मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

सफ़र - Journey Within .

                                            
       ज़िन्दगी की टेढ़ी मेढ़ी राहों में...उतार चढ़ावों में...साथ चलते हुए जाने कितने ही हाथ छूट जाते हैं...कितने ही हमसफ़र मिलते हैं... मगर हर किसी के लिए उसका सफ़र नितांत उसका खुद का है... उसकी थकान उसकी खुद की है, उसके पैरों के छाले, तलवे में धंसे कांटे उसके खुद के हैं... फिर चाहे वो सफ़र ज़िन्दगी का हो, रिश्तों का... या फिर खुद को ही तलाशने का. 
        हर एक छाला... हर ज़ख्म हमें ये एहसास दिलाता है कि हमारे पैरों ने रहगुज़र को बड़ी शिद्दत से चूमा है... हमने हमारे सफ़र को पूरी तरह जिया है... रास्ते की धूप में झुलसे हैं तब कहीं जा कर दरख्तों की ठंडी छांह को समझ पाए हैं. 
       और फिर... एक रोज़ चलते चलते ये एहसास होता है, कि सफ़र ही तो मंजिल है... रुकना नामुमकिन...
      आइये, इन खूबसूरत पंक्तियों के साथ शुरुआत करते हैं चिरंतन के इस  सफ़र की -


"पथ पर चलते रहो निरंतर 
सूनापन हो या निर्जन हो 
पथ पुकारता है गत स्वन हो ...
पथिक चरण ध्वनि से दो उत्तर 
पथ पर चलते रहो निरंतर "
                   
                   - मीता .
 __________________________________________


प्रतिष्ठित और जाने माने कवि और आलोचक श्री नोमान शौक़ जी की इस खूबसूरत ग़ज़ल से आज के विषय का आग़ाज़ करते हैं 'Master's Category' के अंतर्गत -

ग़ज़ल 


मुख़्तसर को मुख़्तसर करते हुए                 
दायरे में सब सफ़र करते हुए .  


हम हुआ ही चाहते थे माहताब 
इक इबादत रात भर करते हुए .


तय किया चेहरों से आगे का सफ़र 
आइनों को दरगुज़र करते हुए .


अपनी मंजिल तक पहुंचना है मुझे 
हर दवा को बेअसर करते हुए .


आ गए अपने ही दिल के आस-पास 
हम तेरी जानिब सफ़र करते हुए .


यूँ नहीं पढ़ते किताबे-ज़िन्दगी 
आंसुओं से तर-ब-तर करते हुए . 


हो गए ना-मातबर हम एक दिन 
हर किसी को मातबर करते हुए .


                           - नोमान शौक़ 
___________________________________________


रूह का सफ़र जारी है...



जिस्म दर जिस्म
रूह का सफ़र जारी है...


तुम्हे भी याद तो होगा
वो सातवें पहाड़ की गोदी में
जहाँ तुमने और मैंने
अपने जिस्मों का खोल छोड़कर
एक ही मोहब्बत का पैराहन
नोश किया था...


मैंने सूरज की नब्ज़ छांटकर
तेरी मांग में सिन्दूरी शाम भरी थी
और उसी पहाड़ के पीठ पीछे
बर्फ की सर्द गर्म साँसों पर
जिस्म का इंधन जला के तापा था


एक दुसरे से
ऐसे लिपटे हुए थे हम
जैसे के सांस लिपटी हो सीने में
जैसे गुथ गए थे
शाम ओ सहर आपस में


दो जिस्मों ने
दो रूहों के मिल जाने का
सौदा सनद किया था...


जानाँ...
मुझे यकीं है
जिस्म दर जिस्म
यह रूह चलती रहेगी
बेहद से अनहद की ओर
हर सात जनम में
हर रोज़ वहीँ पर
उस सातवें पहाड़ की गोदी में
...मैं...
तुमसे मिलने आऊंगा...


जिस्म रुकेंगे सफ़र में... लेकिन
रूह बना मैं चलता जाऊंगा...


