मंगलवार, 1 मई 2012

सृजन / Creation .


कभी कभी आपको भी ऐसा लगता है क्या, कि हठ की पराकाष्ठा है नश्वर जीवन और भंगुर जगत के सत्य को जानते हुए भी सृजन की बात करना? या बनने-बिगड़ने के इस दस्तूर में समय ही कहाँ मिलता है ये सोचने का  कि हमने बनाया या मिटाया. मानो सागर किनारे रेत पे लकीरें खींचता बालक हो, कि जितना वो लकीर बना के मुस्कुराए, उससे दुगने जोर से किलके, जब पानी  उस लकीर को बहा ले जाये. जी हाँ, कभी गौर से देखिएगा, पानी लकीर को मिटाता नहीं, वरन उस सारी रेत को ही बहा ले जाता है. जैसे हर बार उस बच्चे के सामने रख देता हो एक नयी स्लेट! लो फिर बनाओ, क्या बनाते हो!
                   तो फिर क्या ज्यादा महत्वपूर्ण हुआ, रेत या उस पे लिखी लिखावट? या फिर बार बार उस रेत पे लिखने का वह कौतुक जो बालक का मन लगाए हुए है? कहीं वही तो सृजन नहीं अपने मौलिक रूप में, जहां कोई और आकांक्षा नहीं सिवाय उस आनंद के, जो  बनाने और मिटने के उन पलों तक ही सीमित   है  ...
                     - पुष्पेन्द्र वीर साहिल.
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 सर्जना के क्षण . 


एक क्षण भर और 
रहने दो मुझे अभिभूत,
फिर 
जहाँ मैने संजो कर और भी सब रखी हैं 
ज्योति शिखायें 
वहीं तुम भी चली जाना 
शांत तेजोरूप! 

एक क्षण भर और, 
लम्बे सर्जना के क्षण कभी भी हो नहीं सकते! 
बूँद स्वाति की भले हो 
बेधती है मर्म सीपी का उसी निर्मम त्वरा से 
वज्र जिससे फोड़ता चट्टान को, 
भले ही फिर व्यथा के तम में 
बरस पर बरस बीतें 
एक मुक्तारूप को पकते!


          - अज्ञेय .
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      सृजन 

              १ 

वेद व्यास की तरह 
यदि मैं भी मांगूं -
कागज़ के रूप में धरती 
कलम के रूप में शेषनाग 
तो वह अधूरा ख़त पूरा करूं
जिसके अक्षर-अक्षर अर्थ-
को तुम, जानते तो हो-      
पर बाँचते नहीं...!                                                    

             २ 

मेरी आस्था में उद्वेग 
तुम्हारी आस्था प्रशांत 
तुम्हारी धरती सी खामोश 
मेरी में मुखर-मौन 
तुम दोगे मुझे एक 
दिव्यतम कल्पना 
जो ले जाएगी मुझे 
अनन्यतम भावलोक तक .

             - दिनेश द्विवेदी .
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कविता हूँ...
यूँ ही कलम की नोक पर नहीं आती!


मन की गांठे खोल कर
थोड़ा सा झुकना होगा,
अक्षरों को सहेज कर
उठाने के लिए...


समय की आंच में
थोड़ा सा पकना होगा,
बहना होगा निर्विकार
नदिया कहलाने के लिए...


फिर मिलूंगी मैं तुम्हें
अक्षर अक्षर में मुस्काती,
कविता हूँ...
यूँ ही कलम की नोक पर नहीं आती!


उबड़-खाबड़ अनजान
रास्तों पर चलना होगा,
उठाने होंगे ठोस कदम
आगे राह बनाने के लिए...


अमिट अनाम सा दर्द
सहजता से सहना होगा,
उठाने होंगे गम सभी
खुशियों का गाँव बसाने के लिए...


फिर मिलूंगी मैं तुम्हें
अक्षर अक्षर में मुस्काती,
कविता हूँ...
यूँ ही कलम की नोक पर नहीं आती!


भूली बिसरी यादों की गलियों को
छू कर गुजरना होगा,
मृत्युतुल्य कष्ट उठाने होंगे
साथ जीवन का पाने के लिए...


कोटि-कोटि नयनों के आंसू चुनते
कभी नहीं थकना होगा,
कुछ सच्चे सुन्दर ख़्वाब सजाने होंगे
और जुट जाना होगा उन्हें बचाने के लिए...


