सोमवार, 25 जून 2012

खंडहर / The Crumbling Ruins .


इमारतों की बुनियाद भरते ही कंगूरों की आँखों में रख दिया जाता है सपना - तुम सिर्फ आसमानों से बातें करोगे. सर उठा कर खड़े रहोगे. पहचाने जाओगे. बल्कि तुमसे पहचानी जाएँगी इमारतें.और एक दर्प से भर उठती हैं उनकी आँखें. तेज धूप में भी चौंधियाती नहीं हैं. अट्टालिकाओं के अट्टाहास, इतिहास में लिखे जाते हैं.

कोई नहीं बतलाता उन्हें कि अगर कुछ है जो बाकी रहेगा इन इमारतों के खंडहर हो जाने के बाद भी तो वह है बुनियाद. भले ही बुनियाद ने कभी सर ना उठाया हो लेकिन वक़्त की मार से खंडहर हो चुकी इमारतों के बेतरतीब गिरे खम्भों और बिखरे कंगूरों की तरह उसे सर झुकाना भी नहीं पडा.

बुनियाद बनना मुश्किल है. सहारा देना बहुत मुश्किल है. उस सहारे को पहचानना और भी मुश्किल है. अक्सर गिरे हुए खम्भे और बिखरे हुए कंगूरे बुनियाद को कोसते दिख जाते हैं. लेकिन बुनियाद को फर्क नहीं पड़ता. उसके हिस्से अभिमान भी नहीं आया था. किसी ने आजतक नींव की इंटें गिनी हैं कभी?

खंडहरों में इतिहास खोजने वाले भी बुनियाद से बात नहीं करते... लेकिन खंडहर अंतिम सत्य नहीं है. बुनियाद आखिर तक रहती है. तब भी, जब खंडहरों का भी निशाँ मिट जाता है. भले ही दबी रहती हैं गर्द तले.
                                - पुष्पेन्द्र वीर साहिल.
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श्री खुशबीर सिंह शाद जी उर्दू शायरी की दुनिया की वो कद्दावर शख्सियत हैं, जो किसी परिचय के मोहताज नहीं। हम बहुत आभारी हैं उन के कि उन्होंने हमें चिरंतन में अपनी एक बेहतरीन नज़्म साझा करने की इजाज़त दी। प्रस्तुत है Master's Category के अंतर्गत उनकी ये दिल छू लेने वाली नज़्म .


लाल कोठी.


अचानक घर की हर दीवार से 
उग आयी हैं आंखें 
मुसलसल मेरी जानिब देखतीं 
हैरत औ ग़ुस्से से
मैं ज़ख़्मी हो गया हूँ 
इनके ज़हरीले सवालों से 


ये आखिर क्या किया तूने?
वो जिस के सेहन से डोली उठी थी तेरी बहनों की 
जहाँ इक दूसरे घर से तू डोली ले कर आया था 
तेरे मासूम बच्चों की जहाँ किलकारियां गूंजीं 
जहाँ से बूढ़े माँ और बाप को अंतिम बिदाई दी 


सुना है आज उस घर का ही सौदा कर लिया तूने?


सुना है जिस के हाथों तूने बेचा है ये घर अपना 
नयी तामीर की खातिर इसे मिस्मार कर देगा 


अगर मुमकिन हो तो इतनी गुजारिश उससे कर लेना 
कहीं मलबे में तेरे बाप के कुछ ख्वाब दिख जायें 
तो उनको साफ़ पानी के 
किसी दरया में डाल आये .


        - खुशबीर सिंह शाद .  
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देह यह.


किस तरह खोजोगे तुम 
मेरी देह प्रस्तर के 
दुर्भेद्य दुर्ग में छिपे 
रहस्यमय तिलिस्म को 
क्योंकि तुम्हारी 
ओछी-उथली 
छिछली-छिछोरी 
दृष्टि को चाहिए होगा 
कृष्ण प्रदत्त, किसी-
दिव्य दृष्टि का 
अनुपम-प्रसाद 
वरना 
निरर्थक होगी 
तुम्हारी यह 
खण्डहरी 
देह यात्रा .