जब कोई फ़लक न होगा
अपने सर पर
ज़मीन बह चुकी होगी
जब दर्द-दवा फिरदौस क़ज़ा
कुछ भी न कहीं होगा
आफ़ताब का नूर नुमायाँ होगा
चाँद की शफ्फाफ़ समतल हथेली पर
हम तुम दोनों मिल जाएँगे...


रूह से रूह मिलेगी जब
सफ़र ये अंजाम को पहुंचेगा
सातवें पहाड़ की गोदी में
एक सूरज फिर तुलु होगा...


रूह का सफ़र है...
सफ़र ये जारी है...


              - देव .
_________________________________________

पाथेय 


जब कभी मैं नहीं रहूँगा                         
तुम्हारे करीब, तब तुम्हारी 
निचाट सूनी, बियाबान यात्रा 
के अँधेरे को रौशन 
करेंगी ये कवितायेँ -
एकाकी- एकान्तिक यात्रा में 
मेरे ये शब्द -
तुम्हारे पाथेय बनेंगे .


             - दिनेश द्विवेदी .
___________________________________________


                           SOUL SURRENDER 


                                          

Lonely I stand at the crossroads
Reaching out with eyes to caress
The faces gliding by within me
A glimmer of hope
With a satin thought
Grazes the sheets of memory
Revelling in the silky smoothness
When sensations steal me
Directionless I drift
Searching that familiar face
With enmeshed dreams
Sudden wafts of the musk
When I forget who I am
Become the loadstar
And when the sea
Of desires and wants
Abates its fury
To the unruffled waters
Of clear consciousness
The remnants of dreams
Rearrange in sync
Finally the beloved emerges
How clearly I can see
That he wasn’t the destination.
Beloved was the journey within me .


- Sadhana .


_______________________________________________

चरैवेति चरैवेति चरैवेति निरंतरम ......


सफ़र ज़िन्दगी का                                
कुछ यूँ बीता ..
कभी भरा भरा
कभी एकदम रीता


कही जगमगाती आशाएं
कहीं रंगीन मेले
कभी खूब सारे लोग
कभी रहे अकेले


कभी मन की कर ली
कभी दूसरों की सुन ली
कभी खूब अच्छी राह
कभी छोटी डगर पकड़ ली


सफ़र चलता रहा
बहते ढहते रहे
रौशनी की चाहत में
अँधेरे सहते रहे


आज सफ़र का हिसाब किया
अपना भी मन साफ़ किया
मिलता रहा बहुत कुछ
गंवाया क्या ये याद किया


दुआएं सब सिमट जाये
तुम्हारे साथ ही कट जाये
ज़िन्दगी की पहेली
सुलझ जाएगी
तुम साथ चलो बस
सुबह फ़िर आएगी


            - रश्मि प्रिया .
___________________________________________


अपना अपना सफ़र करो पूरा .




चाहे जिस आस पर करो पूरा 
फासला उम्र भर करो पूरा .                      

दिन में तोड़ो पुराने ख्वाबों को  
फिर उन्हें रात भर करो पूरा .

कभी मिटटी के घर फ़ना कर दो 
कभी उजड़ा शहर करो पूरा .

कितनी रस्में हैं ज़िंदा रहने की 
टूट जाओ मगर करो पूरा .

कोई भी साथ क्यों किसी का दे 
अपना अपना सफ़र करो पूरा .

                 - मीता .
_________________________________________


अर्घ्य 



गोमुख के हिमाच्छादित                           
उत्तुंग शिखर पर 
समाधिस्थ बैठे योगी 
तुम तक पहुंचना अब 
कठिन ही नहीं , 
असंभव -
हो गया है .


घाटियों में स्थित मेरे दिव्य-
भव्य- उन्नत प्रेम 
और मुक्त करती 
कविताओं के अर्घ्य 
को स्वीकार करो .


द्रौपदी की तरह 
इस यात्रा में पहले 
मुझे ही गिरना होगा 
पर तुमसे मैंने 
'इतना पाया' 
है , कि मृत्यु मलाल नहीं 
उत्सव हो गयी है .


स्वीकारो मेरी 
'अंतिम कविता' 
और कभी न समाप्त होने वाला 
'प्रेम' .


         - दिनेश द्विवेदी .
______________________________________


चला ही जा रहा है कारवां कहाँ आखिर?