फिर मिलूंगी मैं तुम्हें
अक्षर अक्षर में मुस्काती,
कविता हूँ...
यूँ ही कलम की नोक पर नहीं आती!

     - अनुपमा  पाठक 
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मेरे गुनाह मुझे आदमी बनाते हैं .



खुदा मुआफ करे ज़िन्दगी बनाते हैं
मेरे गुनाह मुझे आदमी बनाते हैं .                    

हवस है सारे जहानों पे हुक्मरानी की
वो सिर्फ चाँद नहीं, रात भी बनाते हैं .


तबाह कर तो दूं ज़ाहिरपरस्त दुनिया को
ये आइने भी मेरे लोग ही बनाते हैं .


मैं शुक्रिया अदा करता हूँ सब रकीबों का 
यही अँधेरे मुझे रौशनी बनाते हैं .


मैं आसमान बनाता हूँ मेरी बात करो 
यहाँ तो चाँद सितारे सभी बनाते हैं .

                - नोमान शौक . 
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प्रतिबिम्ब.



तुम जानते हो न  
वो कुछ है तुम में ,
तुम्हारे ख़याल की खुशबू ने
याद दिलाया मुझे
कि कहीं एक छोटी सी आशा
मुझमें बैठी है
इस इंतज़ार के साथ
कि तुम्हारे बस एक स्पर्श से
संवरे तन मन
और सृजन हो मेरा .

                                                             
ढल जाऊं मैं 
तुम्हारे ऐसे प्रतिबिम्ब में ...
तुम भी न पहचान सको 
कि कौन हो तुम और कौन मैं !!
फिर क्या तुम मेरे सृजन हो 
या तुम्हारा सृजन हूँ मैं .


        - साधना .
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वही तो सृजनकार है .

                                                            


जिसका अंक है कोई, ना ही आकार है,          
जो प्रकाश पुंज है, जो निर्विकार है,
कणों कणों से एक सुर में यही पुकार है,
वही तो सृजनकार है, वही तो सृजनकार है।

ये नगर ये गाम गाम, वन सघन ये धाम धाम,
भोर ये खिली खिली, लालिमा लिए ये शाम।
ये सूर्य चंद्र ये धरा, समुद्र मोतियों भरा।
ये पंछी पंख खोल के, वृक्ष वृक्ष डोलते।

धरती से व्योम तक, जंगल और पुष्प से,
दूर दृष्टि छोर तक, दृष्टि अति अल्प से
जब एक एक सृजन से वो खुद ही साकार है
फिरे तू क्यों ये पूछता, ये किसका कार है!

कणों कणों से एक सुर में यही पुकार है,
वही तो सृजनकार है, वही तो सृजनकार है।



                 - इमरान .

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सृजन की पीड़ा 

अजब सी छटपटाहट                                 
घुटन, कसकन 
है असह्य पीड़ा,
समझ लो साधना की 
अवधि पूरी है.

अरे घबरा न मन 
चुपचाप सहता जा 
सृजन में दर्द का होना जरूरी है.

        - कन्हैयालाल नंदन . 
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    सृजन कभी नहीं थमता .




                                                                                                                 
    तलाशता खुद को                                 
    मैं आज निकला ...
    दूर तक उफनते 
    अँधेरे के समंदर में .                                   

    देखा 
    एक पिंजर ढो रहा था 
    ज़िन्दगी की भारी गठरी
    लड़खड़ाते क़दमों से ...

    देखीं 
    भूख से बेहाल आंखें  
    और एक रोटी के टुकड़े के लिए 
    खून बहता ... 

    और कुछ आगे बढ़ा तो 
    अस्मत कहीं नीलाम होती देखता हूँ  ,
    कहीं पर इंसानियत की 
    लग रही हैं बोलियाँ ,
    और कहीं हंसी ठहाकों में 
    बचपन वीरान देखा ...

    दर्द का एक घूँट कड़वा 
    गले में अटका ही था 
    कि देखता हूँ 
    एक कोने में खड़ी , 
    लाचार सी, बूढी सी वो 
    अपने मैले, फटे आँचल में समेटे 
    जैसे कोई चाँद हो ....