      - दिनेश द्विवेदी.
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हर युग के प्रारब्ध में.

ऊंची अट्टालिकाओं की भीड़ में
ले रहे हैं सांस,
ख़ामोश खंडहर...


अपनी ख़ामोशी में,
सहेजे हुए
वक़्त की कितनी ही करवटें
कितने ही भूले बिसरे किस्से
बीत चुके
कितने ही पहर...


सन्नाटे में गूंजती
किसी सदी की हंसी
जीर्ण-शीर्ण प्राचीरों के
मौन में फंसी,
इस सदी के द्वार पर
दे दस्तक
दिखलाती है-
वक़्त कैसे अपने स्वभाव के अधीन हो
ढ़ाता है कहर...


हमेशा ये अट्टालिकाएं भी नहीं रहेंगी
निर्विकार, निर्विघ्न चल रही है प्रतिक्षण
परिवर्तन की लहर...


हर युग के प्रारब्ध में है लिखा हुआ एक खंडहर!


                              - अनुपमा पाठक.
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खँडहर.

तुम जो हो आज खँडहर ,
कल रहे होगे संपूर्ण ...
सौंदर्य वैभव परिपूर्ण .
झुलसती धूप, आंधी तूफ़ान में
न जाने कितनों का आश्रय .
मूसलाधार वर्षा में
न जाने कितनों के सर की छत .


आते थे - जाते थे जो
क्या कह कर पुकारते थे उन्हें तुम ?
आगंतुक ?
अतिथि ?
पाहुने ?
जाने कितनी पदचापें,
कितनी परछाइयाँ,
आज भी समेटे हो
जर्जर अस्तित्व की परतों में तुम .


और अब
जब कि गिर रही हैं तुम्हारी दीवारें,
टूट चुकी है छत,
मकड़ियों ने बुन लिए हैं
ओने कोने में जाले ...
दरवाज़ों खिडकियों को
खा गयी है दीमक...
अब जब तुम नहीं रहे आश्रय प्रदाता,
तो तुम्हारे पास कोई नहीं आता.


हाँ ... मनुष्य ही की तरह 
अक्षम हो तुम 
रोक सकने में 
किसी का आना ...ठहरना ...जाना... 
और तुम्हारी ही तरह 
बाध्य है वो 
देखने को मूक  
खुद को टूटते-बिखरते,
घर से खँडहर बनते .


             - मीता .
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Forgotten Pillars .



Mute witness
having succumbed to
the weight of timelessness
they stand adorned
with haphazard creepers
and cobwebs weave intricate design
over decades of dust.


Shunned into oblivion
away from all religious frenzy
they might offer solace
to the chance wanderer
untainted as they are
with the blood of devotees.


SHANTANU RAY CHOUDHURI


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काम के हैं खँडहर :)



मिस्र , मेसोपोटामिया के हों 
या मोहनजोदड़ो, हड़प्पा के ...
खँडहर बहुत काम के हैं।


न केवल ये वाकिफ कराते हैं 
हमें हमारे पूर्वजों के रहन सहन से, 
बल्कि हमारे आधे अधूरे 
इतिहास को भी करते हैं पूरा।


मकान हों, महल हों, या भव्य अट्टालिकाएं 
हम ही इन्हें बनाते हैं,
हम ही इन्हें रखते हैं आबाद।
जब तक इनमें हमारी आवत जावत रहती है 
ये दुरुस्त रहते हैं ,
खूबसूरत रहते हैं ...
जब हम इन्हें पीछे छोड़ 
आगे निकल जाते हैं 
और फिर 
वहीँ के होकर रह जाते हैं,
तब 
ये अकेले 
समय के थपेड़े झेल नहीं पाते 
और खंड-खंड हो जाते हैं।


वैसे आबाद मकान हो या खँडहर 
काम तो दोनों ही आते हैं...
आबाद रहने पर 
घर कहलाते हैं, 
खँडहर हो जाने पर 
कितने ही 
पशु-पक्षियों का घर बन जाते हैं।


         - ललित मोहन पांडे 

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आज गिरा खण्डहर हूँ.


