सोमवार, 14 जनवरी 2013

सोचते हैं वो .


सोचते हैं वो कि मुझे तोड़ कर
मेरे हिस्सों से कुछ जोड़ सकेंगे .
सोचते हैं वो की मुझे रुला कर
मेरे आंसुओं से कुछ सींच सकेंगे .
सोचते हैं वो कि मुझे डरा कर
मेरी चुप्पी से कुछ चैन पायेंगे .

नहीं जानते हैं वो कि
मेरे चुप होने में मेरी ताकत है .
मेरे आंसू मेरी बुनियाद सींचते हैं .
नहीं जानते हैं वो कि
मैं चुप रह कर भी कोलाहल पैदा कर सकती हूँ
अपने खौफ को अपनी ताकत में बदल सकती हूँ .

सोचते हैं वो , मगर वाकिफ नहीं कि
टूट कर मैं उस हवा में घुल चुकी हूँ
जिस से उन्हें सांसें मिलती हैं .

मैं एक ऐसी खुशबू में तब्दील हो गयी हूँ
कि न खोती हूँ , न बिखरती हूँ , न कहीं और जाती हूँ .
मैं वहीँ हूँ जहाँ वो हैं ...
मैं वो ही हूँ जो वो हैं ...
मैं रोज़ उन्हें आईने में नज़र आती हूँ .

  - अनुराधा ठाकुर .

1 टिप्पणी:

राकेश कौशिक ने कहा…

"मैं रोज़ उन्हें आईने में नज़र आती हूँ."

फिर नहीं सुधरते - प्रेरक प्रस्तुति

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