    एक नन्ही जान ही तो थी ,
    पीठ पर बस्ता लगाये 
    जैसे उस की आन ही तो थी ,
    खिलती हुई मीठी मुस्कान ही तो थी .

    तब जा कर मैं ये समझा 
    हौसले कभी डूबते नहीं हैं 
    मुश्किलों के आगे झुकते नहीं हैं ...
    अँधेरा लाख उफान मारे 
    सितारे टिमटिमाने से रुकते नहीं हैं ,

    निराशा के बाद फिर 
    सृजन होता है आशा का ....
    सृजन कभी नहीं थमता .

              - विनय मेहता .
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                                                               Letter to a child.




    This pang of birth,
    The memory of life
    As it suffused in you
    A breath that came
    An aura that flowed
    The impressionable child,
    Opened eyes into this world
    A repository of others desires,
    A vision of its creator
    Did he have a choice?
    Can it follow its heart?
    What’s a creation of mine?
    If I can’t carve and chisel
    Its thoughts and its mind
    Into the form I want
    And I a sculptor
    A baby my wet mud
    From the formless I create
    And then look back.
    Is that a reflection of me?
    So elated to see
    He looks and behaves
    A mirror image
    A clone of my desires
    A wealth of my needs
    Trapped in a prison
    Of my creation


    The power of creation
    Should give him wings
    You are my creation
    Why am I scared?
    Come, Soar high
    The world as your stage
    And power in your hands
    Don’t be a reflected figment
    Of my jaded imagination
    Go, sculpt a new yourself
    Be your own creation 

    - Sadhana .


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                        भ्रम भंग 

    वेदना सहेजते रहे                        
    इसी आस में हम 
    कि एक दिन वह 
    हिमालय सी खड़ी हो जाएगी 
    और उस की कोख जन्म देगी 
    मुक्तिदायिनी गंगा को.                                             

    वेदना हमारी किन्तु 
    मरुस्थल सी फैल गयी 
    निगल गयी निर्मम वह 
    निरीह सरस्वती को...
    चेतना तक न बची. 

    सृजन भला कैसे हो 
    कौन भला गीत गाये.

            - दिनेश श्रीवास्तव .
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    नज़्म की तामीर .

    तुमने देखा है कभी
    एक शायर
    जब नज़्म को जन्म देता है...

    आवाज़ गले में जम जाती है
    ज़हन में उबलती हैं सैकड़ों ही दूसरी आवाज़ें
    हाथो की नमी बह कर
    काग़ज़ तक आ जाती है
    आँखों में दर्द सिसकता है
    और होठों के साहिलों पर
    एक लफ़्ज़ों का सुनामी बस एहसास निगलने को बेताब

    सर आता है पहले बाहर
    या फिर पांव कभी... 
    जब नज़्में उलटी पड़ जाती हैं
    अशार घुटनों के बल सरकते हैं...
    मतला आँखें मीचे शायर की गोदी में दिखता है


    और सुलगती है यादों की चिल्लम ज़रा
    धीरे-धीरे फिर धड़ दिखता है
    नज़्म की सांसें सुनाई पड़ती हैं
    बंद मुट्ठी से लफ्ज़ गिरने लगते हैं


    और फिर पांव उतरते हैं काग़ज़ पर
    खून में सने हाथों से
    शायर एक नज़्म का टुकड़ा जुदा करता है ज़हन से
    उसे अपना नाम देता है
    हाथ फिराता है ज़रा सर पे 
    अपने तखल्लुस का एक टीका लगाता है...

    तुमने देखा है कभी
    एक शायर
    जब नज़्म को जन्म देता है
    एक ज़िन्दगी तामीर होती है...

                     - देव .
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    शब्द और सत्य. 

    यह नहीं कि मैं ने सत्य नहीं पाया था 
    यह नहीं कि मुझ को शब्द अचानक कभी-कभी मिलता है : 
    दोनों जब-तब सम्मुख आते ही रहते हैं। 
    प्रश्न यही रहता है : 
    दोनों जो अपने बीच एक दीवार बनाये रहते हैं 
    मैं कब, कैसे, उन के अनदेखे 
    उस में सेंध लगा दूँ 
    या भर कर विस्फोटक 
    उसे उड़ा दूँ। 

    कवि जो होंगे हों, जो कुछ करते हैं, करें, 
    प्रयोजन मेरा बस इतना है : 
    ये दोनों जो 
    सदा एक-दूसरे से तन कर रहते हैं, 
    कब, कैसे, किस आलोक-स्फुरण में 
    इन्हें मिला दूँ— 
    दोनों जो हैं बन्धु, सखा, चिर सहचर मेरे।

                         -  अज्ञेय .
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    निजत्व से विश्वत्व की ओर ...