चला ही जा रहा है कारवां कहाँ आखिर?


किसी को क्या पता जिस्मों की इस रवानी में 
कितनी रूहों ने साथ छोड़ा है?
बूँद का रेत में धीमे से जज़्ब हो जाना 
कुछ इस अंदाज़ में ही वक़्त की सियाही ने 
उम्र की राह पे अपना निशाँ छोड़ा है.


तमाम जिस्म जो शामिल हैं इस रवानी में 
भला कोई उनमे खरीदार यहाँ है कि नहीं ?
कोई है जो अपने साथ ले के आया है 
अपनी उम्र का, एहसास का हिस्सा थोड़ा,
चंद गफलत भरे अलफ़ाज़ के एवज ही सही 
बेच तो दे, पै ऐसा कोई बाज़ार नहीं.


उस मुसाफिर की राह कितनी तंग सही 
फिर भी छोड़े हैं उसने जलते हुए पैरों के निशां,
कई आतिशफिशां हैं दफ़्न जिन निशानों में, 
धूल की पर्त तले सुलगते हैं फफोले अब तक 
ताकि फिर कोई गुज़रे इधर से भूले से 
तो उनकी गर्मी से मालूम उसको हो जाए 
कोई गुज़रा है अकेला इधर से पहले भी 
जो अपने जिस्मो-जां का खून कर गुज़रा है 


छिड़क के खून वही वो उफक के दामन पर 
कह रहा था चीख-चीख कर ज़माने से 
आने वाली सुबह का मेरे हाथों क़त्ल हुआ...


              - पुष्पेन्द्र वीर साहिल.
__________________________________________

Lost Paradise .



From the soft cocoon of silence,             
From the soothing, gentle darkness 
Something woke me up with a start ...
The gnawing hunger for light,
The monstrous craving for sound,
Beating in my feverish heart.


Fumbling in the dark somehow
I started blindly on my way
As stronger grew the urge within.
The urge to see ...
To see and grasp,
To grasp and know that distant din.


See what ?
That faces change, and voices too !
That everything beautiful turns to dust 
whatever you do !


Know what ?
The agony, the pain ! 
Souls, bound in chains !
Birds encaged, flutter and die !
Broken bits of shattered sky !


This was never meant to be,
But this is all I now can see.


Tired, now I am homeward bound,
To the dark, where my peace lies ...
With a head as heavy as lead,
And a vision that burns my eyes .


Of knowledge, I have paid the price
Forever I've lost my paradise . 


                        - Meeta .
__________________________________________

सफ़र पे चलता रहा मुसलसल.



भले तड़पता रहा मुसलसल,
सफ़र पे चलता रहा मुसलसल.


मैं ठोकरों से गिरा तो लेकिन,
खुदी संभलता रहा मुसलसल,


जिसे भी मैंने सुकून बख्शा,
वो मुझ से जलता रहा मुसलसल.


मैं जो भी हूँ बस करम है उसका,
जो मुझसे मिलता रहा मुसलसल.


मैं अपनी रुसवा नज़र से किस्से, 
फलक पे लिखता रहा मुसलसल.


मुझे बियाबां में लाके मोहसिन,
मुझी को छलता रहा मुसलसल.


                       - इमरान .
_________________________________________


जीवन यात्रा ..


ज़िन्दगी चलती रही 
एक सफ़र पर
खट्टे मीठे से ...                                                                                        


कभी रौशनी के दरीचे
कभी निराशा का अँधा कुआँ
ज्यादा की सोच नहीं रखी
पर गड़ता रहा कसैला धुआं.


कदंम डगमगाए
तो सिर्फ तुम याद आये.
ईश्वर...
आखिर तुम तो देख रहे थे
सफ़र में शामिल थे कई लोग,
पर हमसफ़र तुम ही थे 
वीरानियाँ साथी बनी
तब भी तुम ही थे.


तुम्हारा हाथ हमेशा रहा साथ,
सिखाता रहा पाठ.
मिथ्या है सब कुछ
ना जायेगा साथ,
जब तक हो ........
जीवन गागर से स्नेह जल छलकाते रहो
नेह बांटो नेह पाओ ...
कुसुम कुंज महकाते रहो.


