सोमवार, 28 जनवरी 2013

अजीब है .



मैं टुकड़ों में जीती हूँ ...
हर टुकड़े पे कोई नाम लिक्खा है ...
कभी - कभी सोचती हूँ मैं
मेरा अपना क्या है !

अजीब है ,
मेरा हरेक टुकड़ा
धड़कता , सांस लेता है
कि जैसे खुद में पूरा हो .

अजीब है ,
कि अपने सारे टुकड़े जोडती हूँ
तब कहीं जा के होती हूँ
मुकम्मल - मैं .

     - मीता .

1 टिप्पणी:

मदन मोहन सक्सेना ने कहा…

बहुत सुंदर ! जितनी सार्थक रचना उतनी ही कलात्मक ! शुभकामनायें !
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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