralapan hai.... selfless... Imran, adbhut likha... Jeevashm jaise sahabd ko romani kavita mein pirona... kya bat hai... Skand, kavita kahlaatee jaroor sarvbhaumik hai.. par har kisi ke bas ki bat nahin aisi kavita likhanaa.. many salutes!... Vin ki kavita mein bebasi aur ashaa ka sangam hai... achchha lagaa...Sadhanaa ji... apne jo likha.. very close to my heart... ek satat peeda ka varnan hai.. thanks !! Devesh has come out with a soft but hard hitting poem.... liked it immensely... Shail ji kavita bahut sundar hai... aur Meeta... shashwat aahvaan hai is kavita mein... tod swayam nirmit karayen... !

Leena Alag ने कहा…

woooowwww!...readin today's gigantic effort n its output...the fiery passion in the compositions the perfect diction,i seriously feel dwarfed in even tryin to comment!...u guys together r a gossamer...i mean tackling the same topic n what a variety of colours each of u reflects bak is so astuonding...u guys use every idea lyk plasticine n thn u twist n turn it to give it the most unimaginable form!...pushpendra ji,itna khoobsurat intro hai aapka...hawaa ke itnay roop par kabhi gaur hi nahin kiya...rashmi ji ur flight is infectiously fantastical...imran ji's poetry speaks of the frustration of most of us who feel tied down...but then God created nature in His lykness...free n chaste..it is we who boggle ourselves to society,age,boundaries...when GOD made us HE made sure tht evn tht last tethering,the umbilical chord is severed...only when completely unbound can we enter this earth...but thn y do v blame things around us?...Skand ji "unmukt hawaa sa behnay do" is par excellence...thr r no words to describe how beautiful it is...Vinay ji,a hearty welcome to the family...:)...wonderfully put...just what i finished saying tht thr is always ths sense of freedom tht is dyin to spread its wings but v out of r own naivity kip clippin its wings!...sadhana ji,aap yahaan tak soch bhi kaisay layti hain?...hawaa ki fitrat se ek girl child ki liberation tak its so deep...devesh ji,u are ouuuutstandin...agar koi ek uniform anthem ho to woh most definitely,"Wagha par" jaisa hi kuch hoga...kyunki na sirf Pak-Ind balki har sarhad ki baad "kachchi hai"...pushpendra ji after devesh ji n skand ji's volatile poetry urs comes as beautiful soothin fresh air... embalming n soft...:)....skand ji it seems has taken it upon himself to shake everyone out of their slumber..."aur tum unmukt hawaa ki baat kartay ho" is again so powerpacked!...ah! finally the much needed romantic break...thank u shail ji u hav almost completed the variety of flavours!...:)...meeta,"mann mere" is just a true reflection of u....just the way u are...forever encouragin n urself persevering to move higher up!...:)

i'll just finish wid two lines from a poem by Shivmangal Singh Suman:

"hum panchchi unmukt gagan ke,pinjarbadh na gaa paayeingay

kanak teeliyon se takraakar,pulkit pankh toot jayeeingay"

May the the flow of thoughts in "CHIRANTAN" always be as free flowing as the wind!!!....:)

Na ने कहा…

@Leena.. I had been really waiting for your comment , as always..Thank you for the in depth way in which you read and appreciate us.However many times we say it, the feelings won't lessen-that you are a true reader, and even your comment is poetry in itself.Thank you, Leena

Reena Pant ने कहा…

चिरंतन का इंतज़ार रहता है,बड़ी मुश्किल से सोमवार गुजरता है,और आंखे टकटकी बांधे फेस बुक के पर्दे पर, मंगलवार की सुबह गुजारती है और हर बार की तरह चिरंतन का
नया अंक ताजगी दे जाता है. नव वर्ष आप सभी को शुभ हो ....
"वो पाहुने सा
उमंग से पंख फैलाये
नवीनता की अनुभूति लिए
भूत को हथेली में दबाये
सप्तरंगी किरणों में सवार
उन्मुक्त आकाश से आ रहा है
मेरे द्वार
और मैं द्वार खोले
बांह फैलाये अभिनन्दन रत हूँ
आस में
विश्वास से जाग्रत है मेरी आत्मा
कि नव वर्ष लेकर आयेगा
नव प्रभात .........
वो पहुना बन जायेगा
मेरा मीत
और में उसके साथ सवारुंगी जीवन
उन्मुक्त आकाश में पसारुंगी पंख
गाऊंगी
नव जीवन के नव गीत "

meeta ने कहा…

This is wonderful !! I feel we love to write so much cos we know we have such amazing readers like you . Thanks @Leena , thanks @Reena di . And...actually your comments add to the beauty of our topic manifold !! This is, I believe the best issue so far... which we have been able to create with your beautiful encouragement. Need you always friends . Thank you :)

it's me ने कहा…

वाह!! आज पहली बार चिरंतन का पृष्ठ देखा ..सभी रचनाएँ बहुत सुंदर हैं... सभी को धन्वाद ..इसी तरह लिखते रहिये...