           - रश्मि प्रिया .


________________________________________


Journey through this issue can not reach it's destination without this well known philosophical poem of Robert Frost about the choices we make in life ... and where they take us ... One more for the 'Master's Category' .
The Road Not Taken .


Two roads diverged in a yellow wood,     
And sorry I could not travel both
And be one traveler, long I stood
And looked down one as far as I could
To where it bent in the undergrowth;

Then took the other, as just as fair,
And having perhaps the better claim,
Because it was grassy and wanted wear;
Though as for that the passing there
Had worn them really about the same,

And both that morning equally lay
In leaves no step had trodden back.
Oh, I kept the first for another day!
Yet knowing how way leads on to way,
I doubted if I should ever come back.

I shall be telling this with a sigh
Somewhere ages and ages hence:
Two roads diverged in a wood, and I--
I took the one less traveled by,
And that has made all the difference.

                - Robert Frost .
_________________________________

सरगम के अंतर्गत प्रस्तुत है अहमद फ़राज़ जी की ये खूबसूरत ग़ज़ल, ग़ुलाम अली जी की आवाज़ में - 
कठिन है राहगुज़र ...


____________________________________________________________________

15 टिप्‍पणियां:

expression ने कहा…

वाह!!!!!!!!!!!!!!

जब रस्ते की धूप में झुलसे हैं तभी तो दरख्तों की ठंडी छांह को समझ पाए हैं.

बेहद खूबसूरत प्रस्तुति....और लाजवाब रचनाएँ.....
सभी एक से बढ़ कर एक...

बहुत बहुत शुक्रिया मीता जी.

अनु

अनुपमा पाठक ने कहा…

Wonderful compilation!
Perfect with the master stroke of Frost's poem!
Best wishes to all the poets!

May the journey continue.......

Leena Alag ने कहा…

मेरी ज़िन्दगी,मेरी मंजिलें,मुझे कुर्ब में नहीं,दूर दे
मुझे तू दिखा वही रास्ता,जो सफ़र के बाद गुरूर दे

Life and everything that adds value to it is on a perpetual journey...the air we breathe...the blood in our veins...the smile from the heart,to the lips and then to the eyes... body to soul... everything travels...but what is important is how well it covers that path...:)...just as the beautiful introduction to this issue by Meeta, promises of an enticing voyage...

Noman ji,"आ गए अपने ही दिल के आस-पास
हम तेरी जानिब सफ़र करते हुए ."...how beautifully expressed!

Dinesh ji...i have said it before and i will still hold strong that i am a huge fan of your brevity...how u condense the essence n feel of things in such few words!...your imagery of the fall of Draupadi is soooo remarkable...mythology with reality...what a fusion sir!

Devesh ji,i wont even bother mincing words...aapka "Rooh ka safar"...itna roohani hai ke throughout reading it i held my breath...it expresses the,"big in the small"content...of the spiritual within the cosmic...the interweaving and enmeshing of the physical with the cosmic and the spiritual by you displays in its thought something that all of us just dreamt of, all our lives...

Sadhana ji,destination indeed is the contentment of walking with the Beloved...
"मंजिलों पर कुर्ब का नशा हवा हो जाएगा
हमसफ़र वो है तो ऐ नादाँ ज़रा आहिस्ता चल"...:)

Rashmi ji,lovely poetry as always!..."कभी मन की कर ली
कभी दूसरों की सुन ली
कभी खूब अच्छी राह
कभी छोटी डगर पकड़ ली"...simple truth!

Pushpendra ji,veryyyy painful poetry...we all walk on and on in life whether we repent it or get frustrated...there is no stopping and no learning from other's experiences...

"ज़िन्दगी तनहा सफ़र की रात है
अपने-अपने हौंसले की बात है
क्या पता पहुंचेंगे कब मंज़िल तलक
घटते-बढते फासले का साथ है"

Meeta,just loooooooved "Lost Paradise"...the journey from Adam's age to the present...from an embryo intact in its mother's womb to completing a full circle of life with all its complexities and frailities and preparing to getting back to the final refuge...this poem of yours is,if i may say so, strongly streaked with sufism...its absolutely amazing!