    मानव 
    मन के उच्छ्वास को
    शब्दों में पिरो 
    विचारों को साध कर 
    अनुभव के हलाहल को पी 
    अश्रु की स्याही से 
    उकेर देता है 
    अपनी भावनाओं को 
    और हो जाता है 
    सृजन कविता का 
    फिर भावनाएं 
    निजत्व से निकल 
    विश्वत्व की ओर 
    कर जाती हैं प्रस्थान .

          संगीता स्वरुप ' गीत '
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    सृजन ... 

    सपने के बीजों को
    अनुभव की धूप में सुखाया जाता है
    तब ही एक पूर्ण शुष्क बीज से
    सृजन का पल्लव फूटता है

    दुनिया की कुटी पिसी प्रथाओं में
    और रुखी सूखी परम्पराओं में
    जब कोई आशा का जल सीचता है
    तब ही एक शुष्क बीज से
    सृजन का पल्लव फूटता है

    अद्भुत होता है सृजन का क्षण
    इक छोटा सा बीज
    और ताप की जकड़न
    पानी से तृप्त हो कोरों को तोड़ता है
    तब ही एक शुष्क बीज से
    सृजन का पल्लव फूटता है

    रश्मि प्रिया.
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    The Poet and his Songs .
                                                                
    As the birds come in the Spring,      
    We know not from where;
    As the stars come at evening
    From depths of the air;

    As the rain comes from the cloud,
    And the brook from the ground;
    As suddenly, low or loud,
    Out of silence a sound;

    As the grape comes to the vine,
    The fruit to the tree;
    As the wind comes to the pine,
    And the tide to the sea;

    As come the white sails of ships
    O'er the ocean's verge;
    As comes the smile to the lips;
    The foam to the surge;

    So comes to the Poet his songs,
    All hitherward blown
    From the misty land, that belongs
    To the vast Unknown.

    His, and not his, are the lays
    He sings; - and their fame
    Is his, and not his; - and the praise
    And the pride of a name.

    For voices pursue him by day,
    And haunt him by night,
    And he listens, and needs must obey,
    When the Angel says: Write!

             - Henry Wadsworth Longfellow .
    _______________________________________________

    तब सृजन होगा ...                     

    अकथ कोई वेदना
    जब ह्रदय को छलनी करेगी, 
    टीस कोई धमनियों में 
    रक्त जब बन कर बहेगी,
    जब अजाना अश्रु कोई 
    अपनी पलकों से चुनेगा ...
    सृजन होगा .                     

    आस लौ जब थरथराये 
    तीव्र झंझावात में,
    हाथ को ना हाथ सूझे
    घोर काली रात में,
    भोर की किरणों का कोई स्वप्न 
    जब मन में बुनेगा  ...
    सृजन होगा .

    समर भूमि में ना थक कर 
    बैठ जाये हार कर,
    हाथ में दीपक उठाये 
    आँधियों को पार कर 
    पथिक अपने लिए  
    नूतन पथ गढ़ेगा ...
    सृजन होगा .

    लडखडायेगा...
    तो खोजेगा नया आधार भी,
    टूटने पर ही तो पायेगा  
    नया आकार भी,
    गिर के जब जब भी कोई   
    फिर फिर उठेगा...
    सृजन होगा .

               - मीता .
    _____________________________________________

    सृजन .


    सृजन कहो या कहो 'माँ'
    बाक़ी कुछ भी कहना बेमानी है
    और जो भी कहोगे
    क्या उस में झलकेगा
    सृजन ?

    मेरी मानो तो विषय समाप्त करें?
                   - पुष्पेन्द्र वीर साहिल.
    ______________________________________________________
    For Sargam , we have a very soul stirring song to go with the topic of Creation . Let's listen to this soothing melody by Brian Doerksen - 'Creation Calls', with lyrics .
    ( song suggestion - Leena Alag )

12 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सृजन पर बहुत सुंदर रचनाएँ .... आभार

it's me..mamta.. ने कहा…

चिरंतन का यह अंक बहुत ही अच्छा था..सभी रचनाकारों ने अपने मार्मिक भावों से ह्रदय को छू लिया...