ग़म में डूबा हुआ वीरान मैं एक मंज़र हूँ,
कल इमारत था मगर आज गिरा खण्डहर हूँ।


टूटा बिखरा हुआ सा आज मैं सामान सही,
कल तलक जो भी था हूँ तो मगर इन्सान वही।


क्या बताऊँ तुम्हें इतना क्यूँ मैं बेचैन रहूँ,
सोज़े गुमनाम को दिन रात मैं सीने में सहूँ।


तुम में खोने से भी पहले मैंने ये पूछा था,
मेरे हमदम ये बताओ है मेरा दर्जा क्या?


तुमने क्यों मुझसे कहा के तू मेरा किस्सा है,
मेरे किरदार का टूटा हुआ तू हिस्सा है।


क्यूँ मेरे सर के निगहबान बने साया किये,
क्यों मेरे साथ रहे ख्वाब में क्यों आया किये।


तुमने रिश्ते को हमेशा के लिए तोड़ दिया,
मुझको जलते से सवालों से घिरा छोड़ दिया।


मेरी कश्ती है बुरीदा मेरी पतवार भी गुम,
कैसे हालात में बिछड़े हो मुझे छोड़ के तुम।


मैं निगाहों में कभी गर्द नहीं दे सकता,
मिट तो जाऊँगा तुम्हें दर्द नहीं दे सकता।


गर तुम्हारी है रज़ा खुद को मिटा लूँगा मैं,
अबके मर के भी न आवाज़ लगाउँगा तुम्हें।


चन्द लम्हात में जो उम्र गुज़ारी मैंने,
उसकी यादों की नक़ल दिल पे उतारी मैंने।


मैं तो अल्लाह से दिन रात दुआ करता हूँ,
खुश रहो तुम यही फरियाद किया करता हूँ।


खण्डहर तुमने बनाया है भले ही मुझको,
दिल तो फिर भी ये फक़त याद करेगा तुमको।


               - इमरान खान ' ताइर '
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खंडहर में जीवन ...



गाईड बता रहा था
ये 'रनिवास' था
ये उनका स्नान कक्ष
यहाँ लगाये जाते थे 'खस' के परदे
और मेरा मन
बस सीढियां उतरते चला गया
एक तन्वंगी
सेवा करती कई दासियाँ
इतर और तेल की खुशबु से महक उठा प्रांगण
उतरती जाती थी रग रग में
मै देखती रही किल्लोलियाँ
दिखती रहीं जलपरियाँ
उनकी ठिठोलियाँ
मन कहाँ कहाँ की और छलांगे मारता
मानो उतर ही गया
उनके साथ उस 'पत्थर 'के
तथाकथित बाथटब में.... [गाईड कह रहा था ...:प]
जी रहा था उस 'पल ' को
जो मुश्किल से कुछ शताब्दी पहले बीती होगी
और 'उस ' ने कंधे 'झिंझोड़े '
ओह! तुम ना बस
हम पूरा प्रासाद देख आये
तुम 'यहीं ' खड़ी हो
खंडहर में ...
अब ना 'हाथ ' पकड़ के ले जाऊंगा
साथ साथ ...
कहीं भी खड़ी हो जाती हो
और खो जाती हो
कहीं की "रानी थी क्या "
...........................:)
अक्सर होता है
मेरे साथ
टूटे फूटे मन , भवन
मेरे अन्दर बस जी उठते हैं
सुनाते हैं ऐसी कहानियां
जो उस 'रट्टू ' गाईड को भी नहीं पता होते ...:))


            - राजलक्ष्मी शर्मा.

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खँडहर.