"जुस्तजू ने किसी मंज़िल पे ठहरने न दिया
हम भटकते रहे आवारा ख्यालों की तरह..."

Imraan ji,"मुझे बियाबां में लाके मोहसिन,
मुझी को छलता रहा मुसलसल"...kya likha hai aapnay...laajawaab!...

"ऐ सफ़र इतना राएगां तो न जा
न हो मंज़िल कहीं तो पहुंचा दे"...

A very inspiring piece of poetry by Robert Frost and a perfectly befitting video...Bon Voyage Chirantan for times to come!....:)

Giribala ने कहा…

Wow!! What a collection!!

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" ने कहा…

पड़ाव कई आयेंगे
अवरोध चलने से रोकेंगे
हिम्मत ना कभी हारना
ना होंसला खोना
आंसू भी आयेंगे
व्यथित तुम्हें करेंगे
विचलित कभी ना होना
ना लक्ष्य कभी भूलना
निरंतर चलते रहना
जीवन सफ़र को
हँसते हँसते पूरा करना
मुसाफिर

Vinay Mehta ने कहा…

मीता जी ... २० वे चिरंतन के इस भेंट का अभिनंदन .....
सफ़र मंजिले ठोर राहते जो भी नाम दूँ .... हर एक का सफ़र अदभूत रहा ...
मेरे शब्दों में.....................
सफ़र यु ही तमाम होते गये
अक्स अक्स पे कुर्बान होते गये
मंजिले पार करने की जिद्द थी
पर रास्ते के जाल बनते गये
ना खत्म हुआ सफ़र आज भी मेरा
मजिलों पे पहुंचे.. नए रस्ते अंजाम होते गये ...
हाथ जुड़ते गये रिश्ते बनते गये
मीलों के पत्थर कई पीछे छुटते गये
बस सफ़र यु ही तमाम होते गये
अक्स पे अस्क हर मंजिलों पे तमाम होते गये .... होते गये .... होते गये .......

मीता जी सच है जुस्तजू दिल की कब कहाँ से धुआं बन के उठ जाती है
किस रास्तों से चल के कहाँ फनाह हो के फिर नया आयाम बन जाती है
फिर भी वजूद को समेटे अपने दामन में नए रास्तों को तलाशती जाती है
ज़र्रा ज़र्रा बीज का थकता नहीं अंत में आ के फिर बीज ही से शुरू होती है ....

पुष्पेन्द्र जी ने जिस तरेह से धुल की पर्त तले सुलगते हैं फफोले अब तक उन फफोलों की आतिश को खूबसूरती से दर्द भरे धागों में बांधा सफ़र को ...कमाल है ............

रश्मि जी तो बखूबी रास्तों मंजिलों की खबर रखती है
तभी तो छोटी छोटी पखडंडियों में भी मंजिले सब से मिल के बयां करती है .....

नोमान शोके सफ़र इस तरेह करते है ..
इक इबादत है जो वोह रात भर करते है ...
दिल के आस-पास से यु गुजर जाते है ..
जसे होले से किताबे सफे पलट जाते है .....

साधना जी कमाल है क्या कहू बस न कह के सब कुछ बयां करता हु ....

देव के सातवे पहाड़ के पीछे अब भी रूहों का सफ़र जारी है
बस फितरत इतनी है जालिम की आसुओं का भी सैलाब भारी है ......

दिनेश का साफगोई से सफरनामा उम्दा है ...........

इमरान तुम छलिया हो दिल को छल लेते हो ...
ईलम भी नहीं होने देते चोरी कर के हमें ही चोर कर देते हो ...........

सब में रम के रास्तों में ही रम सा गया हु में....
वक़्त के हाथों में बस रफ्ता रफ्ता बहता गया हु में ..

आखिर में "अलग" है अंदाज़ जो बयां रूह के मुख़्तसर इस कदर होते है
रीन कर जिगर को कलम से कागज़ पे हीना सी खुशबू "रीना" जुबान होते है ..