Nandita Pandey ने कहा…

keep writing...keep rocking...loved every bit of it... absolutely refreshing... !!!...

do lemme know the topics that you plan to publish next..would like to be part of your fluid compositions..

May your creative juices flow eternally and keep enlightening us...

Love and Light!

Vinay Mehta ने कहा…

कैसे शुरू करू कैसे हाले दिल बयां करू
कहने को बहुत कुछ है पर शब्द नहीं
सपना सा लगता है
जब से चिरंतन को जाना पड़ा बस कितने गोते लगाये नहीं जानता...
सोचता था एक टुकड़ा जमीन का में भी पा लू कुछ कह लू और जैसे मन मांगी मुराद पूरी हो गुई ...
मीता जी वोह एक टुकड़ा जमीन का देने के लिए शुक्रिया ....................

अपने को सब के सामने बहुत छोटा पता हु जब भी सब की रचनाये पड़ता हु ...
बात अगर शुरु करू "उन्मुक्त हवा" से .
तो पुष्पेन्द्र वीर साहिल जी ..
ख्यालों के झोंकों पर तैरती यह जो तस्वीरे उभरी है और
और उसमे जिस प्रकार से बन्धनों से मुक्त गगन में विचरण करती आप की पंक्तिया मन को छु रही है

रश्मी प्रिया जी की तो बात ही निराली है
रोज सूरज के पीछे भागती हूँ
एक दिन उससे आगे दौड़ना चाहती हूँ
में तो रोज़ ही सुबह आप के शब्दों के पंख में बैठ स्नेह के वर्षा वनों में विचरण करता हु
और कुछ कहना अतिश्योक्ति होगी
"हवाओं चलो ले चलो उस डगर
जहाँ सूरज और धरा का है घर
सकूं और प्यार की छाया है
सुबह से साँझ तक खुदा का साया है !! "

इमरान भाई का शूल ऐसा चुभा की क्या कहू
सरलता से कटाक्ष कहने की अद्भुत कला है भाई .

स्कन्द भाई आप के लिए तो शब्द मिलते ही नहीं
डर लगता है की कही गुस्ताखी न हो जाये इतना सुलझे सुंदर सरल ढंग से आप इतने घम्भीर विषय को कहते है वोह लाजवाब है ..
लेकिन में हमेशा आप के शब्द याद रखता हु जो आप हमेशा मुझसे कहते है

ना डर की कुछ कहने से
कागज़ को ना देख
रंग भर जायेंगे खुद ही
जिस पल बयां दिल होगा ..............

साधना जी .. इतनी गहन सोच इतना गुड़ अर्थ
यथार्थ की बात करे तो गर्ल चाइल्ड और उससे जुड़े सवालों को इतनी गहेनता से सोचन बहुत ही गहराई की बात है ....
बहुत खूब ... खुप छान ...

देव भाई सही कहा आप ने

सरहदों के उस पार भी वही हवाएं है जो इस पार बहती है
बस जरा सी मुहब्तों की बरिशे चाहिए.. बह जाएगी बाड़ बहुत कच्ची है

शैल सुमन जैसा आप का नाम वैसा ही खुशनुमा पैगाम
राहे कैसी भी हो कही भी कैसे भी मुडती जाती है
उन्मुक्त हवाएं ही "सुमन" सी मंजिले दिखलाती है

मीता जी सोभाग्य है की यह उन्मुक्त हवाएं जो आप ने दिखलाई है
यह कभी ना रुकेंगी ना थमेंगी
ऐसे ही हम सब के जीवन में बहेंगी

स्नेह एवं प्रेम सहित अभिनन्दन आप सभी का .........

............विनय .........

Vinay Mehta ने कहा…

कैसे शुरू करू कैसे हाले दिल बयां करू
कहने को बहुत कुछ है पर शब्द नहीं
सपना सा लगता है
जब से चिरंतन को जाना पड़ा बस कितने गोते लगाये नहीं जानता...
सोचता था एक टुकड़ा जमीन का में भी पा लू कुछ कह लू और जैसे मन मांगी मुराद पूरी हो गुई ...
मीता जी वोह एक टुकड़ा जमीन का देने के लिए शुक्रिया ....................