यूँ ही चलते चलते 
खिड़की से झाँका 
मानो वो दूर खड़ा खँडहर 
तेजी से मेरे साथ दौड़े जा रहा हो 


अक्सर जब भी मैं 
खिड़की से झांकता हूँ 
तो उसको यूँ ही अपने साथ 
दौड़ता हुआ पाता हूँ 
स्थित अपनी जगह
खंडित ...
फिर भी  जीवंत.


लगता है बहुत कुछ कह जाता है 
आइना दिखलाता ... 
मिलवाता सत्य से ...
परोक्ष में अवचेतन को भेदता ...
सार बतलाता ... 
भूत का भविष्य से 
वर्त्तमान में सामना करवाता .


जिसने सेका है भिन्न भिन्न तापों को 
झेला है आँधियों तूफानों को 
ख़ुशी और दर्द के मुहानों को 
खंडित हुआ ...
फिर भी अडिग ...धरातल से बंधा .
किन्तु दौड़ता हुआ मेरे साथ 
जब जब मैं झांकता हूँ 
खिड़की से .


कभी मुझे लगता है 
मानो तुम ही यात्रारत हो 
और मैं एक स्थान पर अडिग खड़ा 
कर्म में निरत हो 
तुमको निहारता 
जीवन का दिया तुम्हारा पाठ 
निरंतर बदलाव का 
बांचता .


हाँ 
तुम 
खँडहर 
मेरे भीतर हो 
मैंने देखा तुम्हें 
मन की खिड़की से 
जब भी हूँ झांकता .


           - विनय मेहता .
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अभी तक घर बसा हुआ है ये. 

माना दरकी नहीं हैं दीवारें
और  छत में सुराख  कोई नहीं
अभी इस में ख़याल रहते हैं 
अभी तक घर बसा हुआ है ये 
लोग ऐसा ही कुछ समझते हैं
मैं भी कहता हूँ, खैरियत से हूँ!

ये बदन भी तो एक खंडहर है
क्या हुआ, गर अभी सलामत है?
वक़्त से पूछ कर कभी देखो - 
है फ़क़त इंतज़ार का किस्सा!

         - पुष्पेन्द्र वीर साहिल.
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स्मृति के भग्नावशेष.

अजाने, अचीन्हे 
खींच ले जाता है ह्रदय 
उस ठौर,
किसी मृतप्राय कोने से जहाँ 
अचानक निकल कर 
आ लिपटता है तुम्हारा स्पर्श।

सुधियों के सीले, बंद कमरों में 
मंदिर की घंटियों की तरह 
गूँज उठती है तुम्हारी आवाज़, 
हवाओं में महक जाती है लोबान,
तुलसी चौरा का बुझा दिया 
टिमटिमा उठता है,
और जंग लगी, बंद खिडकियों से 
छनने लगती है धूप।

अतीत के जालों पर 
ओस की बूंदों सी 
चमकती है तुम्हारी हंसी।

स्मृति के भग्नावशेषों में 
शेष हो तुम...
धीरे धीरे ढहती 
उम्र की दीवार पर 
जगह जगह खुदे 
तुम्हारे ही नाम की तरह।

             - मीता .
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For Master's Category we have one more poem by famous Irish novelist, critic and poet C.S.Lewis who is very well known for his fiction ' Chronicles Of Narnia ' and ' Space Triology ' and non fiction 'Miracles' and ' Problems of Pain .'
As The Ruin Falls.




All this is flashy rhetoric about loving you.
I never had a selfless thought since I was born.
I am mercenary and self-seeking through and through:
I want God, you, all friends, merely to serve my turn.

Peace, re-assurance, pleasure, are the goals I seek,
I cannot crawl one inch outside my proper skin:
I talk of love --a scholar's parrot may talk Greek--
But, self-imprisoned, always end where I begin.

Only that now you have taught me (but how late) my lack.
I see the chasm. And everything you are was making
My heart into a bridge by which I might get back
From exile, and grow man. And now the bridge is breaking.