आभार चिरंतन के सभी मेरे साथियों का .................
अंत में बस कहूँगा अपने सफ़र को चाँद अल्फाजों में .....
सफ़र.....................
गुजरते ही नहीं यह लम्हे ..
इधर में हु की बहता जा रहा हूँ
रेत हु की पानी हु
वक़्त की बंद मुठिओं में
कैसे फिसलता जा रहा हूँ ...
कैसे समझोंगे नहीं जानता
पल पल बदलता ही जा रहा हूँ ....

न सोचा था न समझा था ..
ठहर सा में गया जो था
लगा..की पा लिया उसको
वोह लम्हा ऐसा ही कुछ था
कब वोह गुज़र गया
पता भी न चला मुझको
खुद को बहता हुआ पाया
वोह दोजख वक़्त ही तो था

क्या कहता नहीं समझा
बड़ा ही अजीब सा मंजर हूँ
लुट के खुदी से खुद देखा
सौदैए जिंदगी से सस्ता हूँ
बस बहना ही सफ़र है अब तो
लहरें तुफानो का बाशिंदा हूँ .......................

विनय ..............

dev ने कहा…

वाह... अद्भुत है यह सफ़र... अगर सफ़र ऐसा हो तो यक़ीनन खूबसूरत ही होगा... फिर क्या मंजिल क्या हौसला... आनंद ही आनंद... मस्सर्रत ही मस्सर्रत... चिरंतन को इस पहाड़ी नदी जैसे सफ़र के लिए बधाइयाँ. हर बार की तरह नए आयाम हैं शब्दों में... ज़िन्दगी के सफ़र में हमसफ़र बनाने लायक अंक... :)

Devesh

CHIRANTAN ने कहा…

@Anupama jiThanks ...please stay with us all through the journey :)

@Leena ji many thanks for your heartwarming and motivating comment :)

@Giribala ji thank you for reading and appreciating our efforts :)

@डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" जी,
सफ़र पर केन्द्रित आपकी खुबसूरत रचना को पोस्ट करने के लिए हार्दिक आभार... भविष्य में भी आप इसी तरह साथ निभायेंगे .. हम ऐसे आशा करते हैं ..

@Devesh ji! your comment is beautiful and so is our journey with you :)

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…





आदरणीय बंधुवर पुष्पेन्द्र वीर साहिल जी
सस्नेहाभिवादन !

आपकी यह पोस्ट देख कर विस्मय और प्रसन्नता एक साथ अनुभव कर रहा हूं …


मैं सभी रचनाकारों का नाम लिए बग़ैर सबको बहुत बहुत बधाई देता हूं श्रेष्ठ सृजन और सृजन-साधना के लिए …

आप सहित सभी काव्य-हस्ताक्षरों के प्रति आभार और बधाई !

शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार

CHIRANTAN ने कहा…

परम आदरणीय राजेंद्र स्वर्णकार जी!
आपकी अमूल्य टिपण्णी और सराहना से मनोबल में वृद्धि हुयी है...

सभी नव हस्ताक्षर और टीम चिरंतन की और से हार्दिक धन्यवाद् स्वीकार करें..

आशा है भविष्य में भी आपका सहयोग मिलता रहेगा...

... सादर चिरंतन

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति.....बधाई.....

CHIRANTAN ने कहा…

Sorry for Late reply due some comments gone to spam...

@अनु जी ... आपकी सराहना के लिए चिरतन टीम आपका हार्दिक आभार व्यक्त करती है...

@विनय जी! आपकी दिल से की गयी विस्तृत टिपण्णी से चिरंतन का ह्रदय पुलकित है ... आपकी सफ़र पर आधारित रचना को साझा करने के लिए आभार... प्रत्येक चिरंतन सदस्य की और से आपको विशेष धन्यवाद् :)

@प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी! आपका हार्दिक धन्यवाद् :)

बेनामी ने कहा…

it is a very interesting and informative article. I think I will add your site to my favorites.

Nomaan Shauque ने कहा…

I went through a few issues of Chirantan.... You are really doing a great job. Keep it up Meeta ji......

meeta ने कहा…

नोमान जी आप के शब्दों से हम सभी का हौसला बढ़ा है. चिरंतन की टीम की तरफ से आप का हार्दिक आभार.

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...