अपने को सब के सामने बहुत छोटा पता हु जब भी सब की रचनाये पड़ता हु ...
बात अगर शुरु करू "उन्मुक्त हवा" से .
तो पुष्पेन्द्र वीर साहिल जी ..
ख्यालों के झोंकों पर तैरती यह जो तस्वीरे उभरी है और
और उसमे जिस प्रकार से बन्धनों से मुक्त गगन में विचरण करती आप की पंक्तिया मन को छु रही है

रश्मी प्रिया जी की तो बात ही निराली है
रोज सूरज के पीछे भागती हूँ
एक दिन उससे आगे दौड़ना चाहती हूँ
में तो रोज़ ही सुबह आप के शब्दों के पंख में बैठ स्नेह के वर्षा वनों में विचरण करता हु
और कुछ कहना अतिश्योक्ति होगी
"हवाओं चलो ले चलो उस डगर
जहाँ सूरज और धरा का है घर
सकूं और प्यार की छाया है
सुबह से साँझ तक खुदा का साया है !! "

इमरान भाई का शूल ऐसा चुभा की क्या कहू
सरलता से कटाक्ष कहने की अद्भुत कला है भाई .

स्कन्द भाई आप के लिए तो शब्द मिलते ही नहीं
डर लगता है की कही गुस्ताखी न हो जाये इतना सुलझे सुंदर सरल ढंग से आप इतने घम्भीर विषय को कहते है वोह लाजवाब है ..
लेकिन में हमेशा आप के शब्द याद रखता हु जो आप हमेशा मुझसे कहते है

ना डर की कुछ कहने से
कागज़ को ना देख
रंग भर जायेंगे खुद ही
जिस पल बयां दिल होगा ..............

साधना जी .. इतनी गहन सोच इतना गुड़ अर्थ
यथार्थ की बात करे तो गर्ल चाइल्ड और उससे जुड़े सवालों को इतनी गहेनता से सोचन बहुत ही गहराई की बात है ....
बहुत खूब ... खुप छान ...

देव भाई सही कहा आप ने

सरहदों के उस पार भी वही हवाएं है जो इस पार बहती है
बस जरा सी मुहब्तों की बरिशे चाहिए.. बह जाएगी बाड़ बहुत कच्ची है

शैल सुमन जैसा आप का नाम वैसा ही खुशनुमा पैगाम
राहे कैसी भी हो कही भी कैसे भी मुडती जाती है
उन्मुक्त हवाएं ही "सुमन" सी मंजिले दिखलाती है

मीता जी सोभाग्य है की यह उन्मुक्त हवाएं जो आप ने दिखलाई है
यह कभी ना रुकेंगी ना थमेंगी
ऐसे ही हम सब के जीवन में बहेंगी

स्नेह एवं प्रेम सहित अभिनन्दन आप सभी का .........

............विनय .........

meeta ने कहा…

@It's me - Thank you. We are very glad that you liked our effort.

@Nandita pandey - di we'd love to have your poem in Chirantan . You are most welcome .

@Vinay mehta - Vinay ji this is such a beautiful comment from you . Your comments are so poetic ... they are no less than your poems. Thanks a lot .

rashmipriya ने कहा…

Vinay you always encourage me...thanx...nice to read all comments.

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" ने कहा…

मेरे मन
पीड़ा है बंधन ,
रुक जाना मृतप्राय है बनना ;
मुक्ति मार्ग यदि है कोई ...
तो है बहना ,
है आगे बढ़ना .

बहते पानी सा बहते रहो
कुछ ना कुछ करते रहो
निरंतर हँसते रहो
जीवन जैसे आये ,जीते रहो
सुन्दर सार्थक सोच

Vinay Mehta ने कहा…

@its me (Mamta) shukriya sarahne ke liye keeps on reading us and gives ur valued remarks ....
@ Leena Alag ji thanks so much for going so in-depth and analyzing every one of us so beautifully .... thanks again ....
@ Reena Pant Ji kya baat hai aap ne to charchand laga diye .. Sadhana ji sahi kehti hai aap ke bare me ki unko aap ka intezar rehta hai .. infect everyone is waiting for such a sweet n encouraging comments like u did ...
@ Nandita ji tusi waise hi great ho ... thanks for ur blessing
@ Dr. Rajindra ji Abhaar aap ka ..
@ Rashmi ji Meeta Ji Pushpendra Bhai, Sadhana Ji aap sab ke samne bahut chota hu aap ka bahut bahut shukriya ....... heemat badhane ke liye ...

meeta ने कहा…

@राजेंद्र तेला जी आप का बहुत धन्यवाद...पढने और सराहने के लिए .

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