For this I bless you as the ruin falls. The pains
You give me are more precious than all other gains. 
                                          - Clive Staples (C.S.) Lewis.

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इस बार सरगम में प्रस्तुत है ये खूबसूरत ग़ज़ल नुसरत फ़तेह अली खान साहब की आवाज़ में - ' मेरे दिल में तेरी यादों के साए .'

8 टिप्‍पणियां:

Vinay Mehta ने कहा…

खंडित हु पर जिन्दा हु ...
टूट गया बिखर गया ...
हर दर दिवार ....
पर न टुटा है होंसला मेरा ...
न वजूद ...
आज भी खड़ा हु ..
जमीं से बंधा ...
देता था कल बन घर पनाह ..
खंडर बन गया गम नहीं साहिब ...
परिंदों का अब भी है यह ठंडा आशियाँ .... ..

बेहद खुबसूरत भिन्न आयामों से मुखरित होती हर मन की दास्ताँ .........

बेनामी ने कहा…

बेहद ही उम्दा कविताओं का संग्रह है....खंडहर विषय पर सभी सह्भागिओं ने अपने अपने उदगार बहुत ही अच्छे तरह से व्यक्त किये हैं..आप सभी लोग बधाई के पात्र हैं. चिरंतन इक बहुत ही शशक्त मंच बन के उभरा है जिस में अलग अलग विषयों में आप महानुभाओं के विचार को मंथन करने का अवसर मिलता है....इस लों को जलाये रखना ....बहुत बहुत सुभकामनाएँ..
दीपक.

अनुपमा पाठक ने कहा…

खंडहर को जीती, उसमे झांकती, उसे सजीव करती सुन्दर रचनायें...!
Glad to be a part of the issue!
आभार!

Rakesh Kumar ने कहा…

अनुपमा पाठक जी के ब्लॉग से 'चिंरतन' का लिंक मिला.
खंडहर पर एक से बढ़कर एक रचना.
सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.

Reena Pant ने कहा…

फुर्सत से चिरंतन का यह अंक पढ़ा .कभी भी चिरंतन को पढने में देर नहीं लगाती .पर आज का अंक बहुत भीतर गहरे तक उतर गया .सुंदर सजीव , परिपक्व रचनाएँ ,.....बहुत खूब .पुष्पेन्द्र जी द्वारा लिखी भूमिका ने अंक को नया आयाम दिया है सभी को बहुत बहुत बहुत बधाई ......

IQBAL KHAN ने कहा…

चिरंतन बहुत ही सहज होने के लिए आप को मुबारकबाद पेश करता हूँ :-
ग़म में डूबा हुआ वीरान मैं एक मंज़र हूँ,
कल इमारत था मगर आज गिरा खण्डहर हूँ।
अच्छा शेर था और आपका टॉपिक भी माज़ी को चूता हुआ गुज़ारा.शुक्रिया
इकबाल खां , रियाध ,सऊदी अरब

IQBAL KHAN ने कहा…

चिरंतन बहुत ही सहज होने के लिए आप को मुबारकबाद पेश करता हूँ :-
ग़म में डूबा हुआ वीरान मैं एक मंज़र हूँ,
कल इमारत था मगर आज गिरा खण्डहर हूँ।
अच्छा शेर था और आपका टॉपिक भी माज़ी को चूता हुआ गुज़ारा.शुक्रिया
इकबाल खां , रियाध ,सऊदी अरब

IQBAL KHAN ने कहा…

चिरंतन बहुत ही सहज होने के लिए आप को मुबारकबाद पेश करता हूँ :-
ग़म में डूबा हुआ वीरान मैं एक मंज़र हूँ,
कल इमारत था मगर आज गिरा खण्डहर हूँ।
अच्छा शेर था और आपका टॉपिक भी माज़ी को चूता हुआ गुज़ारा.शुक्रिया
इकबाल खां , रियाध ,सऊदी अरब

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