Reena Pant ने कहा…

हमेशा की तरह बहुत सुंदर संकलन .मातृत्व पर्याय है सृजन का अपने बडे बेटे के जन्म से पहले यू ही एक कविता लिखी थी जो आप लोगो के साथ साझा कर रही हूँ

चारों दिशाओं से
यकायक आवाज़ ये आने लगी
अर्थ बदल रहे है जीवन के
कि पर्याय बदल गए है.
मौन हो जाओ क्षितिज
प्रात का बाल हो जाओ सूर्य
बिखेरो चांदनी चंदा
कि सर्जन कर रही हूँ मैं
सृजन कर रही हूँ मैं
अपने लाल का.
जरा लाली तो लाओ सूर्य
हरीतिमा बिखेरो पौध
तनिक सुगंध भी तो हो
वायु,,,,सुनो कहा हो तुम
जरा पास आ जाओ
हरिण ,तुम्हारी नयन कीप्रतिमता
जरा उतारने दो.
हाँ दंतहीन ओठों में मुस्कराहट
की रेख तो कमल
बिखरने दो .
चाँद अपना रंग तो चढ़ने दो
कि सृजन कर रही हूँ मैं
उफ्नो मत समुद्र
अपना गाम्भीर्य दो
थोड़ी चंचलता कि जरुरत है
लहरों धैर्य से ...
पृथ्वी तुम्हारा गुरुत्व मुझे चाहिए
सौंधी गंध माटी की
कि सृजन कर रही हूँ मैं
घटाओ एक बार उमड़ो
बिजली एक बार कौंधो
तनिक साथ दो मेरा
सृजन है अप्रतिम अनमोल मेरा
अधूरा रह न जाए
समर्पण तो करो जरा
कि सृजन कर रही हूँ मैं
एक योगी का .

Vinay Mehta ने कहा…

चिरंतन का यह अंक आज इतना विविध बन पड़ा है की शब्द नहीं मिलते कुछ भी कहने को ...
आज सच में सृजन हुआ है एक नए रूप नए रंगों का और जो समागम हुआ है वोह विस्मर्निये है अदभुत है .............

मेरे सभी मित्रों को ढेरों बधाइयाँ ..
संगीता जी , ममता और रीना जी आप का तहेदिल से शुक्रिया सब का हौंसला बड़ाने के लिए ...
रीना जी आप की रचना सच में बहुत सुंदर है ...

"चारों दिशाओं से
यकायक आवाज़ ये आने लगी
अर्थ बदल रहे है जीवन के
कि पर्याय बदल गए है.
मौन हो जाओ क्षितिज
प्रात का बाल हो जाओ सूर्य
बिखेरो चांदनी चंदा
कि सर्जन कर रही हूँ मैं "

बहुत खूबसूरती से आप ने जीवन के आरंभ का चित्र खिंचा है ........

अनुपमा पाठक ने कहा…

As Longfellow says:
"when the angel says: Write!", the poet must obey..., So is the secret of creation!!!

The poems included in this issue are very well compiled covering almost all the realms of creation!
Best wishes to chirantan team:)

Na ने कहा…

Sangeeta Swaroop Ji..Thank you for your appreciation, and for always reading us

Na ने कहा…

Mamta ji, thank you for your kind words.hope you will continue to give your encouragement to us

Na ने कहा…

Reena Ji, Thanks for this sharing this beautiful feeling of creation while having a life within.This should have been in the main issue of Chirantan , we all feel

Na ने कहा…

Vinay ji You have given words to our feelings.Thanks for being an integral part of Chirantan

Na ने कहा…

Anupama Ji , we are grateful for your words and the constant support. Thank you

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सृजन बहुआयामी है .. दृष्टि में है या कौतुक में है ..
बहुत शुक्रिया इतनी सारी रचनाएं एक साथ एक ही विषय पे पढवाने का ...

Na ने कहा…

Digambar ji,
dhanyawad aapki sarahna ke liye. keep reading and encouraging us

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