सोमवार, 28 जनवरी 2013

परिचय

गृहस्थिन, हाउस वाइफ, होम मेकर
ये परिचय है मेरा

हमारी संख्या
दुनिया की प्रौढ़ जनसँख्या
की लगभग आधी होती है

हम भी इंसानों से
मिलती जुलती जाति के ही है
हमें अक्सर
सुनने को मिलता है
कुछ आता भी है तुम्हे?

हममे कोई गुण नहीं होता....
साहित्य/ संगीत/ कला

हमारी नालियों मे बहते संगीत को सुनना कभी
हम अपने सातों सुर धो डालते हैं
तुम्हारे पोतड़ों के साथ

हमारी रोटियों को
कभी ध्यान से देखा है?
इन्द्रधनुषी होती हैं वो
हम अपने सारे रंगों के सारे सपने
गूंथ डालते हैं उस आटें में
और फिर चकले और बेलन में
दबा दबा कर उन्हें गोल भी तो करना होता है

हमारी कलम जब कागजों से मिलती है
तो रचती है महाकाव्य
न कहा जाने वाला
न सुना जाने वाला
और न ही
गाया जाने वाला
मेहरी/ धोबी /किराने और दूध वाले के हिसाब

विद्वानों ने लिखा है
और आपने पढ़ा भी होगा
साहित्य संगीत कला विहीनः....................
यही तो है हमारा पूरा परिचय

और तुम सब भी तो यही कहते हो
-मृदुला शुक्ला

1 टिप्पणी:

मदन मोहन सक्सेना ने कहा…

बहुत सुंदर ! जितनी सार्थक रचना उतनी ही कलात्मक ! शुभकामनायें !
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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