सोमवार, 14 मई 2012

बिना सोचे ...


बिना सोचे                           
कि ये कोई राह है,
और राह है 
तो मोड़ भी होंगे...
चलो, 
इक साथ चलते हैं .

न जाने कौन सा मकाम 
मेरे नाम लिक्खा है,
न जाने कौन सी मंज़िल 
तुम्हारी मुन्तजिर है....
शायद 
रास्ते के मोड़ को 
मालूम  है सब कुछ.

ये तुम भी जानते हो 
और मैं भी, 
कि जब भी मोड़ आते हैं 
तो रस्ते रुख  बदलते हैं.

मगर फिर भी 
बिना सोचे 
चलो, 
इक साथ  चलते हैं..

                - मीता .

2 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

न जाने कौन सा मकाम
मेरे नाम लिक्खा है,
न जाने कौन सी मंज़िल
तुम्हारी मुन्तजिर है....

बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ ...

Meeta ने कहा…

धन्यवाद संगीता जी.

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